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Full text of "Lekh Latika"

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2095 ९व 0५7-++ 
2707, 3, 3. 56४ |. £. 5. ((२७६३.) 


56८७६०७, 2096८०६०॥ 2880 
287|80 (/7५८।५४६५. 


प्रथम संस्क्ररण, १६४० 
मुक्य २) 


#9॥#६5#९एकवं॥5 धै।05७ री ध_्व्आ$|क६07, 7९9॥00५८६०॥, 
शा।0६8६09॥ 200 70085 ९६८, वा6725287५९( ०५ ४७ 29॥[8 
(४४५८४५६५. 


277९ 0/-- 
[.. 8247८ रिया >०॥, 
विंद्गाठतुटा, 4ठग0०ी9ा 50८६८ 20५5, 
(पट (ब्ीहत0, रिांट उक्‍शवा, 


7879० (357], 7०. 


आमुख 

पंजाब यूनिवर्सिटी ने सितम्बर १६४८ में 'पब्लिकेशन ब्यूरो 
(अकाशन विभाग) नामक पुक नई शाखा इस उद्देश्य से स्थापित की 
कि हिन्दी और पंजाबी भाषाओं के साहित्यों को सम्पन्न तथा सम्दद्धि- 
शाली बनाने सें यूनिवर्सिटी भी समुचित योग दे सके । अतएव ज्ञान, 
विज्ञान तथा साहित्य सम्बन्धी मोलिक ग्रन्थों की रचना, अन्यान्य 
भाषाओं की इस प्रकार की उत्तमोत्तम पुस्तकों के अनुवाद वथा छात्रगणों 
की शिक्षा के लिए इन विषयों की पुस्तकों का निर्माण अथवा उनका 
प्रामाणिक रूप में संकलन एके संशोधन करके सम्पादन--इन सभी 
विधियों द्वारा उक्त उद्देश्य की पूर्ति करने का यव्न किया जा रहा है । 

प्रस्तुत पुस्तक 'लेख-लतिका! में हिन्दी के प्रारम्भिक छात्रों के लिए 
कतिपय सरल निबन्धों का संकलन किया गया है । निबन्धों के चुनाव 
में भाव और भाषा का विशेष ध्यान रखा गया है जिससे आरम्भिक 
छात्र उन्हें सुगमता से चुद्धिस्थ कर सके एवं स्वयं सोच-विचार करने 
की शक्ति में भी यथेष्ट भेरणा प्राप्त कर सके । पाठकों की शानवृद्धि के 
लिए लेखकों का संज्षिप्त परिचय और किन्हीं कठिन शब्दों के अर्थ भी 
दे दिये हैं। आशा है कि पाठक वर्ग इनसे सम्रुचित लाभ उठावेंगे। 

यूनिवर्सिटी प्रकाशन विभाग” की ओर से संपादक और सुद्गक 
के प्रति सन्‍्वोष. प्रकट करता हुआ में इस पुस्तक में संकलित सभी 
लेखकों ग्रधवा उनके उत्तराधिकारियों एवं प्रकाशकों का भी कृतल्ञता- 
पूर्वक धन्यवाद करता हूँ । अपने लेखों को संगृह्दीत करने की अच्ुुमति 
देकर उन्होंने ल केवल अपने सौजन्य का परिचय दिया है, अपितु इस 
प्रान्त के विद्यार्थीमंडल को भी हिन्दी के लब्ध-प्रतिष्ठ लेखकों की सुन्दर 
रचनाओं के अनुशीलन करने का सौभाग्य प्रदान किया है । . 

, इस पुस्तक को दोष ठथा त्रुटि रहित बनाने का यथासंभत्र पूर्ण थत्न 
किया गया है। तथापि नित्तान्त निर्दोपता असंभव है। पाठक-पाठिकाओं से 
धार्थना हैं कि थदि उन्हें कोई च्रुटि दृष्टियोचर हो तो वे कृपया सुमे सूचित 
कर जिससे अगले संस्करण सें उसका उचित संशोधन किया जा सके। 
._ शिमलो | . ऋआजमगहिदारी सेठ, सेक्रेट्रो, 
 सितंचर १९,१६२० यूनिचसिटी पब्लिकेशन ब्यूरों 


लेख-सूची 


लेख लेखक प्ष्ठ 
आसुख 
प्राफ़थनन 
पथ, बातचीत “द्री पं, बालकृष्ण भट्ट... १ 
» आ्रात्म-कथा--रुकूल में महात्मा गाँधी ७ 
हे साहित्य की महत्ता “श्री पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ... १४७ 
४, क्‍या जानवर भी सोचते हैं १ का ३७. ५४ पे 
५८४, कतव्य और सत्यता डाक्टर श्यामसुन्दरदास ... २३ 
६, आकाश-गद्भा श्री प॑. रामदास गौड़ .-« २६ 
“७, मज़दूरी और प्रेम प्रो० पूर्णलिंह »« हे 
८, राजाओं की नीयत से बरकत श्री प॑, चन्द्रधर गुलेरी ०» ४४ 
५४६, राम और भरत > “श्री पं. रामचन्द्र शुकू »»« ४८ 
१०, चुढ़िया और नोशेरवाँ श्री पं. पद्मसिंह शर्म्मा ० ईैम 
११. भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के श्री सन्‍्तराम बी. ए, »». ६१ 
५३२, स्वाधीनता ; “श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति..... ७३ 
2१३, विज्ञान श्री पदुमलाल पुतन्नालाल बख़शी ८२ 
१ ४, विजया की प्रथम-प्रतिष्ठा 5 “श्री आचाय॑ विश्वचन्धु २०६०४ २ 
५४, दीनों पर प्रेम “श्री वियोगी हरि "०० ६७ 
३६. मनुष्य और समाज रघुनन्दन ः «० ३१०१ 
५८३७, सब्चय श्री पं० जनादन मा ० कण्प 
५4८. विश्राम - श्री आनन्दकुमार «० १६ 
१६. सास और ननद श्रीमती राजकुमारी बिन्दल ,.. ११६ 


(क) लेखक-परिचय ,., 


हा »«« १२६-१४% 
(ख) अर्थावली 


कद «०» ३४७-१०९० 


प्राकथन 


हिन्दी के सरल निबन्धों का यह संग्रह हिन्दी के प्रारम्भिक 
छात्रों के लिए. तैयार किया गया है। इसमें हिन्दी-निबन्ध के प्रथम 
आचाय पं० बालकृष्ण सह्ट से लेकर आजकल के उदीयमान लेखकों 
तक का समाहार किया गया है। इस प्रकार यह संग्रह पिछले लगभग 
एक सौ वर्षों की निबन्ध-प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है । 

निबन्धों के चुनाव में जद्दां विषयों की विविधता और उपादेयता 
का विचार रखा गया है, वहां प्रारम्भिक छात्रों की बौद्धिक क्षमता पर 
भी पूरा ध्यान दिया गया है।भाषा का काठिन्य और प्रतिपाश् 
विषय का गास्भीय उनकी कोमल ग्राहक-शक्ति के अनुरूप ही रखने 
का बत्न किया गया है। 


लेखों के संकलन में कालानुक्रम का अलुसरण किया हे । 
इसका विशेष लाभ यह है कि इसके द्वारा जहां विपय-भेद और 
: रूचि-वैचिब्य में कोई अन्तर नहीं पढ़ता, वहां भाषा और भावों के 
क्रमिक विकास का और लेखकों के परस्पर भाव-साध्श्य और भावों 
के आदान-प्रदान का भी एक स्पष्ट चित्र मिल जाता है। 


लेखकों के सम्बन्ध की साधारण जानकारी 'लेखक-परिचय” में 
दी गई है और सुकुमारमति छात्रों की सुकरता के लिए, अन्त में, एक 
अ्र्थावली' भी क्वगा दी है। पाठकों को अनावश्यक कष्ट से बचाने के 
लिए मूलपुस्तक में उन सभी शब्दों के साथ तारक “चिह्न लगा दिया 
है जिनके अर्थ अर्थावली में दिये हैं। छात्रों के बौद्धिक विकास को ध्यान 
में रखते हुए साहित्यिक विचेचन! को स्थान नहीं दिया गया | लेखकों 
की रचना केल्अध्ययन को ही विचेक-दृद्धि ओर भाषा-क्यान के लिए 
पर्यात्त समझा गया है। आशा है यह संग्रह अपने निर्दिष्ट उद्देश्य की 
पूर्ति में यथेष्ट सफल सिद्ध होगा । 


अन्त में में उन सब लेखकों और प्रकाशकों के प्रति कृतज्ञता का 
प्रकाश करता है जिन्होंने अपने निबन्धों को इस संग्रह में सम्मिलित 
करने की अनुमति देकर हिन्दी के प्रसार में सहयोग प्रदान किया हैं। 
चस्तुतः सरस्वती की सेवा के कारण वे सभी सरस्वती-भक्तों के घन्यवाद 
के पात्र हैं। 


पंजाब यूनिवर्सिटी 
प्रकाशन विभाग --रघुनन्दन 
शिमला 
१६-६-४ ० 


लेख-लवतिका 








न ०9070720०7::::07/ 7: जन 


२्‌ लेखलतिका 


>> -ज जि नलडललजललजजज जि ली जज जज जज ++ 





>> जल स्‍ जल जज + जी न्‍ जा 


वही हमारी साधारण बातचीत का कुछ ऐसा घरेलू ढंग 
है कि उसमें न करतल-ध्वनि का कोई मौका है, न लोगों को 
कहकहे उड़ाने की कोई बात ही रहती है ।हम दो आदमी 
प्रेम-पूषंक संज्ञाप कर रहे हैं।कोई चुटीली बात आ गई 
हँस पड़े । मुसकराहूट से ओठों का केवल फड़क उठना हीं इस 
हँसी की अन्तिम सीमा है। स्पीच का उद्देश्य सुननेवालों के 
मन में जोश और उत्साह पैदा कर देना है। घरेलू बातचीत 
मन रमाने का एक ढंग है। इसमें स्पीच की वह सब संजीदगी* 
बेकदर हो धक्के खाती फिरती है । 
जहाँ आदमी को अपनी जिंदगी मज़ेदार बनाने के लिए, 
खाने-पीने, चलने-फिरने आदि की जरूरत है वहाँ बातचीत 
की भी उसको अत्यंत आवश्यकता है। जो कुछ मवाद” था 
घुआँ जमा रहता है वह बातचीत के ज़रिये भाप बनकर बाहर 
निकल पड़ता है| चित्त हलका और स्वच्छ हो परम आनंद 
में मगन हो जाता है। बातचीत का सी एक ख्लास तरह का 
सज़ा होता है। जिनको बांतचीत करने की -लत पड़ जाती है वे 
इसके पीछे खाना-पीना भी छोड़ बैठते हैं। अपना बड़ा हज 
“कर देना उन्हें पसन्द आता है पर वे बातचीत -का मज़ा नहीं 
खोया चाहते | रातिसन क्रसो* का किस्सा बहुधा लोगों ने पढ़ा 
होगा जिसे १६ वे तक मनुष्य का मुख देखने को भी नहीं 
मिला । कुत्ता, बिल्ली आदि जानवरों के बीच में रह १६ वर्ष के 
उपरान्त उसने फ्राइडे के मुख से एक बात सुनी | यद्यपि इसने 
अपनी जंगली बोली में कहा था पर उस- समय राबिंसन को 
ऐसा आनन्द हुआ मानो इसने नये सिरे से फिर से आदमी 
का चोला पाया । इससे सिद्ध होता है कि सनुष्य की. वाकशक्ति 
में कहाँ तक लुभा लेने की ताकत है | जिनसे केवल पत्न-व्यवहार 
है, कभी एक बार भी साक्षात्कार नहीं हुआ उन्हें अपने प्रेमी 





रे 


बातचीत , डर 


नजजीजी औज-ल+ली जी लीजीली जल जब ्ज़ि जज जज जज जज जज जज + है च ऑल जा ७ जज ० तल जल रू 


से बात करने की कितनी लालसा रहती है। अपना आभ्यंतरिक 
भाव दूसरे पर श्रकट करना ओर उनका आशय आप ग्रहण 
कर लेना केवल शब्दों के ही द्वारा हो सकता है। सच है, जब 
तक. सनुष्य बोलता, नहीं तब तक उसका गुण-दोष़ प्रकट नहीं 
होता। बेन जानसन का यह कहना, कि बोलने से ही मनुष्य के 
रूप का साक्षात्कार होता है, बहुत ही उचित जान पढ़ता. है | 
इस बातचीत की सीमा दो से लेकर वहाँ तक रखी जा 
सकती है जहाँ तक उनकी जमात मीटिंग या सभा न समझ ली 
जाय। एडिसन* का मत है कि असल बातचीत सिर्फ दो 
व्यक्तियों में हो सकती है. जिसका तात्पय यह हुआ कि जब दो 
आदमी होते हैं तमी अपना दिल एक . दूसरे ; के सामने खोलते 
हैं। जब तीन हुए तब वह दो की बात कोसों दूर गई। कहा 
भी है-छ: कानों में पड़ी बात खुल जाती है? | दूसरे यह कि 
फिसी तीसरे आदकझ्ली के आ जाते ही या-तो वे दोनों अपनी 
बातचीत. से निरस्त हो बेढठेंगे या उसे निपट मू्ख अज्ञात्री 
समझ बनाने लगेंगे | 
जेसे गरम दूध और ठंडे पानी के दो बरतन पास साँट के , 
रखे जायेँ तो एक का असर दूसरे सें पहुँचता है, अर्थात्‌ दूध 
ठंडा हो जाता है ओर. .पानी गरम, वेसे ही दो आदमी पास 
बेठे हों तो एक का शुप्त असर. दूसरे पर पहुँच जाता है, चाहे 
एक-दूसरे को देखें भी नहीं, तव बोलने की कौन कहे । एक के 
शरीर की विद्य॒ त्‌ दूसरे में प्रवेश करने लगती है| जब पास 
बेठने का इतना असर होता है तब बातचीत सें कितना अधिक 
... असर होगा, इसे कौन न स्वीकार करेगा। अंस्तु, अब इस 
“ भ्बात को तीन आदमियों के साथ में. देखना, चाहिए। मानों 
एक 'त्रिकोश-सा बन जता है। तीनों चित्त मांनो तीन कोश 
ओर तीनों की सनोवृत्ति के श्रसरण की धारा मानो इस त्रिकोश 


| 
॒ 


छ लेखलतिका 








की तीन रेखाएँ हैं | गुप-चुप असर तो उन तीनों में परस्पर 
होता ही है। जो बातचीत तीनों में की गई वह मानो अंगूठी में 
नग सी जड़ जाती है । उपरांत जब चार आदमी हुए तब बेतक- 
ल्लुफ़ी को बिलकुल स्थान नहीं रहता । खुल के बातें न होंगी । 
जो कुछ बातचीत की जायगी वह “फ्रार्मलिटी”,* मौरब और 
संजीदगी- के लच्छे में सनी हुई होगी । चार से अधिक की बात- 
चीत तो केवल रामरमौचल कहलावेगी | उसे हम संलाप नहीं 
कह सकते | इस वातचीत के अनेक भेद: हैं । दो बुड्ढों की बात- 
चीत प्राय: जमाने-की शिकायत पर हुआ करती है । वे बाबा 
आदम के समय की ऐसी दास्तान" शुरू करते हैं जिसमें चार 
सच. तो दस भूठ । एक बार उनकी बातचीत का घोड़ा छूट जाना 
चाहिए, पहरों बीत जाने पर भी अंत न होगा। प्राय: अंग्रेज़ी 
राज्य, परदेश और पुराने समय की घुरी रीति-नीति का अलु- 
मोदन और इस संसय के सब्‌ भाँति ज्लाथक नौजवानों की 
» निन्‍्दा उनकी बातचीत का मुख्य अकररंण होगा। पढ़े-लिखे हुए 
तो शेक्सपियर, मिलटन, मिल और स्पेंसर उनकी जीभ के 
आगे नाचा करेंगे । अपनी लियाकत के. नशे में चूर-चूर 
“हमचुती दीगरे नेस्त”* अक्खड्पन की चर्चा छेड़ेंगे ।. दो हम- 
सह्देलियों की चातचीत का कुछ जायका ही निराला है। रस 
का समुद्र मानो उमड़ा चला आ रहा है। इसका पूरा स्वाद 
उन्हीं से पूछना चाहिए जिन्हें ऐसों की रस-सनी बातें सुनने 
को कभी भाग्य लड़ा है। 2 
दो बृढ़ियों की बातचीत का मुख्य प्रकरण, बहू-बेटी वाली 
हुईं तो, अपनी बहुओं या बेटों का गिल्ल-शिकवा होगा या वे 
विरादराने का कोई ऐसा रामरसरा छेड़ बैठेंगी कि बात करते- 
करते अंत में खोढ़े दान्त निकाल लड़ने लगेंगी। लड़कों छी 
बातचीत, खिलाई हुए तो, अपनी-अपनी तारीफ़ करने के बाद 





ब्स्िज्िजीजिल तीज: 


बातचीत ' ४ 


वे कोई सलाह गाँठेंगे जिसमें उनको अपनी शैतानी जाहिर 
करने का पूरा मौका मिले | स्कूल के लड़कों की बातचीत का 
उद्देश्य अपने उस्ताद की शिकायव या तारीक़ या अपने सह- 
पाठियों में किसी के गुण-ओऔगुण, का कथोपकथन होता है । 
पढ़ने में कोई लड़का तेज़ हुआ तो कभी अपने सामने दूसरे को 
कुछ न गिनेगा। सुस्त और बोदा हुआ तो. दबी बिल्ली का-सा 
स्कूल भर को अपना गुरु ही मानेगा | इसके. अलावा बातचीत 
की और बहुत:सी किसमें हैं ।राजकाज की बात, व्यापार- 
सम्बन्धी बातचीत, दो मित्रों में श्रेमालाप इत्यादि | हमारे देश 
में नीच जाति के लोगों में बतकही होती है। लड़की-लड़केवाले 
की ओर से एक-एक आदमी बिचवई* होकर दोनों के विवाह 
सम्बन्ध की कुछ बातचीत करते हैं । उस दिन से बिरादरीवालों 
को जाहिर कर दिया जाता है कि अम्ुक की लड़की का अमुक 
के लड़के के साथ विवाह पक्का हो गया और यह रस्म बड़े 
उत्सव के साथ की जाती है । चंड्खाने की बातचीत भी 
निराली होती हैं । निदान बात करने के अनेक प्रकार और 
ढंग हैं । 
योरुप के लोगों में बात करने का हुनर .है। “आहे आफ 
कनचरसेशन”* यहाँ तंक बढ़ा है कि स्पीच और लेख दोनों 
इसे नहीं पाते। इसकी पूर्ण शोभा काग्यकला-प्रवीण विद्वन्मंडली 
में है। ऐसे चतुराई के प्रसंग छेड़े जाते हैं कि जिन्हें सुन कान 
को अत्यंत्त सुख मिलता है । सुद-गोष्ठी इसी का नाम है। 
सुहृद-गोष्ठी की वातचीत की यह तारीफ़ है कि बात करनेबवालों 
की लियाकत अथवा पेडिताई का अभिसान या कपट कहीं 
एक बात में न्॒ प्रकट हो वरन्‌ क्रम रसाभास पेदा करनेवाले 
सभों को बरकते हुए चतुर सयाने अपनी बात्तचीत को अक्रम 
रखते हैं। वह हमारे आधुनिक शुष्क पंडितों की वातचीत में 


है] 





न लेखलतिका 


नीजीज्ल्लिजिजलञ जज जिजज *-ै जज जी - जज: 





जल 





न्ज्ज््््ज्न्ज्लि लि ज जज जज ै ध ॑ औ ी 5 


जिसे शास्त्रा्थे कहते हैं, कभी आवेगा ही नहीं | मुर्ग और बटेर 
की लड़ाइयों की कपटा-कपटी के समान उनकी -नीरस काॉव-काव 
में सरस संज्ञाप की तो चच। ही चलाना व्यर्थ है, बरन्‌ कपट 
ओर एक-दूसरे को अपने पारिडत्य के प्रकाश से बाद में परास्त 
करने का संघ आदि रसाभास की सामग्री बहाँ बहुतायत 
के साथ आपको मिलेगी। घंटे भर तक काँव-काँव करते रहेंगे तो 
कुछ न होगा । बड़ी-बड़ी कंपनी और कारखाने आदि बड़े-से- 
बड़े काम इसी तरह पहले दो-चार दिली दोस्तों की बातचीत 
से ही शुरू किये गए। उपरांत बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़े कि 
हज़ारों मनुष्यों की उनसे जीविका चलने लगी और साल में 
लाखों की आमदती होने लगी । पच्चीस बषे के ऊपरबालों की 
बातचीत अवश्य ही छुछ-त-छुछ सारगर्सित होगी,-अनुभव 
ओर दूरदर्शिता से खाली न होगी और पश्चीस से नीचे की बात- 
चीत सें यद्यपि अनुभव, दूरदर्शिता और गौरव नहीं पाया 
जाता पर इसमें एक प्रकार का ऐसा दिलबहलाव और ताज़गी 
रहती है जिसकी मिठास उससे दस गुना चढ़ी-बढ़ो है। 
यहाँ तक हमने बाहरी बातचीत का हाल लिखा है जिसमें 
दूसरे फ़रीक* के होने की बहुत आवश्यकता .है, घिना किसी 
दूसरे मनुष्य के हुए ज्ञो किसी तरह संभव नहीं है ओर जो 
दो ही तरह पर हो सकती है--या.तो कोई हमारे यहाँ कृरा करे 
या हसीं जाकर दूसरे को कताश् करें | पेर यह सब तो दुनिया- 
दारी है जिसमें कभी-कमी रसाभास होते देर नहीं छगत्ती 
क्योंकि जो महाशय अपने यहाँ पथारें उनकी पूरी, दिलजोई 
से हो सकी तो शिप्राचार में त्रुटि हई। अगर हमीं उनके वहाँ 
गये तो पहले तो बिना बुलाये जाना ही अनादर का मूल हे 
ओर जाने पर अपने मन-माफ़िक बर्ताव न किया गया तो 
भानों एक दूसरे प्रकार का नया घाव हुआ | इसलिए सबसे 


महात्मा गांधी की आत्मकथा ७ 


ऑल जी 33 तल तल: प्न्लीजी लंड जज लि जल जल हज ल जी 3 जी टी न्‍ ता + < 


उत्तम प्रकार बातचीत करने का हम यही सममभते हैं कि हम वह 
शक्ति अपने में पेदा कर सके कि अपने आप बात कर लिया 
करें । हमारी भीतरी मनोवृत्ति जो प्रतिक्षण नये-नये रंग दिखाया 
करतो है, वह प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आईना है 

जिसमें जैसी चाहो बेसी सूरत देख लेना कुछ दुघट बात नहीं है. 
ओर जो एक ऐसा चमनिस्तान है जिसमें हर किस्म के वेल-बूटे 
खिले हुए हैं । ऐसे चमनिस्तान की सैर में क्या कम दिलवहलाव 
है? मित्रों का प्रेमालाप कभी इसकी सोंलहवीं कल्ला तक भी 
न पहुँच सका । इसी सेर का नाम ध्यान या मनोयोग या चित्त 
को एकाम्र करना है जिसका साधन एक-दो दिन का काम नहीं, 
बरसों के अभ्यास के उपरांत यदि हम थोड़ी भी अपनी मनो- 
वृत्ति स्थिर कर, अवाक्‌ हो, अपने मल के साथ बातचीत कर 
सके तो सानो अहोभाग्य । एक याक-शक्तिमान्र के दमन से न 
जाने कितने प्रकार का दमन हो गया । हमारी जिह्ा कतरनी* के 
समान सदा स्वच्छंद चला करती है, उसे यदि हमने दबाकर 
काबू सें कर लिया तो क्रोधादिक बड़े अजेय शत्रुओं को बिना 
प्रयास जीत अपने चश कर डाला | इसलिए अवाक्‌' रह अपने 
आप बातचीत करने का यह साधन यावत्‌ साधनों .का मल 
है, शान्ति. का परम पूज्य मन्दिर है, परमार्थ का एकमात्र 

सोपान है | 





महात्मा गांधी की आत्कृथा... 
( अनु. श्री सहादेव देसाई तथा हरिभाऊ पाध्याय ) 


(१) स्कूल में ह 
पोरवन्द्र से पित्ता जी राजस्थानिक कोर्ट! के सदस्य होकर 





८ लेखलतिका 


आन आओ था कक 


जब राजकोट गये तब मेरी उम्र कोई सात साल की होगी। 
राजकोट की देहाती पाठशाला में ' में भरती कराया गया | उन 
दिनों का मुझे भत्ती-भान्ति स्मरण है। सास्टरों के नाम-धाम 
भी याद हैं। पोरबन्दर की तरह वहां की. पढ़ाई के सम्बन्ध में 
कोई खास बात जातने लायक नहीं। भेरी गिनती साधारण 
श्रेणी के विद्यार्थियों में रही होगी। पाठशाला के ऊपर के स्कूल 
में और वहां से. हाईस्कूल तक पहुँचने में मेरा बारहवां वर्ष 
बीत गया। तब तक मैंने कभी शिक्षक आदि से भूठ बोला हो, 
ऐसा याद नहीं पड़ता | न किसी को दोस्त बनाने का स्मरण 
है। में बहुत संकोची* लड़का था; मदरसे में अपने काम से काम 
रखता | घंटी बजते-बजते पहुँच जाता और स्कूल बन्द होते ही 
घर भाग आता | भाग आता? शब्द का प्रयोग जान बूकत कर 
किया हे; क्‍योंकि सुझे किसी के साथ बातें. करना नहीं रुचता 
था--मुझे यह डर भी बना रहता था कि कोई मेरा मज़ाक 
न डड़ावे। | 

हाइस्कूल के पहले ही वर्ष की परीक्षा के समय की एक 
घटना उल्लेखनीय* हे। शिक्षा-विभाग के इंस्पेक्टर, जाइल्‍स 
साहब, मुआइने* के लिए आये। उन्होंने पहले द्रजे* के विद्या- 
ध्ियों को पांच ' शब्द लिखवाये | उनमें एक शब्द था--केटल? 
(/(०८८७) | उसके हिज्जे मेंने ग़लत लिखे। मास्टर ने मुमे 
अपने बृट से ठोकर देकर चेताया; पर में कहां सममने वाला 
था ? मेर दिसाग में यह बात नहीं आई कि मास्टर साहव 
मुझे सामने के लड़के की स्लेट देखकर हिजजे दुरुस्त करने का 
इशारा कर रहे हैं। मैंने यह मान रखा था कि मास्टर तो इसलिए 
तनात हैं कि कोई लड़का दूसरे की नकल न कर सके | सच 
लड़कों के पांचों शब्द सह्दी निकले, अकेला में ही वेवकूक बच 
गया। मेरी बेबकूफी बाद को सास्टर ने ब्तलाई | पर भेरे मन 





जज 


महात्मा गांधी की आत्मकथा ज 


तीस + 
न्‍ी सजी: 


पर उस का कोई असर न हुआ । मुझे दूसरे लड़कों- से नकल 
करना कभी न आया। कि कि हक 

ऐसा होते हुए भी मास्टर साहब के प्रति मेरा आदर कभी 
न.घटा | बूढ़ों के दोष न देखने का गुण मुझ में स्वाभाविक 
था। बाद को तो इन मास्टर साहब के दूसरे दोष भी मेरी 
नज़र में आये | फिर भी उनके प्रति मेरा आदर ज्यी-कां-त्यों 
कायम” रहा। में इतना जानता था कि बड़े-बूढ़ों की आज्ञा का 
पालन करना चाहिए, जो वे कहें करना चाहिए, वे जो. कुछ 
करें, उसका काज़ी* हमें न बनना चाहिए । गम 

इसी बीच दूसरी दो घटनाएँ हुईं, जो मुझे सदा याद रंही- 
हैं। मामूली तौर पर मुझे कोर्स की पुस्तकों के अलावो कुछ 
भी पढ़ने का शौक न था। सबके पूरा करना चाहिए, डाट 
सही नहीं जाती थी, सास्टर से छल-कपट करना नहीं था, 
इन कारणों से में सबक पढ़ता, पर सन न लगा करता । इससे 
सबक बहुत बार कच्चा रह जाता । ऐसी हालत में दूसरी पुस्तक 
पढ़ने को जी केसे चाहता ९ परन्तु पिता जी की खरीदी एक 
पुस्तक श्रवण-पितृ-सक्ति” नाटक पर मेरी नज़र पड़ी। इसे 
पढ़ने को दिल चाहा । बड़े अनुराग और चाव से मेंने उसे 
पढ़ा । इन्हीं दिनों काठ: के बकस सें शीशों से तस्वीर दिखाने 
वाले भी फिरा करते। उनमें मेंने श्रवण का अपने माता-पिता 
को कांवर* में वेठा कर यात्रा.के लिए लेजाने वाला चित्र देखा । 
दोनों चीज़ों का मुझ पर गहरा असर पड़ा। मन सें श्रवण के 
समान होने के विचार उठते | श्रवण की सृत्यु पर उसके साता- 
पिता का विलाप मुझे अब भी याद है। उस ललित छन्द को 
मैंने वजानां सीख लिया था। मुझे वाजा सीखने का शौक था 
ओर पिता जी ने एक वाजा ला मी दिया था । ः 

इसी समय कोई नाटक-कंपनी आई और 


१० लेखलतिका 


बल्ड्ड्डजजल शी जज जाली जन्‍्जि््िज्ज्््ज्जज्ककिल्कतकतजज जल जज जज जी सी लत -ल तट जलती डा 


नाटक देखने .की छुट्टी मिली | इसमें हरिश्रन्द्र की कथा थी। 
यह नाटक देखने से मेरी .ठृप्ति नहीं होती थी। बार-बार उसे 
देखने को मन हुआ करता, पर बार-बार जाने कौन देता ९ पर 
अपने मन में मैंने हरिश्वन्द्र का नाटक सेंकड़ों बार खेला होगा। 
हरिश्वन्द्र के सपने आया करते | यही घुन लगी कि हरिश्रन्द्र 
की तरह सत्यवादी सच क्‍यों न हों ? यही धारणा* होती कि 
हरिश्वन्द्र के जैसी विपत्तियां भोगना और सत्य का पालन 
करना ही सच्चा सत्य है। मेंने तो यही मान रखा था कि नाटक 
भें जेसी विपत्तियां हरिश्वन्द्र पर पड़ी हैं, वेसी ही वास्तव में 
उस पर पड़ी होंगी। हरिस्न॑न्द्र के दु:खों को देख कर और उन्हें 
याद करके में खूब रोया हूँ।आज मेरी बुद्धि कहती है कि 
संभव है, हरिश्वन्द्र कोई ऐतिहासिक" व्यक्ति न हो, पर मेरे 
य में तो हरिश्वन्द्र और श्रवण आज्ञ भी जीवित हैं 
मानता हूँ कि आज भी यदि में उन नाटकों को पढ़ँ तो आँसू 
आये बिना न रहें | ध हि 
(२) हाई स्कूल में 
जब मेरा विवाह हुआ तब में हाई स्कूल में पढ़ता था। 
स्कूल में में मन्द-बुद्धि विद्यार्थी नहीं माना जाता था। 
शिक्षकों का प्रेम तो मैंने सदा प्राप्त किया था। हर साल माता- 
पिता को विद्यार्थी की पढ़ाई तथा चाल-चलन के सम्बन्ध में 
प्रमाणपत्र भेजे जाते थे। इनमें किसी दिन मेरी पढ़ाई था 
चाल-चलन की शिकायत नहीं की गई। दसरे दरजे के वाद 
इनाम भी पाये ओर पांचवें तथा छठे दरजे में तो ऋमशः ४) 
आर १०) मासिक वी छात्रबूत्तियां* भी मिली थीं। इस सफलता 
में मेरी योग्यता की अपेक्षा भाग्य का ज्यादा जोर था।ये 
छात्रवृत्तियां सच लड़का के लिए नहीं, सौराष्ट्र प्रान्त* -के 
वद्याथियों के ही लिए थीं और उस समय चालीस-पचास 


भहात्मा गांधी को आत्मकथा १९ 


आन न्‍ ली जीती क्‍ जी -3ती जी + >>लज+- 





"टी ५ 





विद्यार्थियों के दरजे में सोराष्ट्र काठियाबाड़ के विद्यार्थी हो ही 
कितने सकते थे ९: ह 

_. मेरी याद के अनुसार अपनी होशियारी पर *मुझे नाज 
नथा। इनाम अथवा छात्र-बृत्ति मिलती तो मुझे आश्रय 
होता; परन्तु हां, अपने चरित्र का मुझे बढ़ा खयाल रहता 
था। सदाचार में यदि चूक होती तो मुझे. रुलाई आजाती। 
यह मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर था कि मेरे. हाथों कोई णेसी 
बात हो कि शिक्षक की शिकायत केा मौका मिले या वह सन 
में भी ऐसा सोचे । मुझे याद है कि एक बार मार खानी पढ़ी 
थी; उसमें मार खाने का तो दुःख न था, पर इस बात का 
बड़ा पछतावा था कि में दंड का पात्र* सममा गया । में खूब 
रोया | यह घटना पहले या दूसरे दरजे की है । दूसरा प्रसंग 
सातवें दरजे का है।उस समय दोराबजी एदलजी गीमी 
हेडमास्टर थे। वह कड़ा अनुशासन" रखते थे, फिर भी विद्या- 
थ्ियों में प्रिय थे। वह वाकायदा काम करते और काम लेते, 
ओर पढ़ाते भी अच्छा थे | उन्होंने ऊँचे दरजे के विद्यार्थियों के ' 
लिए कसरंत,* क्रिकेट, अनिवाये” कर दी थी.। सेरा सन उससें 
न लगता था। अनिवाय होने के पहले तो में कसरत, क्रिकेट या 
पुटवाल में कभी जाता ही न. था। न जाने में सेरा संकोची 
स्वभाव भी एक कारण था। अब में देखता हूँ.कि कसरत की 
यह्‌ अरुचि सेरी भूल थी | उस समय मेरे ऐसे रालत विचार थे 
कि कसरत का शिक्षा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं । बाद में 
समझ में आया कि विद्याभ्यास में व्यायाम का अरथात्‌ शारीरिक 
शिक्षा का मानसिक शिक्षा के समान ही स्थान होना चाहिए। 
फिर भी सें कहना चाहता हूँ कि कसरत में न जाने से हानि 
न हुईं कारण, मैंने पुरतकों में खुली हवा में धूमने की सिक्का 
रिश पढ़ी थी। यह मुझे पसंद आई और तभी से घूमने जाने 


श्र्‌ लेखलतिका 


की आदत मुझे पड़ गई, जो अब तक है | घूमना सी व्यायाम 
तो है ही; और इससे मेरा शरीर ठीक-ठीक गठीला हो गया। 
व्यायाम की जगह घूमना जारी रखने की वजह से शरीर से 
कसरत न करने की भूल के लिए तो भुझे सजा नहीं- सोगनी 
पड़ी, पर दूसरी एक भूल की सज़ा में आज तक भोग रहा हूँ। 
पता नहीं कहां से, यह ग़लत खयाल मुझे मिल गया था कि 
पढ़ाई में सुलेख* की ज़रूरत नहीं है। यह विलायत जाने तक 
बना रहा। बाद में तो में पछताया और शरमाया | मैंने सममा 
कि अक्षरों का खराब होना अधूरी शिक्षा की निशानी है। 
अतः हरेक नवयुवक ओर युवती सेरे इस उदाहरण से सबक 
ले और सममे कि-सुन्दर अक्षर शिक्षा का आवश्यक अंग हैं । 
इस समय के मेरे विद्यार्थी-जीवन की दो बातें लिखने-जेसी 
हैं। चौथे दरजे से कुछ विषयों की शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती 
थी, पर में कुछ समझ ही नहीं पाता था। रेखागणित में मैं यों 
भी पीछे था, ओर फिर अंग्रेजी में पढ़ाये जाने के कारण और 
भी समम में न आता था | शिक्षक सममाते तो अच्छा थे; पर 
मेरी समझ में न आता था। में बहुत बार निराश हो जाता । 
परिश्रम करते-करते जब रेखागणित्त की तेरहवीं शक्त पहुँची, 
तब सुझे एकाएक लगा कि रेखागणित तो सब से आसान 
विपय है ।जिस बात में केवल बुद्धि का सीधा और सरल 
प्रयोग ही करना है उसमें मुश्किल क्‍या है ९ उसके बाद से 
रगखागणित मेरे लिए सहज और मज़ेदार विपय हो गया। 
संस्कृत मुझे रेखागणित से भी अधिक मुश्किल मालूम 
पढ़ी । रेखागशित में तो रटने की कोई बात न थी, परन्तु 
संम्कृत में मेरी दृष्टि से अधिक काम रठटने का ही था। यह 
विपय भी चौथी कक्षा से शुरू होता था। छटी कक्ता में ज्ञाकर 
ते मेरा दिल चैंठ गया। संम्कृत-शिक्षक बड़े सख्त थे | विद्या- 








आम 


महात्मा गांधी की आत्मकथा श्३्‌ 


आज भी 





्थियों को बहुतेरा पढ़ा देने का उन्हें लोभ था। संस्कृत ओरं 
फ्रारसी के दरजे में एक प्रकार की होड़-सी* लगी रहती थी। 
फ़ारसी के मौलवी साहब नरम्त आदमी थे। विद्यार्थी आपस 
में बातें करते कि फ़ारसी तो बहुत सरल है, फ्रारसी के 
अध्यापक भी बड़े मुलायम हैं । विद्यार्थी जितना काम कर लाते 
हैं, उतने से ही वे निभा लेते हैं । सहज होने की बात से में भी 
ललचाया और एक दिन फ़ारसी के दरजे में जाकर -बेठा। 
संस्कृत-शिक्षक को इससे दुःख हुआ और उन्होंने मुझे बुलाकरं 
कहा--तुम सोचो तो कि तुस किस के लड़के हो ? अपनी 
धार्मिक भाषा न सीखोगे ? अपनी कठिनाई मुझे बताओ मेरी 
तो इच्छा रहती है कि सब विद्यार्थी अच्छी संस्कृत - सीखें। आगे 
चल कर उससें रस-ही-रस मिलेगा | तुम को इस- तरह निराशं 
न होना चाहिए ।.तुम फिर मेरे दरजे में आजाओ”? । 

- में शरमाया | शिक्षक के श्रेम की अवहेलना* न कर सका। 
आज मेरी आत्मा कृष्णशह्भुर . पर्ड्या की कृतज्ञ है, क्योंकि 
जितनी संस्कृत मेंने उस समय पढ़ी थी, यदि उतनी भी न पढ़ा 
होता तो आज में संस्कृत शास्त्रों का जो रसास्वादन कर पाता 
हूँ बह न कर पाता । बल्कि अधिक संस्कृत न पढ़ सका, इसका 
पछतावा होता है। क्‍योंकि आगे चल कर मैंने समझा कि 
किसी भी हिन्दू-बालक को संस्कृत के अध्ययन" से वंचित नहीं 
रहना चाहिए। पक, । 

अब तो में यह मानता हूँ कि भारतवर्ष के उच्च शिक्षण- 
क्रम में अपनी भाषा के अलावा राष्ट्रभाषा हिन्दी, संस्कृत, 
फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी को सथाव मिलना चाहिए । इतनी 
भाषाओं को शिचती से किसी को धवराने की ज़रूरत नहीं | यदि 
भाषाएँ ढंग से सिखाई जायें और सब विषय अंग्रेज़ी रे द्वारा 
ही पढ़ने, समभने का वोफ हम पर न हो तो उपयुक्त* भाषाओं 


श्द लेखलतिका 


तरह विक्ृत साहित्य से मस्तिष्क भी विकारप्रस्त* होकर रोगी 
हो जाता है। मस्तिष्क का बलवान्‌ और शक्तिसंपन्न होना 
अच्छे ही साहित्य पर अवलंबित है । अतएव यह बात 
निश्चान्त है कि मस्तिष्क के यथेष्ट विकास का एकमात्र साधन 
अच्छा साहित्य है। यदि हमें जीवित रहना है और सभ्यता 
की दौड़ में अन्य जातियों की बराबरी करना है तो हमें श्रम- 
पूवेक, बढ़े उत्साह से, साहित्य का उत्पादन और प्राचीन 
साहित्य की रक्षा करनी चाहिए।और यदि हमे अपने 
मानसिक जीवन की हत्या करके अपनी वतेमान दयनीयं दशा 
में पड़ा रहना ही अच्छा समझते हों तो आज ही साहित्य- 
निर्माण के आडम्वर का विसजन* कर डालना चाहिए | 


- आँख उठाकर ज़रा और देशों तथा जातियों की ओर तो 
देखिए । आप देखेंगे कि साहित्य ने वहाँ की सामाजिक और 
* राजकीय स्थितियों में कैसे-कैसे परिवर्तन कर डाले हैं | साहिल्य 
ने वहाँ समाज की दशा कुछ-की-छुछ कर दी है; शासन-प्रवंध 
में बड़े-बड़े उधल-पुथल कर डाले हैं; यहाँ तक कि अजुदार ओर 
धार्मिक भावों को भी जड़ से उखाड़ फेंका है| साहित्य में जो 
शक्ति छिपी रहती है, बह तोप, तलवार और बम के गोलों में 
भी नहीं पाई जाती । योरुप में हानिकारिणी धार्मिक रूढ़ियों का 
उत्पाटन साहित्य ही ने किया है। जातीय स्वातंत्रय के बीज 
उसी ने थोए हैं| व्यक्तिगत स्वातंत्य के भाषों को भी उसी ने 
पाला, पोसा ओर बढ़ाया हैँ । पतित देशों का पुनरुत्थान भी 
उसी ने किया हैं| पोप की प्रभुता* को किसने कम किया हैं ? 
फ्रांस में प्रजा की सत्ता* का उत्पादन ओर उन्नयन किसने किया 
१९ पादाक्रान्त इटली का मस्तक किसने ऊँचा उठाया है ? 
साहित्य न, साहित्य ने, साहित्य ने । जिस साहित्य में इतनी 
शक्ति है, जो सादिस्य सुर्दो को भी झिंदा करन बाली संजीवनी 


सन्‍जे |, मसल्‍सनथन नरन पर जमजनानासनी अर उ जन मकर चलन 
जी - ले ज- के 





साहित्य की महत्ता श्७ 


न जल जल ५०५७ ०७०0० >> ०> >> लत ललित जज जज ल्‍ल्‍चञ्ट जज जल जज जज हज जण 


ओषधि का आकर है, जो-साहित्य पतितों को उठाने वाला और 
उत्थितों के मस्तक को उन्नत करने वाला है उसके उत्पादन और 
संवर्धन की चेष्टा जो जाति नहीं करती वह अज्ञानान्धकार के 
गते में पड़ी रहकर किसी दिन अपना अस्तित्व ही खो बेठती 
हैं। अतएव समर्थ होकर भी. जो मनुष्य इतने महत्वशाली 
साहित्य की सेवा और अभिवृद्धि नहीं करता अथवा उससे . 
अनुराग नहीं रखता वह समाजद्रोही है, वह देशद्रोही है, वह 
जातिद्रोही है, कि बहनी, बह आत्मद्रोही और आत्महंता भी है। 
कभी-कभी कोई समृद्ध भापा अपने ऐश्वयं के बल पर 
दूसरी भाषाओं पर अपना अ्भुत्व स्थापित कर लेती है, जेसे 
जमनी, रूस और इटली आदि देशों की भाषाओं पर फ्रेंच 
साषा ने बहुत समय तक कर लिया था। स्वयं अंग्रेज़ी भाषा भी 
फ्रेंच और लेटिन भाषाओं के दवाव से नहीं बच सकी । कभी- 
कभी यह दशा राजनैतिक प्रभुत्व के कारण भी. उपस्थित.हो 
जाती है और विजित देशों की भाषाओं को जेता जाति .की 
भाषा दवा लेती है । तब उसके साहित्य का उत्पादन यदि बंद 
नहीं हो जाता तोः उसकी वृद्धि की गति मन्द ज़रूर पड़ जाती 
है। यह अस्वाभाविक दबाव सदा नहीं बना रहता । इस प्रकार 
की दवी या अधःपतित भाषाएँ चोलने वाले जब होश में 
आते हैं तब वे इस अनैसर्गिक आच्छादन* को दूर फेंक देते हैं । 
जमेती, रूस, इटली और स्वयं इद्ललैणड चिरकाल- तक फ्रोंच 
और लेटिन भाषाओं के माया-जाल में फँसे थे। पर बहुत समय 
हुआ, उस जाल को .उन्‍्होंने. तोड़ डाला। अब वे अपनी ही 
भाषा के साहित्य की अभिवृद्धि करते हैं, कभी भूलकर भी 
विदेशी भाषाओं में अ्न्थ-रचना करने का विचार नहीं करते। 
बात यह है कि अपनी भाषा का साहित्य ही जाति और 
स्वदेश की उन्नति का साधक है। विदेशी भाषा का चूड़ांत ज्ञान 


२० लेखलतिका 





जानवरों में मानसिक व्यापार के कोई चिन्ह नहीं देख पड़ते। 
किसी आंतरिक प्रवृत्ति, उत्तेजना या शक्ति की प्रेरणा से ही थे 
सब शारीरिक व्यापार करते है । किसी मतलव से कोई काम करना 
बिना ज्ञान के--विना बुद्धि के--नहीं हो सकता | ज्ञान दो तरह 
का है--स्वामाबिक" और उपा्जित ।* स्वाभाविक -पशुओं में 
और उपार्जित मनुष्यों में होता है । हम सब काम सोच-समम कर 
जैसा करते हैं, जानवर बेसा नहीं करते | उनमें घिचार-शक्ति 
ही नहीं है; उनके सन में विचारों के रहने की जगह ही नहीं; 
क्योंकि थे वोल नहीं सकते | ठीक-ठीक विचारणा या भावना 
बिना भाषा के नहीं हो सकती | भाषा ही विचार की जननी 
है। भाषा ही से विचार पेदा होते हैं।बाणी और अर्थ का 
योग सिद्ध ही है। शब्दों से अथे था विचार उसी तरह अलग 
नहीं हो सकते, जैसे पदार्थों के आकार उनसे अलग नहीं हो 
सकते | जहां आकार देख पड़ता/ है, वहां पदार्थ ज़रूर होता 
है। जहाँ विचार होता है, वहाँ भाषा ज़रूर होती है| बिना 
भाषा के विपय-क्षान और विपय-प्रवृत्ति इत्यादि-इत्यादि बातें 
हो सकती हैं, परन्तु बिचार नहीं हो सकता। पशु अपनी 
इंद्रियों की सहायता से ही पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।जो 
पदार्थ समय ओर आकाश में विद्यमान रहते हें, सिफ्रे उन 
का ज्ञान पशुओं को इन्द्रियों से होता है, और पदार्थों का 
नहीं | पशुओं में स्मरण-शक्ति नहीं होती, पुरानी बातें उन्हें 
याद नहीं रहती। यही पुर्बाक्त साहब का मत है । 
इनमें से बहुत-सी बातों का खंडन हो सकता है | कुछ का 

ग्यंडन लोगों ने किया भी हैं। विचार क्या चीज़ है ? सोचना 

कसे कहते हैं ? सिर में एक प्रकार के ज्ञान-तंत हैं। बाहरी 
जगत की किसी चीज़ या शक्ति का पअवतिबिंब-रूपी ठप्पा, ज्ञो 
उन नंतुझं पर उठ आता हैं, उसी का नाम विचार ह | जितने 


कया जानवर भी सोचते हैं १ २९ 





ल््ल्ल््लजज्ििल लव जज जज जी जज लीड 


प्रकार के शब्द सुन पड़ते हैं, उनकी तसबीर सिर के भीतर 
तंतुओं पर खिंच-सी जाती है।यह तसबवीर मिटाए नहीं 
मिटती | कारण उपस्थित होते ही वंह नई होकर ज्ञान-आहिका 
शक्ति के सामने आ जाती है। यह कहना गलत है. कि बिना 
भाषा के विचार नहीं हो सकता। जो लोग ऐसा कहते हैं, थे 
शायद उन शब्द-समूहों को भोषा कहते हैं जो वर्ण-रूपी चिह्नों 
से बने हैं । पर क्या कोई इंजीनियर या मिस्त्री एक बड़े-से-बड़े 
सकान या मीनार की कल्पना, बिना ईंट, पत्थर और चुने 
इत्यादि का नाम लिये सी, नहीं कर सकता ? क्‍या ज्यामिति- 
शास्त्र* के पंडित को अपना मतलब सिद्ध करने के लिए वर्ण- 
रूपिणी सापा की कुछ भी जरूरत पड़ती है? अथवा क्‍या 
बहरे और गूगे आदसी ज्ञान-तंतुओं पर चित्रित चित्रों की 
सहायदा से भावना, कल्पना, विचार था स्मरण नहीं करते ? 

फिर दिचार की बड़ी ज़रूरत भी नहीं देख पड़ती । कया 
बिना विचारणा के काम नहीं चल सकता ? सच पृछिए, तो 
जगत्‌ में बहुत कम विचारणा होती है। हरबटो स्पेंसर तक के 
बड़े-बड़े ग्रंथ विचारणा के बल पर नहीं लिखे गये। स्पेंसर ने 
अपने आत्म-चरित में ऐसा ही लिखा है। उसका कथन है कि 
सेने उन्हें अपनी प्रतिभा के बल से लिखा है। मेरे मन में आप- 
ही-आप उनको लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई। उसी ने मुझसे 
लिखाया | दुनियां में जितने बड़े-बड़े प्रंथ देख पड़ते हैं, उनमें 
बहुत-से ऐसे हैं, जिनको उनके लिखने वालों ने अपने मस्तिष्क 
>अपने मन, अपनी प्रतिभा की प्रेरणा से ही लिखा है । जिस तरह, 
भेदे के द्वारा पाचन-क्रिया होने से खून और पित्त पेदा होता है 
जिंस तरह प्रजोत्पादक अंगों के द्वारा प्रजा की उत्पत्ति होती है 
उसी तरद् बड़े-बड़े आदमियों के प्रतिभा-पूर्ण मस्तकों से कविता 
किताबें और इयारतों की कल्पनाएँ निकलती हैं। 


मर: * लेखलतिका 
कालिदास ने रघुवंश लिखा और भवभूति ने उत्तरराम- 
चरित | पर किस तरह उनके सन में इनको लिखने की बात 
आई ९ आप-ही-आप | विचार करने की ज़रूरत नहीं. पड़ी । 
पहले-पहल उनके सस्तिष्क में इसको लिखने की इच्छा: स्वतः 
संभूत" हुईं | संसार में एक भी मनुष्य ऐसा नहीं हुआ, जिसने, 
अपनी इच्छा से कोई ऐसा काम किया हो, जिसका या जिस 
की सामग्री का अस्तित्व पहले ही से विद्यमान न रहा हो । 
यदि कोई जानवर कोई काम किसी इरादे से करे, और 
जिस ज्ञानात्मिका बुद्धि से वह इरादा पेंदा हुआ हो, वह बुद्धि 
स्वाभाविक हो तो उससे कया ९ उससे कोई नया सिद्धांत नहीं 
निकलता । चाहे वह स्वाभाविक हो, चाहे उपार्जित--बात वही 
रहती है । उससे ज्ञान का न होना--चुद्धि का न होना--नहीं 
साबित होता। ज्ञान चाहे जिस प्रकार का हो, वह है तो | 
ताजमहल की कल्पना करनेवाले में भी ज्ञान था, और घोंसला 
या ग़ार वनानेवाले जीयों में भो वह है | किसी में कम, किसी 
ज्यादा | मकड़ी, चिड़ियाँ, लोमड़ी और चींटी इत्यादि छोटे- 
दे जीब तक अपने-अपने काम से ज्ञान रखने का प्रमाण देते 
न अर ज्ञान मन का ज्यापार है | मन से ज्ञान का तब्रह्दत बडा 
सम्बन्ध है तो फिर यह कैसे कह सकते हैं कि जानवरों में 
मानसिक विचार की शक्ति नहीं हैं. ९ 


द्् 


(4 श्िं 


जो कुछ हम सोचने या करते हैं, वह इंद्रियों पर उठे हुए 
सित्र का कारण नहीं हैं | उसका कारण ज्ञान है। एक किताब 
या कुर्सी की तसवीर मकाबद्ी की इन्द्रियों पर भी बेसी ही 
खियगी, जैसी पालने पर पढ़े हुए छोटे बालक की इन्द्रियों 
7 पर झिसमें जितना ज्ञान होना है, जिसमें जितनी बद्धि 
छोती ४, उसी के अनुसार सांसारिक पदार्था था शक्तियों की 
शानगन मूर्तियों का महत्व, न्‍्यूनाधिक भाव में, सब्र कहीं देख 





टः 


कर्तेघ्य ओर सत्यता श्३्‌ 


जज 








जज जज जज जज जज जज: 


पढ़ता है। जिस भाव से हम एक किताब को देखेंगे, मेंस उस 
भाव से उसे न देखेगी । पर देखेगी ज़रूर, और उसका चित्र 
भी उसकी ज्ञानेंद्रियों पर ठीक वेसा ही उतरेगा, जेसा 
आदमियों की इन्द्रियों पर उतरता है । 

इसमें संदेह. नहीं कि सोचना या विचार करना--चाहे वह 
ज्ञानात्मक हो, चाहे न हो--मस्तिष्क की क्रिया है। अतएव 
उसका संबंध मन से हे ।और, आदमी से लेकर चींटी तक, सब 
जीवधारियों में, अपनी-अपनी स्थिति और आवश्यकता के 
अनुसार, मन होता है । यह नहीं कि किसी में वह बिल्कुल ही 
न होता हो । इस से यह सिद्ध है कि ज्ञिस सिद्धांत का उल्लेख 
ऊपर हुआ, वह ठीक नहीं । 





न्‍अनानतेलनीयन-क-ममननया+ अननननना का, 


कतंव्य और सलता 


( श्री डा० श्यामसुन्दरदास ) 

फतेव्य चह वस्तु है जिसे करना हम ल्लोगों का परम 
धर्म है ओर जिस के न करने से हम लोग और लोगों की दृष्टि 
से गिर जाते हैं ओर अपने कुचरित्र से नीच बन जाते हैं। प्रारंसिक 
अवस्था में कतेव्य का करना बिना दवाब से नहीं हो सकता, 
क्योंकि पहले-पहल मन आप ही उसे करना नहीं चाहता । इसका 
आरंभ पहले घर से ही होता है; क्योंकि यहाँ लड़कों का कर्तेन्य 
माता-पिता की ओर और माता-पिता का कतेंव्य लड़कों की 
ओर देख पड़ता है। इसके अतिरिक्त पति-पत्नी, स्वामी-सेवक 
और स्त्री-पुरुष के भी परस्पर अनेक कतेव्य हैं।घर के बाहर 
हम मित्रों, पड़ोसियों, और राजा-प्रजाओं के परस्पर कतेव्यों 
को देखते हैं। इसलिए संसार में सनुप्य का जीवन कर्तव्यों से 


२४ लेखलतिका 


न जी 62 >ज-ज-->+-+>> >> न्‍-नज>-लजलऔजलि जज लच चल जज जुआ ल्‍स्‍  ज * _॒ ॑जजिलज जल डलज जज 5 


भरा पड़ा है, जिधर देखो उधर कततेव्य ही कर्तव्य देख पड़ते 
हैं। बस इसी कतेव्य का पूरा-पूरा पालन करना हम: लोगों 
दी धर्म है, और इसी से हम लोगों के चरित्र की शोभा बढ़ती 
है | कतेव्य का करना न्याय पर निर्भर है और बह न्याग्र ऐसा 
है जिसे समझने पर हम लोग प्रेम के साथ उसे कर सकते हैं ) 


हम सब लोगों के सन में एक ऐसी शक्ति है जो हम सभी 

को बुरे कामों के करने से रोकठती और अच्छे कामों की ओर 
हसारी प्रवृत्ति को कुक्ाती है । यह वहुधा देखा गया है कि जब 
कोई मनुष्य खोटा काम करता है तथ बिना किसी के कहे आप 
ही लज्ञाता और अपने मन में दु:ली होता है.। लड़को ! तुमने 
बहुधा देखा होगा कि जब कभी कोई लड़का किसी मिठाई को 
चुराकर खा लेता है तब वह मन में डरा करता है. और पीछे 
से आप ही पछताता है कि में ने ऐेसा काम क्‍यों किया, मुझे 
खपनी मात्ता से कह कर खाना था। इसी प्रकार का एक दूसरा 
लड़का, जो कभी कुछ चुरा कर नहीं खाता, मदा पसन्न रहता 
क्र उसके सन में कसी क्रिसी प्रकार का डर और पछतावा 
नहीं होता । इसका क्‍या कारण है ९ यही कि हम लोगों का यह 
कर्तव्य है कि हम कभी चोरी न करें | परन्त जब हम चोरी कर 
अगते है तथ हमारी आत्मा हमें कोसने लगती है| इसलिए 
हमारा यह धर्म ८ कि हमारी आत्मा हसें जो कहे, उसके 
अनुसार हम करे । टद विश्वास रस्बे। कि जब तम्हारा मस 
क्रिसी काम के करने से दिचकिचाय और दूर भागे तब कभी तुम 
इस काम की न करो। तुम्हें अपना घर्म-्पालन करने में बरहुमा 
कष्ट उठाना पढ़ेगा, पर इससे तुम साहस न छोड़ो | क्‍या हुआ 
जो मुम्दारे पीसी ठझाविया ओर असलस्यपरता* से घनादय हे। 
गये ओर लुम कंगाल ही रह गये | क्या हत्या जो दसरे लोगों 
ने झुडी सादुफारी करके बदी-बदी नोकरियों पा लीं ओर सम्टें 





कतेव्य और सत्यता र््‌ध्‌ 


्न्ल्ज््ज्जजजजि जज जी जज जज जी + 
्ीलीजल किक खली खप्च्प्च्चख्ख्खज््ख्ख्््च्खच्चिजि जज 


कुछ न मिला और क्या हुआ जो दूसरे नीच कम करके सुख 
भोगते हैं और तुम सदा कष्ट में रहते हो | तुम अपने कतेज्य- 
धर्म को कभी न छोड़ो और देखो इससे बढ़कर संतोष और 
आदर क्या हो सकता है कि तुम अपने धर्म का पालन कर 
सकते हो ॥ ह 

हम लोगों का जीवन सदा अनेक कार्यों से व्यग्र* रहता है। 
हम लोगों को सदा काम करते ही बीतता है | इस लिए हस 
लोगों को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि हम लोग 
सदा अपने घमम के अनुसार काम करें और कभी इसके पथ पर 
से न हटें, चाहे उसके करने में हमारे प्राण भी चले जायाँ तो 
कोई चिंता नहीं । 

धर्म-पालन करने के मार्ग में सब से अधिक बाधा चित्त की 
चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निवलता से पड़ती 
है । मलुष्य के कतेव्य-मार्ग में एक ओर तो आत्मा के भले और 
बुरे कार्मों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता* 
रहती है | बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहता है| 
ओर अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की 
आज्ञा मान कर अपने घर्म का पालन करता हैं और यदि 
डसका मन कुछ काल्ल तक द्विविधा* में पड़ा रहा तो स्वाथ परता 
निश्चय उसे आ घेरेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो 
जायगा | इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात 
के करने की प्रव्॒त्ति दे उसे, विना अपना स्वार्थ सोचे, मटपट 
कर डालता चाहिए । ऐसा करते-करते जब धर्म करने की वान 
पड़ जायगी तब फिर किसी बात का भय न॒रहेगा । देखो, इस 
संसार में जितने बड़े-वड़े लोग हो गये हैं, जिन्होंने संसार का 
उपकार किया है और उसके लिए आदर और सत्कार पाया 
है, उन सभों ने अपने क्तेव्य को सब से श्रेष्ठ माना है, क्योंकि 


र्६ लेखलतिका 


जितने कर्म उन्होंने किये उन सभों में अपने कतेव्य पर ध्यान 
दे कर न्याय का वर्ताव किया | जिन जातियों सें यह गुण पाया 
जाता है वे ही संसार में उन्नति- करती हैं और संसार में उनका 
नाम आदर के साथ लिया जाता है। एक समय किसी अंग्रेज़ी 
जहाज में, जब वह बीच समुद्र में था, एक छेद हो गया। उस 
पर बहुत-सी स्त्रियाँ और पुरुष थे। उसके बचाने का पूरा-पूरा 
उद्योग किया गया, पर जब कोई उपाय सफल न हुआ तब 
जितनी स्त्रियों उस पर थीं सब नावों पर चढ़ा कर विदा कर दी 
गई, और जितने मनुष्य उस पोत पर बच गये थे, उन्होंने उसकी 
छत पर इकट्टे होकर ईश्वर को धन्यवाद दिया कि ये अब तक 
अपना कर्तव्य पालन कर सके और स्त्रियों की प्राश-रक्षा में 
सहायक हो सके । निदान इसी प्रकार इश्वर की प्रार्थना करते- 
करते उस पोत में पानी भर आया और वह डूब गया, पर थे 
लोग अपने स्थान पर ज्यों-के-त्यों खड़े रहे, उन्होंने अपने प्राण 
बचाने का कोई उद्योग नहीं किया | इसका कारण यह था कि 
' यदि वे अपने प्राण बचाने का उ््योग करते तो स्लवियाँ और 
बच्चे न बच सकते । इसी लिए उस पोत के लोगों ने अपना 
धर्म यही समझा कि अपने ग्राण देकर स्त्रियों और बच्चों के 
प्राण बचाने चाहिएँ। इस के विरुद्ध फ्रांस देश के रहने वालों 
ने एक डूबते हुए जहाज़ पर से अपने प्राण तो बचाये ' 
किंतु उस पोत पर जितली रस्त्रियाँ और बच्चे थे उन सभों को 
उसी पर छोड़ दिया । इस लीच करे. की सारे संसार में निंदा 
सी प्रकार जो लोग स्वार्थी होकर अपने कतेव्य पर ध्यान 
नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग बनसे 
घृणा करते हैं । 
कतेव्य-पालन से और सत्यता से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है । 
जो मनुष्य अपना कर्तेव्य-पालन करता है बह अपने कार्मों और 


कर्तव्य और सत्यता श्७ 


हज, अजीत 5 





नली ती लीड “जा:  _ैौ*४४४+५०५-+- 


बचनों में सत्यता का चर्ताव भी रखता है। वह ठीक समय 
पर उचित रीति से अच्छे कामों को करता है| सत्यता ही-एक 
ऐसी वस्तु है जिससे इस संसार में मनुष्य अपने कार्यों में 
सफलता पा सकता है, क्‍योंकि संसार में कोई काम भ्ूठ 
बोलने से नहीं चल सकता | यदि किसी के घर सब लोग भूठ 
बोलने लगें वो उस घर में कोई काम न हो सकेगा और सच 
लोग बड़ा दुःख भोगेंगे । इसलिए हस लोगों की अपने कार्यों में 
भूठ का कसी वर्ताव नकरना चाहिए। अतएव सत्यता को सब 
से ऊँचा स्थान देवा उचित है। संसार में जितने पाप हैं, मूठ 
उन सभों से बुरा है | मूठ की , उत्पत्ति पाप, कुटिलता* और 
कायरता* के कारण होती है | बहुत से लोग सचाई का इतना 
थोड़ा ध्यान रखते हैं कि अपने सेवकों को स्वयं कूठ वोलना 
सिखाते हैं । पर उनको इस बात पर आश्चर्य करना और 
क्रुद् न होना चाहिए जब उनके नौकर भी उनसे अपने लिए 
मूठ बोलें । | 

बहुत से लोग नीति और आवश्यकता के बहाने भूंठ की 
रक्ा करते हैं। वे कहते हैं कि इस समय इस बात को प्रकाशित 
न करना और दूसरी बात को बनाकर कहना, नीति के 
अनुसार, समयानुकूल और परम आवश्यक है। फिर बहुत से 
लोग 'किसी बात को सत्य-सत्य कहते हैं, पर उसे इस 
प्रकार से घुसा-फिरा कर कहते हैं कि जिससे सुननेवाला यही 
समझे कि यह वात सत्य नहीं है, चरन्‌ इसका उल्टा. सत्य 
होगा । इस प्रकार से बातों का कहना मूठ बोलने के पाप से 
किसी प्रकार कम नहीं । ॥ 

संसार में बहुत से ऐसे भी नीच और कुत्सित लोग होते हैं 
जो भूठ बोलने में ही अपनी चतुराई समभते हैं और सत्य को 
छिपा कर धोखा देने या कूठ वोलकर अपने को बचा लेने 





श्द लेखलतिका 


ज्जज्जजिजलजल्तलज् 0 >> 





ऩ्ि्लि्ल्ल्िल्ज्ज्लििजज्ज््ल््् जज जजै 


सें ही अपना परम गौरब सानते हैं । ऐसे लोग ही 
समाज को नष्ट करके दुःख और संताप के फैलाने के मुख्य 
कारण होते हैं। इस प्रकार का भ्ूठ बोलना स्पष्ट न बोलने से 
अधिक निंदित और कुत्सित कर्म है 

भूठ बोलना और भी कई रूपों में देख पड़ता है । जेसे चुप 
रहना, किसी बात को बढ़ाकर कहना, किसी बात को छिपाना, 
भेस बदलना, क्ूठ-मूठ कहना, दूसरों के साथ हा में 
हाँ मिलाना, प्रतिज्ञा करके उसे पूरा न करना और सत्य न 
चोलना इत्यादि | जबकि ऐसा करना धघमे के विरुद्ध है, तब यह 
सब बातें मूठ बोलने से किसी प्रकार कम नहीं हैं। फिर ऐसे * 
ल्लोग भी होते हैं जो मुँह-देखी बातें बनाया करते हैं, परन्तु 
करते बही काम हैं,जो उन्हें रुचता है।ऐसे लोग मन में 
सममभते हैं कि केसा सब को सूखे बना कर हमने अपना काम 
कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मू्खे बनाते हैं और 
अंत में उनकी पोल्न खुल जाने पर समाज में सब लोग घृणा 
करते और उनसे बात करना अपना अपसान समससते हैं। 

कुछ लोग ऐसे भी होते है जो अपने मन में किसी गुण के 
न रहने पर भी ग़ुणवान्‌ बनना चाहते हैं ।जैसे यदि कोई 
पुरुष कविता करना न जानता हो, पर बह अपना ढंग ऐसा 
बनाये रहे जिससे लोग सममें कि यह कविता करना जानता है, 
तो यह कविता का आडंबर रखने वाला सनुष्य झूठा है, और 
फिर यह अपने भेस का निर्वाह पूरी रीति से न कर सकने पर 
दुःख सहता है और अंत में सेद खुल जाने पर सब लोगों की 
आँखों में कूठा और नीच गिना जाता है। परन्तु जो मनुष्य सत्य 
बोलता है वह आडंवर से दूर भागता है और उसे दिखावा 
नहीं रूचता । उसे तो इसी सें बड़ा संतोष और आनंद होता है 
कि सत्यता के साथ बह अपना कर्तेच्य पालन कर सकता है। 





आकाश-गंगा 


न्क्त 


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आज लल्लजडललजि जल जा >> >ज + >> जज जज जि जज जज | 





इसलिए हम सब लोगों का यह्‌ परम धर्म है कि सत्य 
बोलने को सबसे श्रेष्ठ मानें-और कभी भूठ न बोलें, चाहे उससे 
कितली ही अधिक हानि क्‍यों न होती हो । सत्य बोलने ही से 
समाज में हमारा सम्मान” हो सकेगा; और हम आनंद-पूर्वेक 
अपना समय बिता सकेंगे; क्योंकि सच्चे को सब कोई चाहते 
और भूठे से सभी घृणा करते हैं | यदि हम सदा सत्य बोलना 
अपना धर्म मानेंगे तो हमें अपने कर्तव्य के पालन करने में कुछ 
भी कष्ट न होगा और बिना किसी परिश्रम और कष्ट के हस 
अपने मन में सदा संतुष्ट और सुखी बने रहेंगे। 


न्‍स्सन्‍कानमनलसन अजलननन«न क»ननमननान 


आकाश-गंगा 


( श्री पं० रामदास गौड़ एम० ए० ) 


तारों-भरी रात के स्वच्छ नीले आकाश की शोभा किस ने 
नहीं देखी है ? यह नित्य का एक ही प्रकार का मनोमोहक दृश्य 
जगत्‌ के जन्म से आज तक मनुष्य देखता आया है; परन्तु 
उसका जी उससे कभी नहीं ऊबा । इस दृश्य को देख-देख कर 
परम न से लेकर उद्धट विद्वान तक आश्चर्य-चकित होते 
रहे हैं| ज्योतिषो अपनी दूरगामी दृष्टि से बहुत कुच्च थाह 
लगाने की कोशिश करते आये | चरतेमान थुग में बड़े-से-बड़े 
ओर सृक्त्म-से-सूक्ष्म यंत्रों से काम लेकर भी उन्हें एक ही बात 
मालूम हुई कि विश्व अनादि और अनंत है, उसकी. सब वातों 
को जानता हसारी शक्ति के बाहर है। इस में शक्त नहीं कि 
उन्होंने यंत्रों के सहारे अधिकाधिक जाना, पर साथ-ही-साथ 
उनके अज्ञान की परिधि* उनकी जानकारी की अपेक्षा अधिकाधिक 
विस्तीणे* होती गई । उन्होंने विशेष रूप से यह ज्ञान पाया कि 


श्ष् लेखलतिका 


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््व्ल्ल्क्ल्ल््ल्ल्ज्ल्ल्््ज्य््तलकतलज जे जज 





में ही अपना परम गौरव सानते हैं । ऐसे लोग ही 


समाज को नष्ट करके दुःख और संताप के फैलाने के भुख्य 
कारण होते हैं । इस प्रकार का क्रूठ बोलना स्पष्ट न बोलने से 
अधिक निंदित और कुत्सित कमे है । 

भूंठ बोलना और भी कई रूपों में देख पड़ता है । जेसे चुप 
रहना, किसी बात को बढ़ाकर कहना, किसी बात को छिपाना, 
भेस बदलना, मभूठ-सूठ कहना, दूसरों के साथ हाँ में 
हाँ सिल्लाना, अतिक्षा करके उसे पूरा न करना और सत्य न 
बोलना इत्यादि | जबकि ऐसा करना घम्म के विरुद्ध है, तब यह 
सब बातें मूठ बोलने से किसी प्रकार कम नहीं हैं |फिर ऐसे * 
लोग भी होते हैं जो मुह-देखी बातें बनाया करते हैं, परन्तु 
करते चही काम हैं,जो उन्हें रुचता है। ऐसे लोग मन से 
समझते हैं कि केसा सब को सूखे बना कर हमने अपना काम 
कर लिया, पर वास्तव में वे अपने को ही मूर्ख बनाते हैं और 
अंत में उनकी पोल खुल जाने पर समाज में सब लोग घृणा 
करते और उनसे बात करना अपना अपमान सममते हैं। 

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने मन में किसी गुण के 
न रहने पर भी गुणखवान्‌ बनना चाहते हैं।जैसे यदि कोई 
पुरुष कविता करना न जानता हो, पर बह अपना ढंग ऐेसा 
बनाये रहे जिससे लोग सममें कि यह कविता करना जानता है, 
तो यह कविता का आडंबर रखने वाला मनुष्य भूठा है, और 
फिर यह अपने भेस का निवांह पूरो रीति से न कर सकते पर 
दुःख सहता है और अंत में भेद खुल जाने पर सब लोगों की 
आँखों में कूठा और नीच गिना जाता है। परन्तु जो मनुष्य सत््य 
बोलता है वह आडंवर से दूर भागता है और उसे दिखाना 
नहीं रुचता । डसे तो इसी में बड़ा संतोष और आनंद होता है 
कि सस्यता के साथ चह अपना कर्तेब्य पालन कर सकता है। 


आकाश-रंगा र्‌६ 


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इसलिए हम सब लोगों का यह परम धर्म है कि सत्य 


बोलने को सबसे श्रेष्ठ मानें ओर कभी भूठ न बोलें, चाहे उससे 
कितनी ही अधिक हानि क्‍यों न होती हो | सत्य बोलने ही से 
समाज में हमारा सम्मान* हो सकेगा; और हम आनंद-पूर्वेक 
अपना समय बिता सकेंगे; क्योंकि सह्चे को सब कोई चाहते 
और भूठे से सभी घृणा करते हैं | यदि हम सदा सत्य बोलना 
अपना धर्म मानेंगे तो हमें अपने करतेव्य के पालन करने में कुछ 
भी क्रष्ट न होगा और बिना किसी परिश्रम और कष्ट के हम 
अपने मन में सदा संतुष्ट और सुखी बने रहेंगे । 


न्‍अललनकममपन4 अलनन«पनका-नमन-तन. 


आकाश-गंगा 


( श्री पं० रामदास गौड़ एम० ए० ) 


तारों-भरी रात के स्वच्छु नीले आकाश की शोभा किस ने 


नहीं देखी है ? यह्‌ नित्य का एक ही प्रकार का मनोमोहक दृश्य 
जगत्‌ के जन्म से आज तक मनुष्य देखता आया है; परन्तु 
उसका जी उससे कभी नहीं ऊबा | इस दृश्य को देख-देख कर 
परम मूर्ख से लेकर उद्धट" विद्वान तक आश्चर्य-चकित होते 
रहे हैं | ज्योतिषो अपनी दूरगामी दृष्टि से वहुत कुछ थाह 
लगाने की कोशिश करते आये | चर्तेमान युग में बड़े-से-बढ़े 
और सूक्तम-से-सूच्षम यंत्रों से काम लेकर भी उन्हें एक ही बात 
मालूम हुई कि विश्व अनादि और अनंत है, उसकी सब बातों 
को जानता हमारी शक्ति के बाहर है। इस सें शक नहीं कि 
उन्होंने यंत्रों के सहारे अधिकाधिक जाना, पर साथ-ही-साथ 
उनके अज्ञान की परिधि* उनकी जानकारी की अपेक्षा अधिकाधिक 
विस्तीणे* होती गई । उन्होंने विशेष रूप से यह जान पाया कि 


“आम 


३० लेखलतिका 





्व्य््््लि्लिििचलज्थकतकतलतजज जज कल जज जज बज बल तल -- 


हमने जो कुछ जाना है, वह हमारी अनंत बेजानी हुईं बातों के 
सामने शून्य की बराबरी सी नहीं रखता । 
इसी अनंत,आकाश-मंडल के दृश्यों में से सब से अद्भत 
ओर विस्मयकारी” दृश्य आकाश-गंगा” है | इसे बहुत से लोग 
“डहर” कहते हैं । अंग्रेज़ी में इसका नाम क्षीरायण ( मिल्‍की थे ) 
है। देखने में यह गिरा हुआ दूध-सा लगता है, जिसमें असंख्य 
तारे प्राचुय्य से पढ़े हुए हैं और धारा के किनारे-किनारे 
छिटके है । धारा से तारे जितने ही दूर होते हैं, उतने ही विरल 
दिखाई देते हैं। यह आकाश-गंगा टेढ़ी-मेढ़ी होकर बही है | 
इसका प्रवाह उत्तर की ओर से लेकर दक्खिन की ओर गया 
है | परन्तु आकाश-गंगा देखने में दो धाराओं में गई हुईं जान 
पड़ती है । एक तो रात्रि के प्रथम प्रहर में और दूसरी अन्तिम 
प्रहर में | दूसरी घारा इशान* से नेऋ त्य* कोण की ओर जाती 
है । उसकी दिशा पहली से नहीं मित्नती | परन्तु ज्योतिषियों ने 
इसका पूरा विचार करके निशेय किया है कि वास्तव सें 
आकाश-गंगा एक ही है, दक्षिण-उत्तर होकर आकाश के दोनों 
' ऋटाह में प्राय: गोलाकार घूम गई है और प्रथ्वी के घूमते रहने 
से उसका एक खंड एक बार और दूसरा खंड दूसरी बार 
दिखाई पड़ता है । इन्हीं खण्डों में आकाश-मण्डल में हमको 
दिखाई देनेवाले अधिकांश तारे स्थित हैं । 
देखने में तो अनंत तारे परस्पर सटे-से जान पड़ते हैं, 
परन्तु यह इष्टिश्रम हे। आधुनिक पाश्वात्य ज्योतिर्विदों ने 
पता लगाया है कि इनमें एक-दूसरे की दूरी अरबों मीलों की 
हो सकती है; और हमारी तो इनसे इतने मीलों की दूरी है कि 
उतनी संख्या लिखने सें भी नहीं आ सकती । जिन तारों की 
दूरी ऐसी संख्यातीत है, फिर शब्दों में उसे व्यक्त करने का भी 
कुछ उपाय है ? हाँ, वेज्ञानिकों ने उसके लिए एक युक्ति निकाली 


आकाश-गंगा ३१ 


जज ्जजजप्ि््व्तज्ज्ज्ञ्ल््ल्त जज जज जि ्जजि जि जब जी चलो जात 


! है। भौतिक विज्ञानवालों ने रश्मि-मापक यंत्र के द्वारा यह पता 
लगाया कि प्रकाश का बेग एक सेकंड सें एक लाख ८६ हजार 
मील है; अर्थात्‌ सूर्य से जो प्रकाश हमारे पास लगभग सवा 
नौ करोड़ मील चलकर आता है, वह प्रति सेकंड १ लाख ८६ 
हज़ार मील के बेग से चलकर आता है। इस यात्रा में इसी 
लिए उसे आठ मिनटों से कुछ अधिक लगते हैं। अब हम सूये 
की दूरी सवा नौ करोड़ सील न कहकर सवा आठ ग्रकाश- 
मिनट कहें, तो भी कुछ समझ में आने का आधार मिल जाता 
है। कहने में लाधव भी होता है। अब मान लीजिए कि किसी 
तारे की दूरी ऐसी हो कि उससे प्रकाश के आने में आठ मिनटों 
के बदले आठ घंटे लगते हों या आठ दिन लगते हों या आठ 
महीने लगते हों या आठ वे ही लगते हों, तो हम सहज में. 
उनकी दूरी के परिमाण को प्रकाश के आठ घंटों, दिनों, मासों 
या वर्षो में व्यक्त कर सकते हैं । आठ वर्षों में जिस तारे से 
प्रकाश आता है डसकी दूरी हमसे पौने पांच नील सीलों के 
लगभग होगी । परंतु जहां से आठ हज़ार वर्षों में प्रकाश आता 
होगा, वहाँ की दूरी हमसे पौने सैंतालीस पद्म मीलों के लग-भग 
होगी ! परन्तु तारे तो इतनी दूरी पर हैं कि उनसे प्रकाश के 
आने में लाखों वरसों का समय लग सकता है। ऐसी अवस्था 
में न तो सीलों की गिलती में उसे ला सकते हैं और न कुछ 
समय में ही आ सकता है | ह 

जिस आकाश के भीतर अनंत दूरी है, वह अनंत देश है । 
जिस विश्व सें नित्य ब्रह्मांडों की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय की कहानी 
दुहराई जाती है, उसके महाप्रलय या महोत्पत्ति का काल क्‍या 
है, यह अचित्य है, अनंत है । फिर विश्व भी एक दो हों, तो कुछ 
कहा जाय | विद्व भी तो अनन्त हैं | उनका आदि न जानने से 
हम उन्हें अनादि कह सकते हैं | फिर मध्य का निर्णेय किस. 


अनिल लनजीजिलि जि लडि जा बी ना 





न्जज्जि-जि जि जज 


8२ लेखलतिका 





परिमाण से हो ९ अर्थात्‌ यह विश्व-विराद अवश्य ही देश ९ 
ओर काल से अतीत और अपरिमित* है । अब विश्वों और 
ब्रह्मांडों की पुराणबत्‌ नई कथा सुनिए । । 
आकाश-गंगा के तारे इतनी दूरी पर हैं कि उनकी दूरी 
प्रकाश-वर्षों से भी गिनना कठिन है । उनकी आपस की दूरी भी 
ऐसी ही भयानक है| जब सटे हुए तारों की यह दशा है, तब 
उन तारों की चर्चा ही क्या है जो आकाश-गंगा के बाहर दूर-दूर 
पर स्थित हैं। आधुनिक ज्योतिर्विद्‌ कहते हैं कि आकाश-गंगा 
एक विश्व है, जिसमें असंख्य ब्रह्मांड हैं; और हर एक 
टिसटिमाता तारा अपने-अपने ब्रह्मांड का नायक सूर्य 
है । हम जो छोटे-छोटे तारे देखते हैं, वे वास्तव में बड़े सूर्य हैं 
जिनमें से अनेकानेक इतने बड़े हैं कि जिनके सामने हमारे 
सूर्य का महा-पिंड एक रेखु के बराबर भी नहीं ठहरता। हम 
इस तरह असंख्य ब्रह्मांडों के नायकों के दर्शन करते हैं । हमारे 
ब्रह्मांड की स्थिति इसी आकाश-गंगा के मध्य आकाश में है। 
देखने में हमारा सू्ये लुब्धक* है; अगस्त्य, अग्नि आदि 
अनेक तारे आकाश-गंगा से दूर ज्ञान पड़ते हैं, परंतु कोई 
आख़ये की बात न होगी; यदि वे सभी स्वतन्त्र तारे आकाश- 
गंगा के ही अन्तगेत हों, परन्तु हमारी स्थिति के कारण 
ही ये आकाश-गंगा से प्रथकू-से लगते हैं | हमारा ब्रह्मांड 
तो आकाश-गंगा के मध्य में ही कहीं अनुमित होता है। 
बिलकुल स्वच्छ नीले आकाश में जेसे दूध-सी फेली हुई सफ़ेदी 
आकाश-गंगा में है, बेसे ही दूध-से धव्वे कहीं-कहीं और दिखाई 
देते हैं | दूरचीन से देखने पर तो इस अनंत आकाश में ऐसे 
हज़ारों-लाखों दुधिया तारा-मंडल मिलते हैं, जिनका आकार 
कुएठली-सा फिरा हुआ लगता है | ज्योतिषियों ने इनका नाम 
“तीहारिका” रखा है।ये नीहारिकाएँ अनंत और कल्पनातीतता 


आकाश-गंगा ३ 


हज जी जी + जी 4: 3ज+५७+५त जी टी जीजी २५७ जा +त तल 3ल जलती तीन जी जी जी नी जी जी जी जीजीजी जी सती जी जी 


दूरी पर हैं । कहा जाता है कि हमारी आकाश-गंगा भी ऐसी ही 
एक नीहारिका है। नीहारिकाएँ कुंडली के आकार की होती हैं। 
यह आकाश-गंगा कुंडली के आकार की है। हमारा ब्रह्मांड 
किसी ऐसे देश में है, जहाँ से कुंडली के दोनों ओर का भाग 
घूमा हुआ है, इसीलिए हमें दो आकाश-गंगाएँ दिखाई देती हैं। 
जिन नीहारिकाओं को हम आकाश-गंगा से दूर, बहुत छोटे 
आकार में देखते हैं, बहुत संभव है कि उनका विस्तार और 
/आयतन' हमारी आकाश-गंगा से भी अधिक हो। बर्तेमान 
ज्योतिर्विदों का अनुमान है कि एक-एक नीहारिका एक-एक 
विश्व है, जिसके अन्तर्गत अनन्त ब्रह्मांड हें। दूरवीक्षण यंत्र 
से इस तरह की अनेक नीहारिकाएँ देखने में आई हैं, जो एक- 
दूसरी की आड़ में छिपी हैं। अतः दूरबीन के सहारे हम हज़ारों 
लाखों विश्वों के दर्शन कर सकते हैं। परन्तु दूरबीन की शक्ति 
भी पंरिमित है। ऐसे। अनुमान हो सकता है कि इन विश्वों के 
सिया असंख्य विश्व होंगे ! और हर एक में असंख्य ब्रह्मांड !! 
हम आकाश मंडल में जो इतनी नीहारिकाएँ दूर-दूर पर देखते 
हैं, उनमें वास्तव में आकाश-गंगा वाले विश्व के भीतर से, 
अनंत देश के असीम भरोखों से, अपने विश्व की सीमा के 
बाहर अनंत असीम आकाश-देश में स्थित ओर विश्वों के 
दर्शन करते हैं। इसी से हमें ये थोड़े से विश्व, थोड़ी-सी 
नीहारिकाएँ दिखाई देती हैं । यदि इस विश्व के महा-मंदिर से 
बाहर निकलकर अपरिछिन्न* दृष्टि से देखने का साधन उपलब्ध 
होता, तो हम अनन्त विश्वों के दर्शन कर सकते, और तब 
हमारी आकाशं-गंगा, जो समस्त व्योम-मण्डल को घेरे हुए 
जान पड़ती है, एक मेघ-विन्दु के समान दिखाई पड़ती। और 
यदि ऐसा संभव होता कि हम दो नीहारिकाओं या विश्वों के 
अनंत अंतराल देश में अपने को स्थित पाते, तो उस समय 





३४ लेखलतिका 


हज सम फट 





-+४2 जलती जल 5 < 


आकाश का दृश्य हमारे लिए नितांत भिन्‍न होता। आकाश में 
एक भी आकाश-यंगा न दिखाई देती । जो नक्षत्र जिस प्रकार 
आज हम देखते हैं, वे तो शायद कहीं देख न पड़ते या असंख्य 
नीहारिकाओं के नीहार में छिप जाते। साथ ही अनेक नये 
जाज्वल्यमान नक्षत्र और तारे नये-नये स्थानों में दिखाई पड़ते । 
इनमें हमें अपने सूर्य-चन्द्रमा भी दूँ ढे न मिलते । 

ऐसी अद्भुत अनंत्तता, विचित्र अनादिता और विस्मयकारी 
अमध्यता जिस विराट पुरुष के अन्दर है, उसके “पादोउस्य 
विश्वा भूतानि??*---एक चौथाई में ही सारे विश्वों की सृष्टि है !!! 

हमारी आकाश-गंगा भी ऐसी ही एक नीहारिका है, जिसमें 
हमारे जैसे असंख्य ब्रह्मांड हैं। अनेक बन चुके हैं, अनेक बन रहे 
हैं, अनेक भविष्य के गर्भ में निहित हैं| हमारे ब्रह्मांड में भो 
अनेक ग्रह हैं जो हमारी प्रथ्बी-सरीखे बड़े-बड़े पिंड हें। 
कई सं सार-रचना की तैयारी में हैं, कई के संसार संसरण* कर 
रहे हैं, कई के संसार अपनी पूर्णायु भोगकर अपनी यात्रा की 
सीसा की ओर चल रहे हैं ओर कई उसी सीमा पर पहुँचकर 
यात्रा पूरी कर चुके हैं | हमारी धरती ने अभी अपना जीवन 
आरंभ किया है । अनेक वेज्ञानिकों के मत से इसके जीवनमय 
जीवन को कुंछ ऊपर दो करोड़ वरस हुए होंगे । हिंदुओं का भी 
ऐसा ही मत है। वे कहते है. कि श्वेत बाराह कुल्प का -यह 
अट्टाइसवाँ कलियुग है, जिसके केबल पाँच हजार इकतीस 
बरस चीते हैं | इस हिसाब से भी दो करोड़ से कुछ ऊपर बरस- 
वीत चुके हैं. । रे ह 

हमारी गणना केबल यहीं नहीं मेल खाती; सभी जगह, 
हमारी पौराणिक संख्याएँ वेज्ञानिक संख्याओं से मेल खाती 
हैं। इतना ही नहीं, विश्व की सृष्टि के सिद्धांत भी मिलते हैं। 
कथाओं पर विचार करने से अद्भुत मेल मिलता है । ज्ञीर-सागर, 





जजीजीजीनीज 


मजदूरी और प्रेम ३४ 








शेष-शय्या, महालक््मी-नारायण का शयन, कमल का उद्धव 
ब्रह्म की उत्पत्ति, मधुकेटभ का युद्ध, मेदिनी-निर्माण, मंगल की 
उत्पत्ति इत्यादि कथाओं का एक बहुत ही विचित्र समन्वय 
होता है। 


£ बिक 
मजदूरी ओर प्रेम 
( श्री प्रो० पूर्णसिंह एम. एस-सी. ) 

हल चलाने और भेड़ चरानेवाले प्रायः स्वभाव से ही 
साधु होते हैं । हल चलानेवाले अपने शरीर का हवन किया 
करते है] खेत उनकी हवनशाला* है। उनके हवनकंड की ज्वाला 
की किरणें चावल फे लंबे और सफ़ेद दानों के रूप में निकलती 
' हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस अग्नि की चिनगारियों की 
डलियाँ-सी हैं। में जब कभी अनार के फूल और फल देखता 
हूँ तब मुझे बाग के माली का रुधिर याद आ जाता है। उसकी 
मेहनत के कण ज़मीन में गिरकर उगे हैं, और हवा तथा प्रकाश 
की सहायता से वे मीठे फलों के रूप में नज़र आ रहे हैं। 
किसान मुझे अन्न में, फूल में, फल में, आहुति हुआ-सा 
दिखाई देता है। कहते हैं त्रह्माहुति से जगत्‌ पैदा हुआ। 

अन्न पैदा करने में किसान भी ब्रह्मा के समान हें । ; 
दया, वीरता और प्रेम जैसा इन किसानों में देखा जाता है,. 
न्‍्यन्न सिलने का नहीं | गुरु नानक ने ठीक कहा है--'भोले 
भाव मिलें रघुराई।” भोले-भाले किसानों को ईश्वर अपने खुले 
दीदार* का दशन देता है । उनकी फूस की छवों में-से सूर्य 
और चंद्रमा छन-छन कर उनके विंस्तरों पर पड़ते हैं। ये प्रकृति के 
जवान साघु हैं । जब कभी में इन वे-मुकुट के गोपालों का." « - 


३६ लेखलतिका 


जि बज जज जी ल्‍ः जडिज-जजी जी जी जी डील, 


करता हूँ, मेरा सिर स्वयं ही कुक जाता है। जब मुझे किसी 
किसान के देन होते हैं तब मुझे मालूम होता है कि नंगे सिर, 
नंगे पाँव, एक टोपी सिर पर, एक लंगोटी कमर में, एक काली 
कमली कंधे पर, एक लस्बी लाठी हाथ में लिये हुए गौओं का 
मित्र, बेलों का हमजोली, पत्तियों का हमराज,* महाराजाओं का 
अन्नदाता, बादशाहों को ताज पहनाने और सिंहासन पर 
विठानेवाला, भूखों और नंगों का पालनेवाला, समाज के 
पुष्पोद्यान का माली और खेतों का वाली* जा रंहा है। 

एक वार मैंने एक बुडढे गडरिये को देखा। घना जंगल 
है | हरे-हरे वृक्षों के नीचे उसकी सफ़ेद ऊनवाली भेड़े'. अपना 
मुह नीचा किये कोमल-कोमल पत्तियां खा रही हैं। गडरिया 
बेठा आकाश की ओर देख रहा है। ऊन कातता जाता है। 
उसकी आँखों में श्रेम-लाली छाई हुई है। बह नीरोगता की 
पवित्र मदिरा से मस्त हो रहा है | बाल उसके सारे सफ़ेद हैं। 
ओर क्यों न सफ़ेद हों ? सफ़ेद भेड़ों का मालिक जो ठहरा। 
परन्तु उसके कपोलों से लाली फूट रही है। बरफ़ानी देशों में 
वह मानो विप्शु के समान ज्षीर-सागर में लेटा है। उसकी 
प्यारी स्त्री उसके पास रोटी पका रही हे।उसकी दो जवान 
कन्याएँ उसके साथ जंगल-जंगल भेड़ चराती घूमती हैं। अपने 
माता-पिता ओर भेड़ों को छोड़कर उन्होंने किसी और को 
नहीं देखा । मकान इसका बे-मकान* है, घर इनका बे-घर है, ये 
लोग बे-नाम* और वे-पता हैं | 

किसी घर में न धर कर येठना इस दरें फ्रानी* में । 
ठिकाना चैटिकाना ओर मर्कों यर ला-मर्कों# रखना ॥ 

इस दिव्य परिवार को कुटी की ज़रूरत नहीं | जहाँ जाते 
हैं, एक घास की मोंपड़ी बना लेते हैं। दिन को सूर्य और 
रात को तारागण उनके सखा हैं । 


मजदूरी और प्रेम ३७ 


जऔ >ी जी जज डरती सती जी जी जी जी जी जल ली न ज्जीजीज-_ज जज जल न्‍ जज जी जी जिलि लि जी जज जज 


गडरिये की कन्या पर्वेत के शिखर के ऊपर खड़ी सू्थ का 
अस्त होना देख रही है । उसकी सुनहली किरण इसके 
लावण्यमय* मुख पर पड़ रही हैं। यह सूर्य को देख रही 
है और वह इसको देख रहा है । 

हुए थे आँखों के कल इशारे इधर हमारे उधर तुम्हारे । 

चले थे अश्कों* के क्‍या फ़ैब्बारे इधर हमारे उधर सुम्दारे ॥ 

बोलता कोई भी नहीं । सूथ उसकी युवावस्था की पवित्रता 
पर मुग्ध है और वह आशख्र्य के अवतार सूर्य की महिमा के 
तूफ़ान में पड़ी नाच रही है । 

इनका जीवन बफ़े की पवित्रता से पूण और बन की सुगंधि 
से सुगंधित है। इनके मुख, शरीर और अंतःकरण सफ़ेद, 
इनकी बी, पर्वेत और भेड़ें सफ़ेद । अपनी सफ़ेद भेड़ों सें यह 
परिवार शुद्ध सफ़ेद इंश्वर के दशन करता है । 

जो खुदा को देखना हो तो में देखता हूँ तुम को । 
में देखता हूँ तुम को जो खुदा को देखना द्वो॥ 

भेड़ों की सेवा ही इनकी पूजा है। ज़रा एक भेड़ बीमार 
हुई, सव परिवार पर विपत्ति आई । दिन-रात उसके पास 
बेंठे काट देते हैं। उसे अधिक पीड़ा हुई तो इन सब की आँखें 
शून्य आकाश में किसी को देखते-देखते गड़ गई । पता नहीं ये 
किसे बुलाती हैं | हाथ जोड़ने तक की इन्हें फुरसत नहीं | पर 
हा, इन सब की आंखें किसी के आगे शब्दरहित, संकल्परहित 
मौन आधेना सें खुली हैं।दो रातें इसी तरह गुज्षर गई। 
इनकी भेड़ अब अच्छी है | इनके घर मंगल हो रहा है | सारा 
परिवार मिलकर गा रहा है। इतने में नीले आकाश पर बादल 
घिर आये और भमम-मम वरसने लगे। मानों प्रकृति के देवता 
भी इनके आनंद से आनन्दित हुए। वृढ़ा गढरिया आनंदोन्मत् 
होकर नाचने लगा। बह कहता कुछ नहीं, पर किसी दैवी दृश्य 


छ््द लेखलतिका 


अजीज डीजीऑज जी अल ् जज नस ली जी४लऊी जज _ जी जज 





को उसने अवश्य देखा है। फूले अंग नहीं समाता; रग-रग 
उसकी नाच रही है । पिता को ऐसा सुखी देख दोनों कन्याओं 
ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर पहाड़ी राग अलापना आरंभ 
कर दिया | साथ हो धम-धम थस-थम नाच कर उन्होंने धूम 
मचा दी । मेरी आँखों के सामने ब्रह्मानंद का समाँ बाँध दिया। 
मेरे पास मेरा भाई खड़ा था। मैंने उसे कहा--भाई, अब 
मुझे भी भेड़ें ले दो |” ऐसे ही मूक जीवन से मेरा भी कल्याण 
होगा | विद्या को भूल जाऊँ तो अच्छा है। मेरी पुस्तकें खो 
जाबें तो उत्तम है। ऐसा होने से कदाचित्‌ इस बनवासी 
परिवार की तरह मेरे दिल के नेत्र खुल जायें और में ईश्वरीय 
भलक देख सकूँ। चंद्र और सूर्य की विस्तृत ज्योति में जो 
बेदगान* हो रहा है उसे इस गडरिये की कन्याओं की तरह में 
सुनतो न सकूँ, परन्तु कदाचितत्‌ प्रत्यक्ष देख सकू । कहते हैं 
ऋषियों ने भी, इनको देखा ही था, सुना न था । परिडतों की 
ऊटपटांग बातों से मेरा जी उकता गया है। प्रकृति की संद-संद 
हँसी में ये अनपढ़ लोग ईश्वर के हँसते हुए ऑठ देख रहे हैं 
पशुओं के अज्नान में गंभीर ज्ञान छिपा हुआ है। इन लोगों के 
जीवन में अद्भुत आत्मानुभव भरा हुआ है । गडरिये के 
परिवार की प्रेम-मज़दूरी का मूल्य कौन दे सकता है ९ 

आपने चार आने पेसे मज़दूर के हाथ में रखकर ऋहा--यह 
लो दिन भर की अपनी मजदूरी |? बाह, क्‍या दिल्लगी है! 
हाथ, पाँच, सिर, आँखें इत्यादि सब-क्रे-सच अवयव* उसने 
आपको अपण कर दिये । ये सब चीज़ें उसकी तो थीं ही नहीं 
थे तो इश्चरीय पदार्थ थे। जो पेसे आपने डसको दिये वे भी आप 
के न थे। वे तो प्रथ्व्री से निकाले हुए घातु के ठुकड़े थे; अतण्व 
इश्चर के निर्मित थे | मजदूरी का ऋण तो परस्पर की 
प्रेम-सेवा से चुकता होता है, अन्नन्धन देने से नहीं।वे तो 


मजदूरी ओर ग्रेम शे६ - 


दोनों ही ईश्वर के हैं.। अन्न-धन वही बनाता है ओर जल भी 
वही देता है। एक 'जिल्द्साज़ ने मेरी एक पुस्तक की जिल्द 
बाँध दी । में तो इस मजदूरं को कुछ भी न दे संका। परन्तु 
उसने भेरी उम्र भर के लिए एक विचित्र वस्तु भुझे दे डाली ! 
जब कभी मैंने उस पुस्तक को उठाया, मेरे हाथ जिल्द्साज़ के 
हाथ पर जा पढ़े । पुस्तक देखते ही मुझे जिल्दसाज़ याद आ 
जाता है। वह मेरा आमरण मित्र हो गया है। पुस्तक हाथ सें 
आते ही मेरे अंतःकरण में रोज सरतमिलाप* का-सा सो वँध 
जाता है । । । ह 
आजकल भाष की कलों का दाम तो हज़ारों रुपया है, 
परन्तु मनुष्य कौड़ी के सो-सौ विकते हैं। सोने ओर चाँदी की 
प्राप्ति से जीवन का आनंद नहीं मिल सकता | सच्चा आनंद 
तो मुझे मेरे काम से मिलता है। मुझे अपना काम मिल जाय 
तो फिर स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा नहीं, मनुष्य-पूजा ही सच्ची 
९ मु है न ञी ० है ९ 
' इश्वर-पूजा है। मंदिर और गिरजे में क्‍या रखाहे? इंट, 
पत्थर, चूना कुछ ही कहो--आज से हम अपने ईश्वर की 
तलाश मंदिर, मसजिद, गिरज। और पोथी* में न करेंगे । अब 
तो यही इरादा है कि मनुष्य की अनमोल आत्मा में ईश्वर के 
द्शैन करेंगे। यही आटे” है--यही धरम है | सनुष्य के हाथ ही 
से तो इंश्वर के दशेन करानेवाले. निकलते हें। मनुष्य और 
मनुष्य की सज़दूरी का तिरस्कार करना नास्तिकता है। विना 
काम, विना मज़दूरी, विंना हाथ के कला-कोशल के, विचार 
ओर चिंतन किस काम के ! सभी देशों के इतिहासों से सिद्ध 
है कि निकम्मे पादड़ियों, मौलवियों, पंडितों और साधुओं का 
दान के अन्न पर पला हुआ इश्वर-चिंतन, अन्त में पाप, 
आतलस्य और भ्रष्टाचार में परिवर्तित हो जाता है। जिन देशों 
में हाथ और मुंह पर मज़दूरी की धूल नहीं पड़ने पाती चे 





घर  लेखलतिका 


वीजिजिजज जी जज डील जी ॑ जज जज: लत + जज िििजज जज जी जल जज जज जज जज जज 


की हलवा-पूरी उन्होंने एक हाथ में और भाई लालो की मोटी 
रोटी दूसरे हाथ में लेकर दोनों को जो दवाया तो एक से लोहू 
टपका और दूसरी से दूध की घारा निकत्ती | बाबा नानक का 
यही उपदेश हुआ ! जो धारा भाई लालो की मोटी रोटी से 
निकली थी वही समाज का पालन करने वाली दूध की घारा है । 
यही धारा शिवजी की जया से ओर यही धारा मजदूरों की 
डँंगलियों से मिकलती है। 

मज़दूरी करने से हृदय पवित्र होता है; संकल्प दिव्य 
लोकांतर में तिचरते हैं। द्वाथ की मजदूरी ही से सच्चे ऐश्वये 
की उन्‍्नत्ति होती है। जापान में मेंने कन्याओं और स्त्रियों को ऐसी 
कल्लावती* देखा है कि वे रेशम के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी दस्त- 
कारी की बदौलत हज़ारों की कीमत का बना देती हैं, नाना प्रकार के 
प्राकृतिक पदार्थों और दृश्यों को अपनी सूई से कपड़े के ऊपर 
अंकित कर देती हैं | जापान-निवासी कागज, लकड़ी और पत्थर 
की बड़ी अच्छी मूर्त्तियाँ बनाते हैं| करोड़ों रुपये के हाथ के 
बने हुए जापानी खिलौने विदेशों में विकते हैं; हाथ की बनी 
हुई जापानी चीज़ें मशीन से बनी हुईं जापानी चीज़ों को सात 
करती हैं। संसार के सब वाज़ारों में उनकी बढ़ी माँग रहती 
है। पश्चिमी देशों के लोग हाथ की बची हुई जापान की अद्भुत 
वस्तुओं पर जान देते हैं। एक जापानी तत्त्वज्ञानी* का कथन है 
कि हमारी दस करोड़ दँगलियाँ सारे काम करती हैं। इन 
डेंगलियों दो के बल से, सेंभव है, हम जगत्‌ को जीत लें (“९/९ 
जीती 985६ थी8 धए०॥० रात घी० ध०५$ ० ०ण ॥798५/) | 
जब सक घन और ऐस्वये की जन्मदात्री हाथ की कारीगरी फी 
उन्नति नहीं होती तब तक भारतवर्ष ही की क्‍या, किसी भी देश 
या जाति की दरिद्रता दूर नहीं हो सकती | यदि भारत की तीस 
करोट ससर-सारियों की हँगलियाँ मिलकर कारीगरी के काम 





मजदूरी और प्रेम ४३ 


3तटी-ी-ीी जीती जज 





करने लगें तो उनकी मजदूरी की बदौलत - कुबेर” का महल 
उनके चरणों में आप-ही-आप आ .गिरे। ' 

अन्न पेदा करना, तथा हाथ की कारीगरी और मेंहनत* से 
जड़ पदार्थों को चेतन्य-चिह्न से सुसज्जित करता, छुद्र पदाथों 
को अमूल्य पदार्थों में बदल लेना इत्यादि कौशल त्ह्मरूप होकर 
धन और ऐश्वय्ये की सृष्टि करते हैं।कविता, फ्रकीरी ओर 
साधुता के ये दिव्य कलाकौशल जीते-जागंते और हिलते-डुलते 
प्रतिरूप हैं । इनकी कृपा से सनुष्य-जाति का कल्याण होता है। 
ये-उस देश में कभी निवास नहीं 'करते जहाँ मजदूर और 
मज़दूर की मज़दूरों का सत्कार नहीं होता; जहाँ शूद्र की पूजा 
नहीं होती । हाथ से काम करने वालों से श्रेम रखने और 


ज्ल्िि्जीज्ज जज जी जीज्ल्- जी जिजीजीजी जज 


६४ 


उनकी आत्मा कां संत्कार करने से साधारण मंज़दूंरी सुन्दरता .. 


का अनुसव करने वाले कल्ा-कौशल, अथात्‌ कारीगरी- का रूप 
हो जाती है । इस आकाश के नीचे बैठे हुए मजदूरों के हाथों ने 
भगवान्‌ बुद्ध के निर्वाण-सुख* को पत्थर पर इस'तरह जढ़ा थां 
कि इतना काल वीत जाने पर पत्थर को सूं्ति के हो दर्शन से 
ऐसी शांति प्राप्त होती है जेसी की स्वयं भगवान्‌ बुद्ध के दश्शन 
से होती है | मुंह, हाथ, पाँच इत्यादि का गढ़ देना साधारण 
मज़दूरी है; परन्तु मन के गुप्त भावों और अंतःकरण -की 
कोमलता तथा जीवन की सभ्यता को प्रत्यक्ष प्रकट कर देना 
प्रेम-मज़दूरी है। शिवजी के तांडव-तृत्य* का और पावेतीजी के 
मुख की शोभा का पत्थरों की सहायता से वर्णन करना जड़ को 
चैतन्य बना देना है । इस देश में कारीगरी का बहुत दिनों से 
अभाव* है। महमूद ने जो सोमनाथ के मन्दिर में अतिप्ठित 
मूत्तियाँ तोड़ी थीं उससे उसकी कुछ भी वीरता सिद्ध नहीं 
होती । उन सूर्तियों को तो हर कोई तोड़ सकता धा। उसकी 
वीरता की श्रशंसा तब होती जब वह यूनान की प्रेस-मज़दूरी 


मर लेखलतिका 


रगवत (रुचि) बढ़ी तो सवारी जुबार के खेत सें होकर निर्कंत्ी। 
हर एक तने (संटी) में एक ही बाली निकला करती है पर एक 
तना ऐसा देखने में आया जिसमें १२ बालियाँ थीं, (देखकर) 
हेरत हुई और उस वक्त बादशाह और बाग़बान की हिकायत 
(बात) याद: आईं: | 

“एक बादशाह गे हवा में एक वाश के दरवाज़े पर 
पहुँचा । बूढ़ा वाग़वान दरवाज़े पर खड़ा था। पूछा कि इस 
वाग्म में अनार हैं ९ कहा, हैं?। बादशाह ने फ़रमायां कि एक 
प्याला ' अनार के रस का ला। बाग़बान की लड़की अच्छी 
सूरत* और स्वभाव की थी; उसको इशारा किया कि अस्ार का 
रस ले आ | लड़की गई और फ़ौरन एक प्याला अनार के रस 
का ले आई | उस पर कुछ पत्ते भी रखे थे। 

“बादशाह ने उसके हाथ से लेकर पी लिया और लड़की से - 
पूछा कि रस पर इन पत्तों के रखने का क्या मतलब था। उसने 
बढ़ी मीठी बोली से अजें किया कि ऐसी गसमें हवा में पसीने 
से इबे हुए और सवारी से पहुँचने में एक दम पानी पीना हिक- 
मत के खिलाफ़ है, इस विचार से मेंने पत्ते रस और प्याले के 
ऊपर रख दिये थे कि धीरे धीरे पीएँ | 

“उसकी यह सुद्दानी अदा* सुलतान के मन को भा गई ओर 
उसने चाहा कि में इस लड़की को महल की खिदमतगारनियों 
में दाखिल करू | ः 

(फिर उस याराबान से पूछा कि तुमको इस बाग से क्‍या 

दासिल होता है। कहा, ३०० दीनार | कहा, दीवान (कचहरी) 
में क्या देता है । कहा, कुछ नहीं | सुलतान किसी पेड़ का कुछ 
नद्ीं लेता है घल्कि खेती का भी दसवाँ हिस्सा ही लेता है। . 
“बादशाह के मन में आया कि मेरी सल्तनत में बाग 
बहुत और दरखत बेशुमार हैं, अगर बाग के हासिल भी दसवाँ 


राजाओं की नीयत से बरकत छ्७ 


की तीज. ली जी 


ग दें तो काफ़ी रुपया होता है;-ओर रेयत* को कुंछ:नुकसान- 
भी नहीं पहुँचता । अब फ़रमा दूँगा -कि बाण का भी-महसूल 
लिया करे । 

“फिर कहा कि अनार का कुछ रस और भी ला ।” लड़की 
गई और देर में अनार के रस का एक प्याला लाई ।-सुलतान 
ने कहा कि जब तू पहले गई थी -तो जल्दी आ गई थी और 

हुत ज्यादा ले आई थी | अब तूने बहुत रास्ता दिखाया और 
थोड़ा भी लाई | लड़की ने कहा कि तंब तो मैंने प्याला एक.ही 
अनार के रस से भर लिया था, अब ४-६ अनारों को निचोड़ा 
ओर उतना रस नहीं निकला | सुलवान की हैरत और भी 
बढ़ गई । 

“बाग़बवान ने अज़ की कि फल में बरकत बादशाह की 
नेकनीयती* से होती है । मेरे सन में ऐसा आता है कि तुम बाद- 
शाह होगे । जब तुमने बाग का हासिल मुमसे पूछा तो तुम्हारी 
नीयत डावॉडोल हो गई जिससे फल की वरकत जाती रही। 
सुलतान पर इस बात का बड़ा असर (प्रभाव) पड़ा और उसने 
उस ख्याल को दिल से दूर करके कहा कि एक वेर फिर अनार 
के रस का एक प्याला ला । लड़की फिर गई और जल्दी से 
भरा हुआ प्याला बाहर ले आई और उसने उसे हँसते-खेलते 
सुलवान के हाथ में दिया। ह 

“सुलतान ने बाग़वान की चुद्धेमानी पर शाचाशी देकर 
सारा हाल ज़ाहिर कर दिया - और लड़की बाग़वान से साँग 
ली | उस खबरदार वादशाह की यह हिकायत दुनिया के दफ़- 
तर में यादगार रह गद्दे।” . 

जहाँगीर अपनी ओर से इस कहानी पर लिखते हैं कि 
.इन बातों का ज्ञाहिरं होना नेकनीयत और इन्साफ़ के नतीजों 
से है । जबकि इंसाफ़ी वादशाहों की नीयत और हिम्मत दुनिया 


ध्र्द लेखलतिका 


््लल््िलिलजिजजलज जल जल जज जज जज 5 





के आराम और रैयत- की भलाई में लगी रहे-तो नेकियों का 
जाहिर होना, खेतियों तथा बाग़ों की' पेदावारों का बढ़ जाना 
मुश्किल नहीं है | खुदा का शुक्र है कि इस सलतनत+ (हिंदुस्तान) 
में पेड़ों के हासिल लेने की लाग कभी नहीं थी और न अब 
है । अमलदारी के सारे मुल्कों में एक दाम और एक कौड़ी भी . 
इस सीरो (खाते) की दीवान-आला और खज़ाने आमरे में दाखिल 
हीं होती है, बल्कि हकम है कि जो कोई खेती की ज़मीन में बाग 
लगावे तो उसका हासिल माफ़ रहे | उस्मेद है कि सच्चा खुदा 
इस न्याज़मंद (दीन-हीन) को हमेशा नेकनीयती की श्रद्धा दे । 
“जब मेरी नीयत भलाई की है तो तू मुझे भलाई दे। ॥” 
फ़ारसी भाषा के एक कबि ने बादशाहों की नेकनीयती का बखान 
करते हुए कहा है-- 
धू नीयत नेक बाशद बादशा रा। 
बजाए ग्रुल गुहर खेजद गिया रा ॥ 
अर्थात्‌ जो बादशाह की नीयत नेक हो तो फूल की जगह 
घास में मोत्ती लगे ।” 


राम और भरत 
(श्री पं० रामचन्द्र शुक्त ) 
अर्न॑त शक्ति के साथ घीरता, गंभीरता और कोमलता राम! 
का प्रधान लक्षण हैं । यही उनका रामत्वः है। अपनी शक्ति 
की स्वानुभ ति* ही उस उत्साह का मूल हैं जिससे बड़े-बड़े 
दुःसाध्य कम होते हैं ।बाल्यावस्था में ही जिस प्रसन्नता के 
साथ दानों भाइयों ने घर छोड़ा और विदश्वामित्र के साथ बाहर 


॥ शुतर नहाँगीरी, जिद २, एछ २५४३-४४ | 





राम और भरत ४६ 


बत्ती >> जप लत तल 22 जध कल ट लत सीसी िितबली सीटी +ध्ल्सलडी जि जजजजजजज्जिलिलड जो जल ँं  ड ल्््््जघजक्‍ ० 


रहकर अस्त्र-शिक्षा प्राप्त की तथा विन्नकारी विकट - राक्लसों पर 
पहले-पहज़ अपना बल आज़माया, वह उस उल्लासपूंणों साहस 
का सूचक है जिसे “उत्साह” कहते हैं। छोटी अवस्था में ही ऐसे 
विक्रट प्रवास* के लिए जिनकी धड़क खुलती हमने देखी उन्हीं 
को पीछे चोदह वर्ष वन में रहकर अनेक कष्ठों का सामना करते 
हुए, जगत्‌ को छुब्ध करने वाले कंभकर्ण और रावण ऐसे 
राक्षसों को मारते हुए हम देखते हैं । इस प्रकार जिन परिस्थि- 
तियों के बंचच वीर-जन का विकास होता है; उनकी परंपरा का 
निवांह हम क्रम से रामचरित में देखते हैं। राम और लक्ष्मण , 
ये अद्वितीय वीर हम उस समय प्रथ्वी पर पाते हैं। वीरता 
की दृष्टि से हम कोई भेद दोनों पात्रों में नहीं कर सकते। 
पर सीता के स्वयम्बर में दोनों भाइयों के स्वभाव में जो 
पाथ्थक्य* दिखाई पड़ा उसका. निर्वाह हम अंत तक पाते हैं। 
जनक परिताप-वचन पर उग्रता और परशुराम की वातों के 
उत्तर में' जो चपलता.- हम  लक्ष्मंण में देखते हैं, उसे हम 
बरावर अवसर-अवसर पर देखते चले जाते हैं | इसी प्रकार 
राम की जो धीरता, गम्भीरता हम परशुराम के साथ बातचीत 
करने में देखते हैं; वह बराबर आगे आनेवाले प्रसंगों में हम 
देखते जाते हैं । इतना देखकर तत्र॒ हम कहते हैं कि रास का 
स्वभाव धीर और गस्भीर था और लक्ष्मण का उम्र और चपल | : 
धीर, गंभीर और सुशील अन्तःकरण की बढ़ी भारी 
विशेषता यह होती है कि वह दूसरे सें बुरे भाव का आरोप 
जल्दी नहीं कर सकता | सारे अवध-वासियों को लेकर भरत 
को चित्रकूट की ओर आते देख लक्ष्मण कहते हैं--- 
“कुटिल कुबंधु कुषथ्ववसर ताकी। जानि राम वनवास एकाकी ॥ 
कार कुमन्न सन साजि सम्राजू । आय कर अकटक राजू॥गा 
ओर तुरन्त इस अनुमान पर उनकी त्वोरी चढ़ जाती है. 


प्र . लेखलतिका 


नजीज 2> जल -++ललल जलती हलज़ीजडजनल:- अंजलि जज चैन जी जज जज जऔ जज जा 5 


जिसके याण खींचते ही डठी उद्धि* उर-अंतर ज्वाला?। 
उसने पहले तीन दिनों तक हर एक प्रकार से विनय की । विनय 
की मयादा पूरी होते ही राम ने अपना अतुल पराक्रम -प्रकट 
किया जिसे देख लक्ष्मण को संतोष हुआ | विनय वाली नीति 
उन्हें पसंद न थी। एक बार, दो बार कह देना ही काफ़ी 
समभते थे । 

वाल्मीकि ने राम के बनवास की आज्ञा पर लक्ष्मण के' 
महाक्रोध का बणेन किया है। पर न जाने' क्‍यों वहां तुलसी 
दास जी इसे बचा गये हैं 

चित्रकूट में अपनी कुटिलता का अनुभव करती हुई केकेयी 
से राम वार-बार इसलिए मिलते हैं कि उसे यह निम्चय हो 
जाय कि उनके मन में उस कुटिलता का ध्यान छुछ भी नहीं है 

* और उसकी ग्लानि दूर हो | वे वार-बार उसके मन में यह बात 
जमाना चाहते हैं. कि जो कुछ हुआ, उसमें डसका कुछ भी दोप 
नहीं है। अपने साथ बुराई करने वाले के हृदय को शांत और 
शीतल करने की चिता राम के सिवा और किसको हो सकती 
हैं? दूसरी वात यह ध्यान देने की है कि राम का यह शील- 
प्रद्शन इस ससय हुआ जिस समय केकेयी का अंतःकरण 
अपनी कंटिलता का पृ्ण अनुभव करने के कारण इतना 
उवीभत" हो गया था कि शील का संस्कार उस पर सच दिन के 
लिए जम सकता था। गोरवामी जी के अनुसार हआ भी 
ऐसा ही-- 
केकेयी जौ को जियति रही। 
तो लोत गाता मातु सतत मुद्द मरी भरठ ने दाल कहा । 


मानी रास श्धिऋ जननी से, सननिष्ठ गेस मे गद्ती ॥ 
इसने पर भी कहीं शॉस रह सकती है ? 


आाहरव्य-जावन के दास्पत्य साग के भीतर सबसे मनोहर 





राम और भरत ३ 


वस्तु है उनकी “एक भाया! की सर्यादा | इसके कारण यहां से 
वहां तक जिस गौरवपूरो. माधुये का भ्रसार दिखाई देता है 
वह अनिरवबेचनीय है। इसकी उपयोगिता का पक्ष दशरथ के 
चरित्र पर विचार करते समय दिखाया जायगा। 
भक्तों की सबसे अधिक वश में करने वाला राम का गुण 
है, शरणागत की रक्षा । अत्यन्त आचीन काल से ही शरण- 
प्राप्त की रक्षा करना भारतवपष में बड़ा भारी धर्म माना जाता 
है | इस विषय में भारत की प्रसिद्धि सारे सभ्य जगत्‌ में थी | 
सिकंदर से हारकर पारस का सम्राट दारा जब भाग रहा.था 
तब उसके तीन साथी सरदारों ने विश्वासघात* करके उसे 
मार डाला । उनमें से एक शकस्थान ( सीस्तान ) का ज्षत्रप 
वरजयंत था | जब सिकंदर ने दंड देने के लिए इन तीनों 
विश्वासधातियों का पीछा किया, तब वरजयंत ने 
भारतवासियों के यहां आकर शरण ली और बच गया। 
प्रचीन यहदियों के एक जत्थे का गांधार और दक्तिस में शरण 
पाना प्रसिद्ध है ।. इस्लाम की तलवार के सामने कुछ प्राचीन 
पारसी जब अपने आये-धर्म की रक्षा के लिए भागे तब भारतवर्ष 
ही की ओर उनका ध्यान गया, क्योंकि शरणागत की रक्ता 
यहां प्राण देकर की जाती थी। अपनी हामि के भय से 
शरणागत का त्याग बड़ा भारी पाप माना जाता है-- 
सरनागत कहेँ जे तजहिं, निज अनहित अनुमानि। 
ते नर पॉवर पाप-मय, तिनहिं विलोकत हामि॥ 
शरणागत की रक्षा की चिता रामचंद्र के हृदय से दारुण 
शोक के समय में भी दूर न हुईं। सामने पड़े हुए लक्ष्मण को 
: देखकर वे विलाप कर रहे हैं-- 
मेरी सब पुरुषारथ थाक्रो। 
बिपति-वैंटावन बंधु-त्राहु त्रिन करो सरोलों का को ? 





ड़ 


भ््् लेखलतिका 


सुनु सुम्रीव ! साँचहू मों सन फेरथों वदन विधाता । 
ऐसे समय समर-संकट हों तज्यो क्पन सो ज्ञावा॥ 
'। मिरि-कानन. जैंदे साखा-म्रग, धो पुनि अनुज-सैंघाति 
हो है कहा विभीपण की गति, रही सोच भरि छाती ॥ 
राम के चरित्र की इस उज्ज्चलता के बीच एक धब्वा भी 
दिखाई देता हे | वह है ब्राली की छिपकर मारना। वाल्मीकि 
ओर तुलसीदास जी दोनों ने इस धब्बे पर कुछ सफ़ेद रंग 
पोतने का अयत्न किया है) पर हमारे देखने में तो यह घब्बा 
ही संपूर्ण रामचरित को उच्च आदशे के अनुरूप एक कल्पना- 
मात्र समझे जाने से बचाता है । यद्धि एक यह घब्बा न होता तो 
राम की कोई बात मनुष्य की-सी न लगती और वे मनुष्यों के 
बीच अवतार लेकर भी मनुष्यों के काम के न होते | उनका 
चरित्र भी उपदेशक महात्माओं की केवल महत्त्वसुचक फुटकर 
बातों का संग्रह होता, मानव-जीवन की विशद्‌* अभिव्यक्ति 
सनचित करने वाले संबद्ध काव्य का विषय न होता | यह धब्चा 
ही सूचित करता हैं. कि इश्वरावतार राम हमारे बीच, हमारे 
भाई-बंधु बनकर आये थे और हमारे ही समान सुख-दुःख 
भोगकर चले गये । थे इखरता दिखाने नहीं आये थे, मनुप्यता 
दिखाने आय थ। भूल-चूक या त्रुटि से सबथा रहित मनुष्यता 
कहीं हाटी हैं ? इसी एक घह्मे के कारग हम उन्हें मानव जीवन 
से तटस्थ नहीं सममने--तटस्थ क्‍या, कुद्ध भी हूटे हुए नहीं 
समझने | ) 
अब थोड़ा भरत के लोक-परावन निर्मेल चरित्र की ओर 
ध्यान दीजिए । राम की बननयात्रा के पहले भरत के चरित्र की 
गला संघटित करने बाली कोट बात इस नहीं पाले । हगकी * 
धनपाग्वत से छा रास के ऑआशपक का लथाग सह सांग लस 
हे गये | ननिशाल से क्ोटने पर ही इसके शील्‍्-स्वरूप का 


राम और भरत 27 
स्फुरण आरम्भ होता है। ननिहाल में जब दुस्वप्त ओर! बुरे 
शकुन होते हैं, तब वे माता-पिता और भाइयों का मंगल्ल/भैन्नांते 
हैं। क्ेक़ेयी के कुचक्र में अगु-मात्र योग के. संदेह की जड़ यहीं 
से कट जाती. है | केक्रेयी के मुख से पिता के मरण का संवाद 
सुन वे शोक कर ही रहे हैं..कि राम के वन-गमन की बांत 
सामने आती है, जिसके साथ अपना संबंध, नाम-मात्र-का 
सही, समझ कर वे .एकंद्म ठक हो जाते है । ऐसी चुरी वात के 
साथ संबंध जोड़ने वाली माता के रूप में नहीं दिखाई देती:॥ 
थोड़ी देर के लिए उसकी ओर से सावृभाव हट-सा जाता है।। 
ऐसा उज्ज्वल अंतःकरण ऐसप्ती घोर कालिमा की छाया का 
स्पशे तक सहन नहीं कर सकता । यह छाया किस प्रकार हटे, 
इसी के यत्न में वे लग जाते हैं | हृदय का यह्‌ संताप , बिना 
शांति-शील-समुद्र राम के सम्मुख हुए. दूर नहीं हो सकता। 
वे चट विरह-व्यथित* पुरवासियों को लिये-लिये चित्रकूट में जा 
पहुँचते हैं और अपना अंतःकरण भरी सभा में लोकादश राम 
के सम्मुख खोलकर रखे देते हैं । उस आदशे के भीतर उसकी 
निर्मेलता देख वे शांत हो जाते हैं और जिस वात से धर्म की 
मयादा रक्षित रहे, उसे करने.की छृद्वता प्राप्त कर लेते हैं। 

भरत ने इतना सब कया लोक-लज्ञा-वश किया ९ नहीं, उनके 
हृूदय में सच्ची आत्म-ग्लानि थी, सच्चा संताप था| यदि ऐसा न 
होता तो अपनी माता केकेयी के सामने वे दु:ख ओर ज्ञोभ न 


प्रकट करते | यहे आत्म-ग्लानि!ही उनकी सीत्विक बूत्ति की... .. 


गहनता का प्रमाण हे । इस आत्म-ग्लानि के कारण का - 
अनुसंधान करने पर' हम उंस तत्व॑ तक पहुँचते हें जिसकी 
प्रतिष्ठा रामायण का प्रधान लक्ष्य हैं। आत्म-ग्लानि अधिकतरः 
अपने किसी बुरे कम को सोच कर होती है। भरत जी कोई बरी 
बात अपने मन में लाये तक न भे। फिर चह आत्म-ग्लासि 


ध्ध्‌ लेखलत्तिका 


डी हल जलती जी जी जल 4 जी जीत >ीतलीजीजी सी सीख ली सी 4 जीयली 2 पतन 4 3त टी न्‍ ली जीन ी क्‍ जी टी न्‍सी 8 8 2 


कसी १ यह ग्लानि अपने संबंध में लोक की घुरी घारणा के । 
अनुमान-मात्र से उन्हें हुईं थी। लोग प्रायः कहा करते हैं कि 
अपना मन शुद्ध है, तो संसार के कहने से कया होता; है १ यह 
बात केवल साधंना की ऐकाॉतिक दृष्टि से दीक है, लोक-संग्रह 
की दृष्टि से नहीं। आत्म-पक्त ओर लोक-पक्त दोनों का समन्वय 
राम-चरित का लक्ष्य है। हमें अपनी अंतर्वात्ति भी शुद्ध और 
सात्विक रखनी चाहिए और अपने संबंध में लोक .की धारणा 
अच्छी बनानी चाहिए। जिसका प्रभाव लोक पर न पड़े, उसे 
मनुप्यत्य का पूर्ण बिकास , नहीं कह सकते | यदि हम 
वस्तुत्तः: सात्विक-शील हैं, पर लोग श्रमवश या ओर किसी 
कारण हमें बुरा समझ रहे हैं, तो हमारी स [त्विक-शीलता 
समाज के किसी उपयोग की नहीं। हम अपनी सेतरत्विक-शीर्लेता 
अपने साथ लिये चाहे स्वगे का सुख भोगने चले जाये, पर 
अपने पीछे दस्म-पाँच आदमियों के वीच दस-पाच दिन के 
लिए भी कोई शुभ प्रभाव न छोड़ जायेगे | ऐसे ऐकांतिक जीचन 
का चित्रण, जिसमें प्रभविर्णगुता। न दो, रामायण का लक्त्य 
नहीं है । रामायण भरत ऐसे पुण्यश्लीक को सामने करता है ., 
जिनके संबंध में राम कहते हेँ--- 
मेटहाट पराप-धर्पच सब, 'साम्विक्ष-अ्मंगल-भार । 
सोक-सुदस, परक्षोक सुस्य, सुसिरत नाम सुर्द्वार ॥ 
जिन भरत की अयश्य की इतनी ग्लानि हुई, लिनके हद 
से धर्मन्माव कमी ने हटा, उनके नाम के स्मरण से लोक में यथा 
ओर परलोक में सख दोनों क्यों न प्राप दो ? 
रस के छदय का विश्लेपण” करने पर हम उसमें लोक 
भीरता, स्मेहाद्रता,” भक्ति और धर्म-प्रव गाना का मेल पाने हैं। राम , 
आश्रम पर जाफर उन्हें देगन ही भक्तिवश परा्ि ! पादि !! 


रथ 


डह > हा ० न्पु 
पहने हुए ये परू्यी घर सिर पहले है | सभा के बीच में जब ये 


राम ओर भंरत ४७ 


जि लजजज जी जज डी जीबी जज + >> जी >:: 





जीजा 


अपने हृदय की वात निवेदन करने खड़े होते हैं, तब श्राठ- 
स्नेह उमड़ आता है, वाल्यावस्था की बातें आँखों के सामने आ 
जाती हैं | इतने में ग्लानि आ दवातों है और वे पूरी बात भी 
नहीं कह पाते हैं---. ५४ . 
पुंलकि सरीर सभा भये ठाढ़े। भीरजे-नयन. नेह-जल बाढ़े॥ 
कहव सोर मुनि नाथ!निबांहा | एहि त अधिक कहों में काहा ९ 
में जानों निज-नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न' कांऊ 
सो पर कृपा-सनेह विसेखी | खेलत खुनिसे ने कबहूँ देखी ॥ 
सिसुपन ते परिहरेड न्‌ .संगू. कबहेँ न कौन्ह मोर मन भंगू॥ 
में प्रभु-कृपा-रीति जिय जोंहीं। हारेंहु खेल जितावहिं मोही ॥ 
महू सनेह-संकोच -बस सनमुख कहैड न बन । 
दरसन-तृपित न आजु लगि पेम-पियासे नेन ॥ ति 
>ब्रिधि न सकेह सहि मोर दलारों नै नीच बीच जननों मिस पारा ॥ ही 
यहउ कहत मोहि आज न शोभा । अपनी सम्लुमि साधु, सुचि को. भा ९. 
मातु मंद, 'में साथ सुच्चाली | उर अंस आनत कोटि कुचोली ॥ 
फरइ कि कोदव-बालि सुसाली । मुकुता प्रसव कि संबुक-ताली॥  ' 
बिनु सस्ुके निज-अधघ-परिपाकि | जारेड जाया जननी कहि काकू १ 
. हृदय हेरि होरेडे सब औोरा | एकहि भांति भलेहि भल मोरा ॥ 
_ झुरू गोसाई, साहिब सिय-रामू । लागत सोहि ,नीक परिनामू ॥ 
भरत को इस वात पर ग्लानि होती है. कि में आप अच्छा 
धनकर भाता को भला-बुरा कहने गया | “अपनी समुझ्ति साधु 
सुचि को भा ९” जिसे दस भले आदमी पवित्र और सज्जन 
लोग, जड़ और नीच नहीं--साधु और सुचि माने, उसी की 
साधुता ओर शुचिता किसी काम की है। इस ग्लानि के दुख .से 
उद्धार पाने की आशा एक इसी बात से होती है कि गुरु और 
, स्वामी वसिष्ठ तथा राम ऐसे ज्ञानी और सुशील हैं । कहने की 
आवश्यकता नहीं कि यह आशा ऐसे दृढ़ आधार पर थी कि 


श्द लेखलतिका 


पूर्ण रूप से फलवती हुई | भरत केवल लोक की दृष्टि में पवित्र 
ही न हुए, लोक को पवित्र करने वाले भी हुए। राम ने उन्हें 
धर्म का साज्षञात्‌ स्वरूप स्थिर किया और स्पष्ट कह दिया कि-- 

“भरत |! भूमि रह राउरि राखी । ; 


९ ् 
अवीफ ललित रजत नी वमममनन.. 


बुढ़िया और नोशेखों 


(श्री पं० पद्मेसिह शर्मा ) 


बहुत से लोगों का ख्याल है कि श्रजा-तन्त्र शासन-प्रणाली* 
की जननी नवीन सभ्यता ही है; राज-शासन में प्रजा के मतामत 
को जानकर काये करना, .योरुप के लोगों ने ही संसार को 
सिखाया है.। एशिया के पुराने शासकगण स्वेच्छाचार-परायण* 
और निरे उद्दए्ड होते थे | उनकी. शख्सी हुकूमत* में किसी को 
चू करने, या दम मारने की समजाल न थी | प्रजा.का जान-साल 
ओर उनकी जिन्दगी-मोत खुदमुख्तार/ राजा और बादशाहों की 
एक हां? या “नहीं? पर मौकूफ़* थी । जरा-सी त्ाराजगी या 
हुक्म-उदूली” पर क़त्ले-आम और 'विजनः* बोल दिया जाता था । 
जरा-जरा-सी बात पंर आन-की-आन में गाँव-के-गाँव शासकों 
की क्रोधाग्नि में फुंककर भस्म हो जाते थे। उनके मुह से जो 
बुरा-मला निकल. गया; वह इश्वरेच्छा. की तरह अमिट था।. 
फिर चांहे जो सी हो, पर उनका हुक्म. जरूर पूरा हो। उनकी 
उहण्डाज्ञा के आगे हुत्कार निकालना. “जो हुक्म हजूर” के सिवा 
कुछ और ननु-नच करना, बक्त से पहले :मौत को बुंलाना था, 
राजा और ईश्वर का एक दजों थां--जिस त्तरह-वहू बड़ा ईश्वर! 
अपना कोई काम किसी से पूछकर नहीं करता, वह जो कुंछ 
भी रहस या कदर अपने बंदों पर नाजिल* करे उसे शुक्र और 


बुढ़िया और नौशेरवाँ ४६ 


ब्ज्जिज जी जजीजजजिलजिज्ज् जज जज जज जि जि जलन बज जी जज जिज जज ली जिज ४ जिल्ज्ज्जजज जौ ऊँ ४ जी जज जज +॒+े 


- सन्न के साथ बरदाश्त करने के सिवा छुछ चारा नहीं, इसी 
तरह छोटा ईश्वर! (राजा) भी शासन में सब प्रकार से स्वतंत्र 
और-/कर्तुमकतुंमन्यथा वा कतु समर्थ:--समझा और माना 
जाता था। हुक्मे हाकिस मर्गे सक्राजात?* यह सशहूर कहावत 
उसी ज़माने की एक यादगार है। ह 

सम्भव है एशिया के पुराने तर्ज हुकूमत* के बारे में नई 
रोशनीवालों का यह ख्याल किसी हद तक ठीक हो, और यह 
भी दुरुस्त हो कि पहले यहां हुकूमत का पालिमेंटरी तरीक़ा 
बिल्कुल आजकल की तरह कभी जारी न था; यद्यपि बहुत 
से विद्वानों ने यह सिद्ध करने का प्रमाण-पुरःसर* प्रयत्न किया 
है कि पुराने सारत में. भी इस समय के ढंग से दी सिलता-जुलता 
प्रजातंत्र-प्रणाली का शासनं- प्रचलित था । यहां का पुराना 
शासन इस समय के प्रजातंत्र-शासन से भिन्न प्रकार का था, 
या बिल्कुल ऐसा ही था; और बह इससे अच्छा था या बुरा, 
इस विपय पर हम यहां विवाद करना नहीं चाहते। यहां का 
पुराना शासन-प्रकार चाहे किसी ढक्गध का था, पर उसमें यह 
बात नहीं थी ) जेसा कि आजकल की नई रौशनी के परवाने 

'कितनेक महाशयों का ख्याल है कि-- भारत के पुराने शासक 
'निरे गवरगण्ड राजा के क्लास के होते थे, न्याय. में उनकी 
इंच्छा ही सब कुछ थी / पुराने इतिहासों में ऐसे उदाहरणों 
की कमी नहीं है, जिनसे अच्छी तरह सिद्ध होता है कि न्‍्योय 
'के लिए प्रजा. की पुकार पर पूरा ध्यान दिया जाता था। साथा- 
र॑ण से साधारण ओर तुच्छातितुच्छ व्यक्ति भी कभी-कभी 
न्याय के वल पर बड़े-बड़े सम्रादों के सामने डट जाते थे; और 

उनके न्याय-संगत पक्ष से उन स्वच्छन्द शासकों को पराहत 
होना पड़ता था । आज हम-ऐसा ही एक पुराना ऐतिहासिक 
उदाहरण पाठकों के सामने रखना चाहते हैं, जिसकी मिसाल 


६० लेखलतिका ५ 





>>-ल्‍ न > सीसी सी > >> जज जज घी स्‍ उस सजी सजी ल्‍७त ली ही 4 ल्‍ बज डी डी जी जी 4७५ 


बीसवीं सदी के पार्लिसेंटरी रिपव्लिक या अजातंत्र-प्रात्नी 
के शासन में भी शायद ही कहीं मिले | यह घटना एशिया 
खण्डान्तर्गत फ़ारस (ईरान) देश के सुप्रसिद्ध बादशाह 'नोशेरवाँ 
आदिल?* के सम्बन्ध की है । 

मशहूर है कि नौशेरवाँ के शाही महल की बगल में एक 
बुढ़िया भड़भुंजन की फूँंस की मोंपड़ी थी । जब महल की 
नींव डाली जाने लगी तो बुढ़िया से उसकी भोंपड़ी माँगी गई। 
मोंपड़ी के बिना सिलाये सहल सीधा न बनता था। उसके 
बदले में बुढ़िया को बढ़िया-से-बढ़िया मकान और मुह- 
भांगे दाम देने को कहा गया, पर उस ज़िददन बुढ़िया ने किसी 
तरह अपनी झोपड़ी को छोड़ना पसन्द न किया। वह बराबर 
यही कहती रही कि “में अपनी मोपड़ी पर बादशाह के सारे 
'महलों को निछावर करके फेंक दूंगी, भाड़ की आग से फूक 
दूगी पर अपनी मोंपड़ी न छोड़'गी |” लाचार होकर बुढ़िया 
की भापड़ी छोड़ दी गई, और ख़म* देकर महल बनाया गया। 
भहल बनने के बाद जब यह देखा गया कि बुढ़िया की मॉपड़ी 
के उठते हुए घुएँ से शाही महल का कोना काला होता है तो 
बुढ़िया से कहा गया कि तू भाड़ चढ़ाना बंद कर, और चूल्हा 
सत फूक, क्‍योंकि इससे महल का कोना काला हुआ जाता है, 
तेरे लिए शाही लंगर से अच्छे-से-अच्छा खाना मिल जाया 
करेगा |! पर बुढ़िया ने यह भी स्वीकार न किया, उसने कहा 
कि में कोई भिखारन या अपाहज# नहीं हूँ जो शाद्दी लंगर की 
रोटियों से अपना पेट पालू |! ' 

' बुढ़िया के भाड़ और चूल्हे का घुआँ बरावर महल फो 

काला करता रहा, पर आदिल नोशेरवाँ के अदल (न्याय) ने 
इस बात की आज्षा न दी कि उसे जबरन” बन्द करा सके |. 

नोशेरवाँ का वह तिरछा और बुढ़िया की झोपड़ी के उठते 


भेड़्यों द्वारा पाले हुए लड़के ६१ 


नीजिजिजिजीजीजील जी जी जज लि _ जज जी चीज सी जज ज्ज्जी जज जज जिज्ज्ज्ज्ज्ि् जि जज जज जि जि जज जल जी जज जी 


ई हुए धुएँ से मैला महल, नोशेरवाँ के न्याय की समता को और 


५409. 


उसके शशि-शुश्र* यश के प्रकाश को अब तक संसार में फेला 
रहा है | नौशेरयाँ का वह आकाश से छूने वाला महल और 
बुढ़िया की कुकी हुई कोंपड़ी, दोनों ही समय पर आकर खाक 
में मिल गये; बादशाह ओर बुढ़िया भी कभी के संसार से 
विदा हो गये; पर उनकी यह न्‍्याय-कहानी अब त्तक ज़िंदा 
है। ऐसे ही सत्कार्यों ने नोशेरबाँ के नाम को अजर अमर बना 
दिया है। इसी लिए वह आदश “आदिल?”? (न्याय करने वाला) 
कहलाता है--शेख सादी? ने इसी लिए यह कहा है और 
बिल्कुल ठीक कहा है:-- 

कार हिलाक शुद के चद्दलख़ाना गनन्‍्ज दाश्त, 

नौशेरवाँ न सुर्द के नामे-निको गुज्ञाश्ता। 

. “-कारूँ हिलाक* हो गया--मर गया, यद्यपि उसके पास 
चालीस कोठरियां खजाने की थीं, नोशेरवाँ- नहीं मरा, क्योंकि 
बह अपना नेक-नाम दुनिया में छोड़ गया--कीर्तियेस्य सः 
जीवति” |* ः ब् 


न्‍िकनफन+-. व्सपमन«५-ज+ भाममकमरका 


डेयों सी ल्ल था. 
भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के 
( श्री सन्‍्तरास, बी० ए० ) 

कोआ कोयल के अंडे; वत्तत्न राजहंस के अंडे, और मुर्गी 
मोर के अंडे सेकर्‌ बच्चे पाल देती है | बन से पकड़ कर लाय 
हुए हिरण के छोटे बच्चे की बकरी दूध पिला देती है। ये बातें 
ऐसी हैं जिन्हें सब कोई जानता है। इसलिए इनको सुन कर 
आश्वयय नहीं होता | पर मनुष्य के बच्चे को भी बनैले” 
जीव-जन्तु पाल लेते हैं, इस वात पर आपको सहसा विश्वास 





६४ लेखलतिका 








बाद को जो विभिन्‍न समयों में जीते-न्ागते और सकुशल इन , 


जन्तुओं के साथ पाये गये थे। इजटन की पत्रिका में इस घटना 
का वृत्तान्त इस प्रकार दिया गया है-- 

“अवध के नवाब के दो सवार गोमती नदी के किनारे- 
किनारे जा रहे थे। उन्होंने तीन जन्तुओं को नदी में पानी 
पीने आते देखा । दो तो स्पष्टतः सेड़िये के बच्चे थे, पर तीसरा 
स्पष्टतः कोई दूसरा ही जन्तु था। सवारों ने एकदम उसके पीछे 
घोड़े दौड़ा दिये और तीनों को पकड़ लिया। उन्हें देखकर 
बड़ा आश्रय हुआ कि उनमें से एक छोटा-सा नज्ञा लड़का 
था | वह अपने साथियों की भाँति हाथों और पैरों के बल 
चलता था । उसके घुटनों ओर कुहनियों पर घट्ट पड़े हुए थे। 
वह अपने आप को छुड़ाने के लिए पकड़ने वालों को दाँतों से 
काटता और नाखूनों से खरोंचेता था। लड़के को लखनऊ लाया 
गया । वहाँ बह कुछ समय तक जोता रहा । वह बिलकुल कोई 
शब्द नहीं बोल सकता था। पर ज्समें कुत्ते-की-ऐसी बुद्धि 
थी | बह संकेत को तुरन्त समझ लेता था ।? 

जियोलोजिकल सर्वे आंब इस्डिया के श्री ची० वाल की 
पुस्तक “भारत में वन-जीवन” सन्‌ (८० में प्रकाशित हुई थी । 
उसमें उसने मरचीसन की लिखी बाता उद्धत की है और 


करनल स्लीमन की बताई हुई दूसरी घटनाओं की पूरी-पूरी बातें 


दी हैं। उनमें से पीछे से प्रो० मेक्समूलर की बताई हुई एक 
घटना भी है। एक सेनिक घुड्सवार नदी के किनारे-किनारे 
टुपहर के समय जा रहा था। उसने एक सादा भेड़िये को, 
अपनी माँद से निकल कर आते देखा [उसके पीछे तीन - 


भेड़िये के बच्चे ओर एक लड़का था । सेड़ियों की भाँति लड़का ' 


भी हाथों और पेरों के वल ही दौड़ रहा था। मनुष्य को देख 
कर थे फिर माँद में जा छिपे | सबार निकटवर्ती गाँव में जाकर 


| 


भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के ६५ 


32>५०४७०७३६; ५#>८>८६ लन्ड च खं्जिज्ज्जज जज जज जज जल जी जी जज जज 


लोगों को बुला लाया और उनकी सहायता से कन्दरा* को खोद 
कर उनको निकाला गया। लड़के को पकड़ लिया गया। जब 
वे उसे घर ला रहे थे तो वह छूटने के लिए प्रचण्ड चेष्टा करता 
था । रास्ते में जहाँ भी कोई कन्दरा या कोई छेद देख पड़ता, 
वह भाग कर उसमें छिप जाने का प्रयत्न करता। वह बड़े 
मनुष्यों के सामने तो डर से सिक्कुड्ध कर बेठ जाता, पर बच्चों 
पर आक्रमण करने में तनिक भी संकोच न करता | वह बँधीं 
हुई कोई भी वस्तु नहीं .खाता था, पर कच्चा माँस खा जाता 
ओर हडियों को कुतरता थो 4 खाद्य को पकड़ कर नीचे रखने 
के लिए वह जन्तुओं के पेरों के पंजे के सदश हाथों का उपयोग 
करता । उन्होंने उसे बुलाने का बहुतेरा यत्न किया पर क्रोध- 
भरी घड़घड़ाहट और गुर्राहट के सिवा वह कुछ न चोला। 
कुछ काल तक हसनपुर के राजा ने लड़के को अपने पास 
रखा । बाद को उसने उसे अवध लोकल इनफ़ेण्टरी की फ्रटे 
रेजीमेण्ट के किसी केप्टन निकोलट्स के पास भेज दिया। इस 
लड़के के विषय में कहा जाता है कि वह अपने शरीर पर कोई 
कपड़ा न संसार सकता था । उसे शीत से बचने के लिए जब 
रज़ाई दी गई तो उसने उसे फाड़ डाला और थोड़ा-सा खा 
भी लिया। केप्टन निकोल्नट्स ने कनल सलीमन की १७ सितम्बर 
१८४० को एक चिट्ठी लिखी थी | उसमें लिखा था कि लड़का 
उसी वर्ष अगस्त में सर गया । े 

कनल स्लीमन के प्रमाण से वॉल ने जिस घटना का उल्लेख 
किया है चह एक लड़के का वृत्तान्त हे जिसे सन्‌ १८४३ में 
भेड़िया उठा ले गया था, जव कि उसके माता-पिता खेत में 
गेहूँ काट रहे थे | इसके छः वषे वाद छुछ प्रामीणों ने 
एक सादा भेड़िये के पीछे एक लड़का - और तीन सेड़िये 





६६ लेखलतिका 


न्‍स ल्‍लट--ै-ल ले जज जी जी 





स्‍ढल सील जी पीली जी डीज जी जी जज जी ड्ज् डा जैज औ ड ह 


के पिल्‍ले जाते देखे । लड़का पकड़ लिया गया । बचपन में 
लड़के के घुटने पर चोट लग गई थी । वहाँ एक दाग पड़ गया 
था। उस दास को देख कर लड़के की माँने पहचान लिया कि 
यह मेरा ही वह पुत्र है जिसे छः वर्ष हुए भेड़िया उठाकर लें 
गया था जब कि सें और इसका पिता खेत में गेहूँ काट रहे थे | 
कर्नल सल्लीमन की चौथी घटना एक ऐसे लड़के की है जो एक 
बड़े भेड़िये के साथ-साथ दुलकी चल्नता हुआ पकड़ा गया था। 
इसे बाद को अवध लोकल इन्फ्रेण्टरी के कनेल श्रे, उनकी 
घर्मपत्नी और रेजिसेण्ट के दूसरे -अफ़सरों ने देखा था। जिस 
अन्तिम घटना का कनेत स्त्रीमन को ज्ञान हैं उसका आधार 
बाँकीपुर के एक जमींदार जुलफुकार ख्राँ का रूच्य है। जिस 
समय लड़के को भेड़िया उठा कर ले गया उस समय उसकी 
अबस्था छः वर्ष की थी। उसे उसके ले-पालक* माता-पिता 
भेड़ियों से चार वर्ष बाद वापस लिया गया था। 

सन्‌ १८७२ में बॉल को आप एक भेड़िये द्वारा पाले हुए 
लड़के को देखसे का अवसर सिला था। सकन्द्रा मिशन 
अनाथालय की रिपोर्ट का एक उद्धरण पढ़ कर उसका ध्यान 
उसकी ओर आकर्षित हुआ था। यह उद्धरण उस समय 
भारत के पत्रों में खूब छप रहा था| वह उद्धरण नीचे दिया 
जाता है-- 

“एक दस वर्ष के लड़के को भेड़िये की माँद के बाहर 
आग जला कर भेड़ियों सहित बाहर निकाला गया। 
यह कहना संभव नहीं कि बह कब -से भेड़ियों के साथ 
था, पर उसके हाथ-पेर के वल पशुओं की तरह चत्नने और 
कच्चा सांस खाने के स्वभाव से जान पड़ता है कि वह अवश्य 
दीघे काल से उनके साथ रहता होगा। अभी तक भी वह 
बहुत अधिक जंगली जन्तु के ही सदृश है उसके चें-घें शब्द से छुंत्तें 


भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के ६७ 


नीली डील जीजीिंीजीजज जि जि जज जज 





के पिल्‍ले या वैसे ही दूसरे जन्तु की याद हो आती है । कुछ 
वर्ष हुए, हमें बैसे ही एक बच्चा मिला था। वह आम्येजनक रूप 
से बातें सीख रहा है । यद्यपि वह बोल नहीं सकता तो भी 
अपने दुःख-सुख को पूरी तरह व्यक्त कर सकता है। हमें आशा 
है कि यह नया ' अभागा” भी उन्नति कर जायगा | 

बॉल ने तुरंत अनाथालय के सुपरिन्टेण्डेण्ट पादरी इहाडिंट 
को पत्र लिख कर पूछा कि ये बातें कहाँ तक सत्य हैं।श्री 
इहांडेट का उत्तर श्री बॉल ने बाद को एशियाटिक सोसायटी 
आँब बंगाल के पास भेज दिया | वह सोसायटी की सन्‌ १८७६ 
की पत्निका में छुपा है | श्री इहांडेट ने लिखा-- 

“हमारे पास यहाँ दो ऐसे लड़के हैं | पर में समझता हैँ आप 
का अभिम्राय शायद्‌ उस लड़के से है जो हमारे पास ६ माचे 
१८७२ को लाया गया था| छुछ हिन्दू शिकार खेलने गये थे । 
उन्हें यह मैनपुरी के पढ़ोस में मिला था। उसे आग जला कर 
साँद से वाहर निकाला गया था | उसके शरीर पर घाव और 
क्षत चिन्ह थे। वे अब तक भी वर्तमान हैं । उसके स्वभाव प्रत्येक 
दृष्टि से विलकुल्न जंगली जन्तुओं के-से थे | वह कुत्ते की तरह 
पानी पीता था। उसे हड्डी और कच्चा मांस जितना अच्छा लगता 
था उतनी और कोई वस्तु नहीं। वह दूसरे लड़कों के साथ 

' कसी नहीं बेठता था; बाहर किसी अँधेरे कोने में जाकर छिप 
जाता था। उसे कपड़े पहनना विज्ञनकुल न भाता था। कपड़ा 
पहनाने पर वह उसे फाड़ कर चिथड़े-चिथड़े कर डालता था। 
वह हमारे पास कुछ ही सास रहा फिर उसे ज्वर आने लगा 
ओर उसने खाना छोड़ दिया । हम कुछ समय तक कृत्रिम 
रीति से उसका पोषरं करते रहे पर अन्त को बह सर गया । 

“दूसरा लड़का जो श्रेड़ियों में से पकड़ा गया था, अब १६ 
या १४ वर्ष का है और हसारे पास छः वर्ष से हैं। उसने शब्द 








ध्ट्द लेखलतिका 


निकालना सीख लिया है यद्यपि वह बोल नहीं सकता, पर वह 
क्रोध और हणे युक्त भाव प्रकट कर सकता है। वह कभी- 
कभी थोड़ा काम करता है, पर उसे खाना बहुत पसंद है । उसकी 
सभ्यता ने केवल इतनी ही उन्नति की है। अब वह कच्चा मांस 
कम पसंद करता है पर अब तक भी बह हड्डी उठाकर उसंसे 
अपने दाँत तेज़ किया करता है । े 

“परन्तु उपर्युक्त दोनों में से कोई भी नई घटना नहीं । केवल 
चार ही वर्ष हुए लखनऊ के पाग़ल-घर में एक बड़ी अवस्था का 
मनुष्य था--शायद अब भी हो, जिसे एकडाक्टर ने भेड़िये 
की माँद में से खोदकर निकाला था | कब निकाला था यह मैं 
भूल गया हूँ । पर अवश्य काफ़ी वर्ष पहले की बात रही होगी। 
जिस आसानी के साथ ये लड़के हाथों और पैरों के बल दोड़ 
सकते हैं, उसे देख आश्चर्य होता है । किसी वस्तु को खाने या 
चखने के पहले वे उसे सूधते हैं।यदि उनको उसकी गंघ 
नहीं भाती तो वे उसे फेंक देते हैं ?। 

वाद को श्री बॉल आप अनाथालय देखने गया। 
श्री इहाडंट ने उसे वह लड़का दिखाया। उसका चेहरा ऐसा 
था जैसा सामान्यतः जड़बुद्धि लोगों का होता है--बैठा हुआ 
माथा, निकले हुए दाँत और अशान्त, विकुल ढंग । उसके 
शारीरिक गठन की जिस बात ने श्री वॉल का सब से 
अधिक ध्यान आकृष्ट किया वह थी उसकी भुजञाओं का 
छोटापन । सकनन्‍्दरा मिशन अनाथालय में और भी कह 
भेड़ियों द्वारा पाले गए लड़के रहते रहे हैं।७ मई सन्‌ 
१८८६ को असिद्ध .पुरातत्वज्ञ, स्वर्गीय सर जीवनजी सोदी से 
बंबई की जीवजन्तु-इतिहास-सभा के सदस्यों की बेठक सें 
'भेड़िये द्वारा पालित-पोषित एक लड़के का वृत्तान्त सुनाया था । 
सर जीवनजी सन्‌ १८८७ के पृर्वाधे में उत्तर-भारंत में धृम रहा 


भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के ६६ 


ञ_ 
डीडसीसी 3 सी जी जल जी. जी लीला न न जलन्‍ ली जल ली डील जीती जज जी ली जी जी जी पीजी सील सजी ही लीजीज 





था। वह सकनदरा में अकबर +फी ईसाई स्त्री मरियम की 
समाधि देखने गया | सकन्दरा पवास में उसने चचे मिशन 
अनाथालय में एक युवक देखा जो भेड़िया-बालक कहलाता 
था। अनाथालय का अधिष्ठाता* उन दिनों पादरी लीचिस था। 
उसने अपनी सन्‌ १८८५ की रिपोर्ट में इस लड़के का इतिहास 
छापा था:-- 

“४ फ़रवरी सन्‌ १८६७ को बुलन्दशहर के मजिस्ट्रेट ने 
यह लड़का अनाथालय के अधिष्ठाता के पास भेजा था और 
कहा था कि उसे भेड़िये की खोह में से पकड़ा है | कुछ देसी 
मनुष्य बुलन्दशहर ज़िले के सूने बन-प्रदेश में जा रहे थे । 
उन्हें पाँच-छः चर के एक बच्चे को हाथ-पाँच के चल इधर-उधर 
टहलते देख बड़ा आश्चर्य हुआ | जब वे उस अनोखी चीज़ 
के निकट पहुँचे तो वह एकदम एक बढ़े छेद में अन्तर्धान हो 
गया । जब ध्यान से देखा तो पता लगा कि वह वड़ा विवर#*' 
किसी वन-जन्तु की खोह है | खोह को खोदकर लड़के को बाहर 
निकालने का प्रयत्न विफल हुआ । उसके पीछे खोह में घुसने में 
भी डर होता था । इसलिए वे उस असाध्य घटना की सूचना घुलन्द- 
शहर के मजिस्ट्रेट को देने चले। इस विचित्र कथा को सुन 
मजिस्ट्रेट ने तुरन्त अपने दूत उस जगह भेजे और खोह के मुह 
पर आग जलाने को कहा ताकि खोह-वासी घुएँ के कारण 
चाहर निकल आने पर विवश हो जायाँ। दूतों ने वैसा ही 
किया। जब धुआँ विवर के भीतर घुसा, उससे साँस घुटने 
और आँखें अंधी होने लगीं, तो एक बड़ी मादा मेड़िया गुर्राती हई 
छलाँग मारकर बाहर निकली । लोग डर कर इधर-उधर बिखर 
गये और मादा भेड़िया प्राण बचा कर भाग गई। इसके पल 
भर वाद चह लड़का भी निकल आया और पकड़ लिया गया । 
उसे मजिस्ट्रेट के पास ले जाया गया। वह बोल नहीं सकता 


७० लेखलतिका 


था, नितान्त जड़-बुद्धि था, और जितना कोई मनुष्य अधिक- 
से-अधिक पशु हो सकता है उतना पशु वह था | उसे निरामिष 
भोजन खाने को दिया गया । पर उसने खाने से इनकार कर 
दिया। जब उसके सामने मांस रखा तो वह मट खा गया) 
भज़िस्ट्रेट ने जब देखा कि लड़के को बुद्धिमान और उपयोगी 
बनाना संभव नहीं तो उसने इसे अनाथालय में भेज दिया और 
उसे बहाँ रखने की प्रार्थना को ।? 


जिस समय सर जीवनजी ने लड़के को देखा उस समय 
वह बढ़ कर पूरा जवान सनुष्य बन चुका था। वह बोल नहीं 
सकता था, पर संकेव समझता था। जब पहले-पद्दल उसे मिशन 
सें लाया गया तब वह हाथ-पावों के बल चलता था, पर अब 
सीधा खड़ा होकर चलने लगा था | पहले जो वह कच्चे मांस के 
लिए लालायित रहता था उसकी अब बह लालसा भी दव चुकी 
थी ।अब चेरुट पीने लगा था और चेरुट खरीदने के लिए संकेतों 
द्वारा पेसे माँगा करता था । 


सन्‌ १६२७ में एक भारतीय पत्रिका सें बिशप एच० पाकच 
हथ चाल्श का लिखा एक वृत्तान्त भ्रकाशित हुआ था। उसमें उस 
ने सिदनापुर के एस० पी० जी० मिशन के अधिष्ठाता, रेवरेण्ड 
जे० ए० एल० सिंह द्वारा एक मादा सेड़िये की माँद में दों 
लड़कियों के प्राप्त किये जाने की बात कही थी | पर घटना सन्‌ ' 
१६२० में हुई थी । इससे शेेड़ियों द्वारा पाले गए सनुष्य के 
चच्चों की घटलाओं में एक और की बृद्धि हो जाती है । 

पशु-पत्नियों द्वारा पालित मनुष्य-शिशुओं की कहानियाँ 
पहले जिन्न-भूर्तों की कहानियों की तरह केबल कपोलकल्पित* ही 
समभी जाती थीं | लोग उनके सत्य होने पर विश्वास नहीं 
करते थे। ऐसी आश्चर्यजनक वातों पर सहसा विश्वास होना 
है भी कठिन । पर उपर्यक्त घटनाओं पर अविश्वास नहीं किया 


भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के ७१ 
जा सकता | कारण यह है कवि जिन लोगों ने उनका वर्णन किया 
है वे सब विश्वास्य व्यक्ति हैं । 

बम्बई की जीव-जन्तु-इत्तिहास-सभा के अज्ञायबघर फ्े 
अध्यक्ष श्री एस० एच० प्रेटर उपरिलिखित घटनाओं की 
'अलोचनो करते हुए 'स्टेटसमेन” नामक पत्र में लिखते हैं कि 
स्‍लीमन की बताई सभी घटनाएँ अवध प्रांत में हुई हैं। संभवत 
इसका कारण न्यह है कि उन दिनों अवध में भेड़ियों. ने बड़ा 
उत्पात मचा रक्‍्खा था और इनके द्वारा मनुष्यों फी बहुत 
अधिक प्राशहानि होती थी। आँकड़ों से पता लगता है कि सन्‌ 
६७ और सन्‌ १८७३ के बीच भेड़ियों द्वारा मनुष्यों की प्राण॒- 
हानि की औसत १०० से भी अधिक प्रति चर्ष रही है। 
साधारणतः भेड़िये, बाघ, सिंह और चीते मनुष्य का शिकार 
नहीं करते । मलुष्य के शिकार का स्वभाव इनको कई कारणों 
से पड़ जाता है, जैसे कि उनके स्वाभाविक खाद्य का अभाव, 
ओर अपने बच्चों के लिए भोजन भ्रस्तुत करने की भीपण 
आवश्यकता, घाच या दूसरी आवश्यकताएँ, या मनुष्य की 
हत्या का कोई संयोग । इनमें से किसी एक या अनेक कारणों 
से भी जन्तु मनुष्य पर आक्रमण करता है।इसके याद उसे 
पता लग जाता है कि मनुष्य का शिकार सब से आसान है। 
मनुष्य-पत्षी या जन्तु के बच्चे को अभ्यास से और माता-पिता के 
उदाहरण से मनुष्य के शिकार का स्वभाव हो जाता है।वह 
मनुष्य को अपना स्वाभाविक शिकार समभने लगता है और 
अपनी ज्ञमता के अलुसार मनुष्य के बच्चे या बड़े आदमसी को 
उठाकर ले जाता या मार कर खा लेता है | इस प्रकार हो सकता 
है कि जन्तु में यह स्वभाव प्रतिष्ठित हो ज्ञाय | इससे किसी 
विशेष प्रदेशया ज्षेत्र में सेड़ियों द्वारा मनुष्यों के मारे जाने या 
उठा कर ले जाने की घटनाएँ बार-बार होने लगती हैं। शायद 


्ऊ 


छः लेखलतिका 


जरूर पक कब सन कक सी जा 


यही कारण है जो मारत के विशेष जिलों या स्थानों में भेड़ियों 
के उत्पात से कई वर्ष तक मनुष्यों की प्राश-हानि होती रही है। 
अबृध प्रान्त में विशेष काल-खण्डों में भेड़ियों द्वारा जो नर- 
नाश होता रहा है, और उपरिलिखित घटनाएँ हुई हैं, उसका 
कारण भी यही है | 
जिन बच्चों को सेड़िये उठाकर ले गये, उनमें से अधिकांश 
को वे निःसन्देह मार कर खा गये। जिन थोड़ों का ऊपर 
उल्लेख हुआ वे कैसे बच गये १ उनको भेड़िये ने मार कर क्यों 
नहीं खा लिया ९ इसका कारण संभवत: यह जान पड़ता है कि 
जिस समय कोई मसादा-सेड़िया किसी मनुष्य के बालक को उठा 
कर ले गई, उस समय उसके अपने पिल्‍्ले किसी कारण उससे 
छिन गये या सर गये थे और उसके थनों में दूध ज़ोर मार रहा था । 
अपने शिकार, अथांत्‌ उठा कर लाये हुए मनुष्य के बालक को , 
स्तन पिलाने से उसे आराम और उसकी मातृत्व-प्रेरणा को 
बाहर निकलने का मागे मिल जाता था। विपत्ति में कभी-कभी 
साँप और मनुष्य तक इकट्ठ मिल जाते हैं ।नदी की बाढ़ में 
अनेक बार मनुष्य और चीता एक ही पेड़ पर बेठे पानी में 
बहते देखे गये हैं । कारावास में कुतिया सिंह के बच्चे को दूध 
पिलाती देखी गई है। साथ ही बह सिंह से बच्चा उत्पन्न कर 
देती है। कुछ वर्ष हुए कराची के चिड़ियाघर में एक सिंहनी 
रही | जब वह मर गई तो उसके दो बच्चों को एक चेकरी अपना 
स्तन पिलाती थी । ये बातें केचल मातृत्व-प्रेरणा से होती हैं | बह 
जब प्रचण्ड होती है तो स्वाभाविक वैर-भाव को भी दबा देती है । 


किशन अनशन ननयनन. 





स्वाधोनता छ्रे 


अीजजलनजानस-नलननसी मी जीजी जाली मनी सजा मी + न्‍ा सती लीजी डी जी अखिल जज जी चीज जि जज जा 


स्वाधीनता 


(श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति ) 

स्वाधीनता शब्द का अर्थ न्यूनाधिक सभी सममते हैं। यह 
एक ऐसा शब्द है, जो लोक-व्यवहार और शास्त्रीय विचार में 
समान रूप से अयुक्त किया जाता है, इस कारण इसका अर्थ 
सममभाना कठिन नहीं है । पहाड़ी स्रोत का पानी सामने रुकाबट 
आ जाने के कारण रुक जाता है और इकट्ठा होने लगता 
है | हम कहते हैं कि पानी बन्ध गया। पानी के ज़ोर से या 
किसी इंजीनियर के उद्योग से रुकावट हटा दी जाती है, जल 
बिना किसी रुकावट के बहने लगता है, तंव हम कहते हैं कि 
पानी स्वाधीनता से बहने लगा है | रुकावट के अभाव का नास 
स्वाघीनता है । बग्रेर किसी प्रतिवन्‍्ध के विचरने की शक्ति 
स्वाधीनता के नाम से पुकारी जाती है । हवा खुली चलती है, 
इसका दृष्टान्त देकर हम प्राय: कहते हैं कि वह हवा की तरह! 
स्वाधीन है । हवा की स्वाधीनता का यही अभिप्नराय है कि 
उसकी गति न दीवार से रुकती है और न परवेत से । उसे न 
सविस्तृत जड़्ल रोक सकता है और न मरुस्थल* । जब हम 
घोड़े को खूँ टे से खोल देते हैं, तो बह घास खाने के लिए स्वाधी- 
नता से विचरने लगता है। कैदी क्रेद से छूटकर कहता है कि-- , 
“आज में स्वाधीन हुआ” । इन दृष्टान्तों से यह स्पष्ट है कि 
वन्‍्धन या रुकावट के बिना कारये करने की शक्ति का नाम 
स्वाधीनता है । 

शायद कोई भी सत्य इतना स्पष्ट नहीं है, जितना यह कि 
सनुष्य स्वभावतः वन्धन से छूट कर स्वाधीन होना चाहता है । 
वह अपनी इच्छा से जो चाहे करे; परन्तु परवश होने में वह 
दुःख अलुभव करता है। मनुष्य तो विचेकशील* प्राणी है; जो 


७४ लेखलतिका 


पशु-पक्ती विवेक नहीं रखते और केबल आन्तरिक प्रतिभाव 
से संचालित होते है, वे भी जंजीर, पिंजरा या जंगले को तोड़ 
कर भागना चाहते है ' मनुष्य यह मंजूर करता है कि जंगलों 
में भूखा भटकता फिरे, प्राणों को संशय में डाल दे, परन्तु 
जान-बूक़ कर चेतन शक्तियों के साथ जेल की या क्विले की 
दीवारों में बन्द रहना पसन्द नहीं करता । रुकावट से मनुष्य 
को स्वाभाविक घृणा है। स्वाघीनता से तो मृत्यु भी बुरी नहीं 
लगती | यदि लगती, तो कोई आत्म-हत्या न करता। आत्म- 
हत्या करने वाला मनुष्य थोड़ी देर के लिए यही सममने लगता 
है कि वह मृत्यु द्वारा ही दु:खों से छूट सकता है।उस समय 
वह आत्म-हत्या सें रुकावट डालनेवाले को अपना शत्रु सममने 
लगता है। अपनी स्वाधीन इच्छा से बुलाई हुईं मृत्यु भी मनुष्य 
को सुखकारी प्रतीत होती है। स्वाधीनता की अभिलाषा मलुष्य- 
हृदय के पोरे-पोरे* में बसी हुई है । 

यदि उपयुक्त दोनों स्थापनाएँ सत्य हैं तो एक तीसरी 
स्थापना का सत्य होना आश्चर्य में डालनेवाला प्रतीत होगा, 
परन्तु फिर भी उसकी सत्यता में सन्देह नहीं। वह स्थापना 
यह है कि पूरी तरह से स्वाधीन कोई भी नहीं। जड़-जगत्‌ में 
हो, या चेतन-जगत्‌ में, कोई ऐसी वस्तु दिखाई नहीं देती जो 
दूसरे पर सबेथा अवलम्बित न हो। कहीं-न-कहीं, बहुत दूर, 
उसका दूसरी शक्तियों पर अवल्म्बन होगा ही। संसार में 
सबसे अधिक स्वाधीन चीज़ वायु को सममा जाता है । “वायु 
की तरह स्वाधीन” यह एक मुदहावरा-सा बन गया है प्रन्ठु 
क्या वायु स्वेथा स्वाधीन है ९ नहीं। विज्ञान वतलाता है कि 
उसकी गति सूर्य, समुद्र, सर्दो, गर्मी और ऋतुओं . के अधीन 
है। जंगलों में जो पक्ती स्वाधीनता से विचरते हैं, उन्हें भी एक- 
दूसरे से बचना पड़ता है, क्योंकि वहाँ भी “जीवो जीवस्य 





स्वाघधीनता ह छह 


आज 3 लव जी फलीजी_ी-तीीजीजी जी १० सतत जीनत सी 3 सी जी नी सीसी जी जी जॉजीजीजी जजडी डील ली औ जजि जज जल जी 


भोजनम”” का नियम बहुत जीर से चलता है। फिर जीवन और 
सृत्यु के नियम उन पर लगते ही हें। क्रेद से छूटा हुआ क्रेदी 
राजनिय्ों से तो फिर भी वनन्‍्धा ही रहता है। स्वाधीन से- 
स्वाधीन देश के क़ैदी को कपड़ा पहनने तथा अन्य सामाजिक 
और राजनीतिक वन्धनों में तो बन्धा ही रहना पड़ता है। 
सारांश यह कि जहाँ प्राशिमात्र को स्वाधीनता बहुत प्यारी 
है, वहाँ पूर्ण स्वाधीनता का प्राप्त, करना सबंथा असंभव प्रतीत 
होता है, क्योंकि इस पेंचीदों संसार में किसी प्रकार का जीवन 
भी स्वधा अलग-अलग रहकर नहीं विताया जा सकता। 
प्रकृति के नियम, सोसाइटी के बन्धन और व्यक्ति की परिमित 
शक्तियाँ उसे पूर्णतः स्वाधीन होने से रोकती हैं । 

किन्तु, मनुष्य इन तीनों रुकावर्टों पर हावी दोने के लिए 
प्रयत्त करता आ रहा है, और अब भी कर रहा है। प्रकृति 
के रहस्यों को जानकर, उन्हें वश में लाने की चेष्टा विज्ञानवेत्ता 
बराबर कर रहे हैं| मनुष्य चाहता है कि वह प्रकृति की मौज 
का शिकार न रहे, अपितु उसके नियमों को समझ कर देवी 
आपत्तियों* से बच सके और प्राकृतिक शक्तियों को अपना 
गुलाम बना सके। विज्ञान और शिल्प की उन्नति: का यहीः 
रहस्य है। मनुष्य प्रकृति की गुलासी से छूटकर स्वाधीन होना 
चाहता है। भौतिक उन्नति की सबसे उत्तम यंही- व्याख्या है। 
चह कभी प्रकृति के शिकंजे से स्वेथा छूट सकेगा या नहीं, 
यह बिल्कुल दूसरा प्रश्न है, परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि 
मनुष्य के मस्तिष्क ने पंचभूतों के साथ जो लड़ाई लड़ी है, 
उसका उद्देश्य प्रकृति की रुकाबटों से छूटने ओर उसछी मन-मौज़ 
का शिकार बनने से बचने की चेट्टा है । 

इसी प्रकार मनुष्य ने सोसाइटी के वन्धनों से छूटने की 
जो चेष्टा की है, धार्मिक, सामाजिक और राज़नतिक उन्नति के 


७६ लेखलतिका 


ही जी 


इतिहास उससे भरे पड़े हैं। वह दबाव जो मनुष्य की बढ़ती 
को रोकता है, धर्माचार्यो की ओर से आये या बिरादरी की ' 
ओर से, बह एक राजा की ओर से आये या किसी गुट्ट की 
ओर से, किसी-न-किसी दिन मनुष्य के लिए असह्य हो जाता 
है, और तब स्वाधीनता के संग्राम का प्रारम्भ होता है । 
इसी प्रकार व्यक्ति की उन्नति की तह में यही नियम काम 
करता है कि मनुष्य अवस्थाओं का गुलाम न बनकर उन पर 
काबू पाना चाहता है। व्यक्ति अपनी सानसिक तथा शारीरिक 
उन्नति के लिए चेष्टा करता है, ताकि वह इच्छापूबक उन्नति कर 
सके, वह सुख की सामग्री का स्वामी बन सके, वह असली 
अर्थों में स्व॒तन्त्र कर्ता बन सके | 
सारांश यह है कि संसार में जिसे उन्नति कहते हैं, वह 
मनुष्य-जाति की जड़ और चेतन बन्धरनों से छूटकर स्वाधीन 
होने की इच्छा का परिणाम है। संसार-चक्र के उतराव-ढ़ाव 
में यदि एक चीज़ स्थिर रूप्‌ से विद्यमान है त्तो चह मनुष्य की यह 
चेष्टा है कि वह स्वतन्त्र कती बन सके । उन्नति का बीज यही है। 
पूर्ण स्वाधीनता एक लक्ष्य है, जो इस समय कहीं विद्यमान 
नहीं है। मनुष्य व्यक्ति रूप में तथा समूह रूप में उस ओर जा. 
रहा है। उसी यात्रा का नाम उल्नति है | बन्धर्नों से ऊँचे उठने. 
की स्वाभाविक इच्छा ही उन्नति का बीज है। मनुष्य-जाति की 
स्वाघीन होने की चेष्टा का इतिहास ही बस्तुतः उन्नति का 
इतिहास है | न 
शायद हमारे अब तक के विवेचन से श्रम हो कि हम केवल: 
व्यक्ति की स्वाघीनता का गुणगान कर रहे हैं, और व्यक्तिवाद 
( ।00४00०७॥ ) का समर्थन कर रहे हे । इस भ्रम के निवारण 
का अवसर आ गया है। हमें अब स्वाधीनता सम्बन्धी सिद्धान्त 
का कुछ अधिक गहरा विवेचन करना चाहिए। ; 


हल ल धो लत ले 








पक 


स्वाधीनता ७७ 


निजी ली जाल जी लीड जी जी जी डट जी. वी ४4 








प्रत्येक पदार्थ स्वयं एक इकाई होता हुआ एक बड़े गिरोह 
का अंग है। इंट स्वयं एक वस्तु: है, परन्तु वह दींवार का 
हिस्सा है, दीवार एक मकान का, मकान एक शहर का, शहर 
एक सूबे का और सूबा एक देश का भाग है । वह देश भी 
भूमण्डल का और भूमए्डल इस विश्व का छोटा-सा अवयव है। 
जैसे हम पहले देख आये हैं, संसार का जड़ या चेतन कोई भी 
पदार्थ स्वेथा स्वाधीन नहीं हो सकता । इसका इहृष्टान्त लीजिए । 

हमने कहा है कि सनुष्य अपनी स्वाधीन इच्छानुसार काम 
करना पसन्द करता है । देवदत्त चाहता है कि वह यज्ञदत्त के खेत 
को काट ले । बह्‌ दूसरे के माल पर कब्जा कर लेने की स्वाघी- 
नता चाहता है। दूसरी ओर यज्ञदत्त अपने खेत के साथ ही | 
साथ देवदत्त के मकान पर अधिकार जमाना चाहता है। वह 
अपनी स्वाधीन इच्छा का प्रयोग इसी प्रकार करना चाहता 
है | देखने में दो स्वाधीनताएँ टकरा गई। इस टक्कर को यदि 
नियमपूर्वक वश में नहीं किया जायगा, तो दिन-रात लट्ठ बजेगा 
और यह समाज दंगल बन जायगा | कुछ दूर तक समाज दंगल 
बना हुआ है भी | सबको प्रतिवन्‍्ध-हीन* व्यक्तिगत स्वाधीनता 
देने का परिणाम समाज के नाश के सिवा कुछ नहीं हो सकता | 

व्यक्तियों की स्वाधीनता में इस कृपरिणाम की आशंका इस 
कारण पेदा होती है कि हमने व्यक्तिगत स्वाधीनता की आवश्यक 
शर्ते को ध्यान में नहीं रखा। विश्व का कल्याण केवल एक 
व्यक्ति की स्वाधीनता से नहीं होगा, अपितु विश्व-भर के व्यक्तियों 
की स्वाधीनता से होगा। तब तो किसी एक व्यक्ति की स्वाधीनता 
का चहीं तक फेलाव होना चाहिए, जहाँ तक दूसरे व्यक्ति की 
स्वाधीनता का प्रारंभ नहीं होता । देवदत्त की स्वाधीनता 
यज्ञदत्त की स्वाधीनता को नहीं काट सकती | देवदत्त को कोई 
अधिकार नहीं कि वह अपनी स्वाधीनता का उपयोग करने 








छ्प लेखलतिका 


के लिए यज्ञदत्त की स्वाधीनता का नाश करे । देवदत्त को 
अपनी सम्पत्ति के उपभोग को और उसे विधिपूर्षेक बढ़ाने का 
पूर्ण अधिकार है, और यही अधिकार यज्ञदत्त को भी है। 
किसी व्यक्ति को बहीं तक स्वाघधीनता प्राप्त है, जहाँ तक बह 
किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तिसमूह की स्वाधीनता में विप्नकारीओँ 
न हो | यह स्वाधीनता की सीमा है । जो सीसा का उल्लंघन कर 
जाय, वह स्वाघीनता नहीं, उच्छ्डलता* है । जो सब पर लागू न 
हो सके, वह जगत्‌ का न्‍यायी नियम नहीं हो सकता । इस 
सीमा की रक्षा के लिए ही मनुष्य-समाज में राज्य” और 
'राजनियम! की उत्पत्ति हुई है। 
परन्तु समाज व्यक्ति को कुचल नहीं सकता। सामाजिक 
ओर राजनियमों का उचित लक्ष्य यही है कि वे व्यक्तियों की 
ओर साथ-ही-साथ समाज की स्वाधीनता व उन्नति के सहायक 
हो।। जो बाधाएँ उपस्थित हो रही हों, उनका निबारण करें और 
व्यक्तियों के परस्पर संघर्ष को रोकें। व्यक्ति पहले हैं, समाज 
पीछे | व्यक्ति इकाई है समाज इकाइयों का जोड़ । यदि व्यक्ति 
न हो तो जातियाँ न चनें। परन्तु साथ ही यह भी मानना 
पड़ेगा कि यदि समाज के नियम न हों तो व्यक्ति भी जीवित 
न रह सके । सब एक-दूसरे को नोच खायेँ। मनुष्य के अन्दर 
दो भावों का मिश्रण है। चह अपने अलगपन को रखना चाहता 
है, इसे उसका व्यक्षि-प्रेम कह सकते हूँ | परन्तु बह अपने जेसे 
दूसरों से मिलता भी चाहता है, यह उसका समाज-प्रेम है । 
मनुष्य सामाजिकता और असामाजिकता का अद्भत सिश्रण है। 
दोनों ही भाव संसार की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। यदि 
आत्म-प्रेम या व्यक्ति-प्रेम बिल्कुल जाता रहे, तो व्यक्ति का नाश 
होकर समाज स्वयं ही नष्ट हो जाय; और यदि व्यक्तियों की सामा- 
जिकता सब था नष्ट हो जाय तो इस पृथ्वी पर सबेत्र लाशें-ही-लारें 








स्वाधीनता छू 


दिखाई दें । सामाजिकता और असामाजिकता के ठीक मिश्रण 
से ही विश्व चल रहा है । उसके उत्तम रीति से चलने के लिए 
आवश्यक है कि सब व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की रक्षा करते हुए 
समाज की सीमाओं का पालन करें, और समाज वहीं तक 
व्यक्तियों पर शासन करे जहाँ तक व्यक्तियों की स्वाधीन उन्नति 
में बाधा न पड़े | व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुचल कर समाज भी 


ल्््ििटी जी ली जि ली क्‍ जज 








जीवित नहीं रह सकता। कच्ची इंटों से कभी पक्की दीवार नहीं... 
बन सकती । जिसके रंनांयु निवल हैं, वह शरीर अखाड़े में 


उतरने योग्य नहीं हो सकता | समाज का लक्ष्य व्यक्तियों के 
व्यक्तित्व की रक्षा करना है, उसका मान-मदेत* करना नहीं | 


इस समय राजतीतिके तत्वज्ञान में व्यक्तिवाद (॥णं- 
१0०ी४ए) और ससष्टिचाद (5०८०॥६॥) में परस्पर विरोध 
सममा जाता है। वह विरोध क्रिया रूप में भी परिशत हो रहा 
है । योरुप के प्रत्येक बड़े देश में व्यक्तिवाद और समष्टिवाद 
का संघ हो रहा है । किसी देश में एक सिद्धांव के अनुयायी 
प्रवल हैं तो किसी सें दूसरे के । आज से लगभग ४० बे पूर्व 
इंग्लेंड और उसके कई राजनीतिक चेले व्यक्तिवाद के कट्टर 
अलुयायी बने हुए थे, और स्व॒तन्त्र व्यापार, व्यक्तिगत विचार- 
स्वातन्त्य और खुली प्रतियोगिता को ही अपनी वाईवल मानते 
थे। इधर रूस ने समष्टिवाद को रालघर्स और व्यापार आदि सभी 
जेत्रों में गही पर बिठा दिया है। इसका मुख्य पहलू समाज 
का आर्थिक संगठन है। दूसरा पहलू मतुष्य की स्वाधीनता से 
सस्वन्ध रखता है। व्यक्तिवाद के अनुयायी यह दावा करते हैं 
कि थे व्यक्ति की स्वाधीनता के समर्थक हैं और समष्टिवादी उसके 
विरोधी हैं । दूसरी ओर समपष्टिचादियों की यह घोषणा है कि 
एक मसलुष्य की स्वाधीनता तभी सुरक्षित रह सकती है जब 
समाज ज्यक्तिगत स्वाधीनता की रक्षा के लिए कटिवद्ध हो; और 





न 


८० लेखलतिका 


समाज उसी व्यक्ति की रक्ता के लिए कटिबद्ध हो सकता है, 
जो समाकज-हित में अपने हित को शामित्र करने के लिए 
उद्यत हो । जो समष्टिवाद व्यक्ति के अस्तित्व का नाश करके 
समाज को बनाना चाहता है, वह कभी सफल नहीं हो सकता | 
रूस में समष्टियाद की जितनी सफलता प्रतीत होती है, उसका 
कारण यही है कि लेनिन के समष्टिवाद ने परिश्रम करने वाले 
व्यक्तियों के व्यक्तित्व को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक स्वाघीन 
ओर उन्नत वनां दिया है। जो शासन या व्यापार का संगठन 
व्यक्तियों की शक्तियों को कुचल देता है वह बालू पर बनी भीत 
की भांत्ति शीघ्र ही बैठ जाता है | वस्तुत: व्यक्ति और समाज 
मिलकर, एक-दूसरे के सहायक बनकर ही उन्नति कर सकते हैं, 
परस्पर विरोधी बनकर नहीं। 

यदि सब कुछ उसी तरह चले, जेसे चलना चाहिए, तो 
संसार में सब स्वाघीन-ही-स्वाधीन दिखाई दें, क्‍योंकि हम देख 
चुके हैं कि स्वाधीनता सभी को प्यारी है | परन्तु जब मनुष्य 
एक-दूसरे के सम्बन्ध में आते हैं--अथात््‌ व्यक्ति समाज में 
प्रवेश करता है, तो एक की जगह उसकी दो विशेषताएँ उद्धितु, 
हो जाती हैं । चह्‌ अपनी अलग हस्ती रखना चाहता है, परन्तु 
साथ ही समाज की ओर खिंचता भी है) उसे हम असामाजिक 
सामाजिकता या सामाजिक असामाजिकता कह सकते हैं। 
मनुष्य सुखी होना चाहते हैं, परन्तु औरों की अपेक्षा से | व्यक्ति 
बड़ा बनना चाहता है, परन्तु दूसरों की ऊँचाई नाप कर | वह 
समाज में रहकर ही समाज के ढंग पर और समाज की दृष्टि 
में ऊँचा और सुखी होना चाहता है । वह समाज में. रहता 
हुआ, समाज से जुदा हस्ती रखना चाहता है । यहीं आकर 
स्वाचीनता में बाधाएँ पढ़ती हैं | ज्यक्ति और समाज की आपस 
की क्रिया-प्रतिक्रिया* से मनुप्य-समाज का इतिहास बनता है। 





स्वाधीनता पर 


ल्‍>> 323५-०० सतत नी जल जल ली तीज ++  ॉजिलजजलजीचि जज जीत 2 ील जी जज जल ल जज अजित 


दासता के कई कारण हैं । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा 
बलवान है । वह उस पर अधिकार जमा लेता है । यह व्यक्ति 
की दासता है । समाज का एक भाग गिरोह बनाकर, शब्ों 
की सहायता से या छल से, दूसरे भाग पर काबू पा जाता है। 
यह सामाजिक दासता है। दासता के प्रकारों की विवेचना में 
हम नहीं जाना चाहते | हमें केवल यहाँ इतना दिखाना है कि 
किसी व्यक्ति या जाति की स्वाधीनता की उल्नटी दासता और , 
दासता की उल्लटी स्वाधीनता है । 

यहाँ रहस्य की यह बात कह देती आवश्यक है कि दासता 
एक भावरूपी वस्तु है ओर स्वाधीनता अभावरूपी । जेसे दुःख 
एक भसावरूपी वस्तु है और दुःख के अभाव का नाम सुख है 
उसी प्रकार मनुष्य की स्वाभाविक परिस्थिति तो स्वाधीनता 
कही जाती है, परस्पर बन्धन पड़ने से दासता का जन्म होता 
है। बन्धन के हटने ही से फिर स्वाधीनता का राज्य हो जाता 
है। रूसो के इस कथन का कि “सनुष्य स्वतन्त्र पेदा हुआ है? 
यही अश्िप्राय है । 

हमने दासता ओर स्वाधीनता दोनों के स्वरूप ओर परस्पर 
संबन्धों का विवेचल कर लिया। इसका स्वाभाविक निष्कप* 
यह है कि मनुष्य-जाति की उन्नति तश्ली संभव है जब उसे 
विकास की स्वाधीनता मित्र ' जाय | विकास की स्वाधीनता के 
सांग में जो विन्न उपस्थित होते हैं, वे दासता के नाम से पुकारे 
जाते हैं। दासता की फ़ोलदी जूती पाँव से उतारे बिना व्यक्ति 
या जाति के पाँव आगे बढ़ने योग्य नहीं हो सकते । दासता का 
शिकंजा मज़बूत हो जाने पर प्रायः सनुष्य के हृदय सें एक 
ऊंमलाहट पेदा होती है, जो उसे कहती है कि तू इस शिकजे सें 
से निकल । यदि शिकंजा अभी बहुत मज़बृत नहीं हुआ, तो वह 
थोड़े परिश्रम से टूट जाता हे, परन्चु यदि दासता के वन्‍्धन 


प्र लेखलतिका 





बहुत दृढ़ हो घुके हैं, तो मनुष्य को व्यक्तिरूप में या समष्टिरूप 
में एक हलचल पैदा करनी पड़ती है और उसी का नाम है 
क्रान्ति, जो व्यक्तिगत अथवा समप्टिगत जीवन की रूढ़ियों 
2 को हटाकर उसमें स्वाधीनता का प्राण फूक 
देती है । 


विज्ञान 


(श्री पठुमलाल पुन्नालाल बख्शी ) 


जो गत शताब्दी के विज्ञान का इतिहास. जानते हैं, उन्हें 
ज्ञात है कि विश्व के सभी तत्त्वों का संग्रह करने के लिए योरुप॑ 
ने कितनी चेष्टा की है। पदार्थ-विज्ञान से मनो-विज्ञान और मनो- 
विज्ञान से सानव-विज्ञान और समाज-विज्ञान की उत्तरोत्तर 
होती गई है । मनुष्य-जाति का आदि और अन्त, उसकी 
सभ्यता का लक्ष्य तथा उसके सभी ज्ञारनों का पारस्परिक 
सम्बन्ध, आदि सभी विपयों की आलोचना कर मनुष्य थक-से 
गये हैं। संसार की बढ़ी-से-बडी और छोटी-से-छोटी बस्तु का 
संग्रह कर मनुष्य ने अपने ज्ञान के क्षेत्र को खूब विस्तृत कर 
लिया हैं| विज्ञान की इसी चेष्टा से साहित्य, दर्शन आदि 
शास्त्रों ने भी प्राचीन रीति को छोड़कर वैज्ञानिक रीति का ही 
अवलम्बन* किया है | जगत्‌ , आत्मा ओर ईश्वर के सम्बन्ध में 
जिन धारणाओं को भ्रमशून्य मानकर दश्शन-शास्त्र ने अपने 
तत्वों को प्रतिष्ठित किया था, उनके भी मलसिद्धान्तों के 
सम्बन्ध में अब लोग संशयालु हो गये हैं। साहित्य में 
मनो-विज्लान ने मनुष्य के अन्तजगत का रहस्योद्धाटन” किया 
| भिन्नन॑भन्न कार्लाो में मनुप्य का मन एक ही संस्कार को 
तन ही नवीन रूपों में देखता है । प्रत्यक मन एक स्व॒तन्त्र 


विज्ञान ८३ 


बीती सी क्‍ जलती जीती सजी पीजी जीप खत 


जगत्‌ ही है । इसलिए अब मूलसिद्धान्तों की विवेचना कर 
भिन्न-भिन्न तत्वों की रचना करने की ओर दशन-शास्त्र की 
“7 अरव्ृत्ति नहीं है। अब बेचित्र्य में ही एंकता का अनुसंधान करने 
में दशेन अपनी कृतकृत्यता समझता है। 
योरुप में विज्ञान की उन्नति के साथ-ही-साथ दाशेंनिक 
मत में परिवर्तेत हुए । इस से प्राचीन धर्म-विश्वास 
शिथिल्न होने लगा। ह॒वेटे स्पेंसर ने संशय-वाद का उपक्रम : 
किया | बहिजगत्‌ के साथ अन्‍्तजेगत्‌ का समन्वय स्थापित 
करने का फल यह हुआ कि सन के सभी संस्कार वर्जित हो 
गए | वैज्ञानिक उन्नति के द्वारा मनुष्य के धर्म-भाव पर इतना 
- घोर आघात हुआ कि नीति, कला और साहित्य, सभी में 
संशय-बाद की प्रधानता हो गई । 
यह दो स्ंमान्य है कि विज्ञान ने मनुष्य को वहुत-सी 
भौतिक सुविधाएँ प्रदान की हैं । यातायात के साधनों में रेलवे 
स्टीमर, हचाई जहाज़ आदि के आबविष्कारों से विस्मयंजनक 
उन्नति हुई है । टेलीमाफ़, टेलीफोन और वेतार-के-तार द्वारा घर 
वंठे दज़ारों-लाखों कोसों की दूरी पर रहने वाले मित्र के 
समाचार क्षण भर में ज्ञात हो जाते हैं । मुद्रण-कला के 
महत्वपूणे आविष्कार के द्वारा विद्या-प्रचार में बड़ो भारी 
आसानी हो गई है। डाक्टरों ने वेज्ञानिक रीति से सजरी- 
विद्या सीखकर मनुष्य को भीपण यात॒नाओं* से चचा लिया 
है । विज्ञान की सहायता से बहुत से रोगों की अव्य्थ ओपधियाँ 
ढूंढ निकाली गई हैं, जिनको सन्ुष्य पहले स्वथा असाध्य 
समझा करते थे। वेज्ञानिक युग से पहले बहुत-से संक्रामक 
रोगों का कारण भूत-वाधा ठहराई जाती थी, अतएव लाचार 
होकर रोगी को असझ्य चेदनाएँ सहनी पड़ती थीं। इस ज्षेत्र में 
भी विज्ञान ने हसारा बढ़ा सारी उपकार किया है | दूसरी ओर 





नल 


पे लेखलतिका 


नन्‍न्‍ जलता २त लत तल ी<ल्‍ सी जननी जीन जीती सी जी चीनी जी जलन जीती तीस चसनीनन सीसी चलती लचच रच तच च5 


कल-कारखानों के आविष्कार से नाना प्रकार की शिल्पोन्नति 
होने के कारण आज जीवन बहुत ही सुखमय हो रहा है। 
इसमें सन्देह नहीं कि इस फूल में काँटे की भाँति पू जीवाद 
का जन्म हुआ है, जिसके कारण पूंजीपतियों ने श्रम-जीवियों 
का खन चूसना अपना घममं समझ रखा है. । सच पूछा जाय, तो 
कभी-कभी हमको इस विज्ञान-वाटिका में फूलों की महक से 
उतना आनन्द नहीं मिलता, जितना इन तीखे कॉटों का डर 
लगा रहता है । ध्यानपूर्वेक देखा जाय, तो स्पष्ट हो जायगा कि 
पूंजी-प्रधान शिल्पवाद ने इस भूततल पर प्रकाश्य अथवा अग्न- 
काश्य रूप से अनेक युद्ध ठान दिये हैं; अनेक पिछड़े हुए देशों को 
दासता और अत्याचार की भयंकर वेड़ियों से जकड़ दिया है | 
विज्ञान ने मनुष्य की उत्पादक शक्ति के साथ विघातक शाक्ति 
को भी सैंकड़ों गुणा बढ़ा दिया है। किन्तु प्रश्न यह्‌ है. 
कि विज्ञान के दुरुपयोग से जो बुराइयाँ फेल रही हैं, उनके 
लिए विज्लान उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, या नहीं ? क्‍या 
आग इसीलिए बढ़ी बुरी चीज़ है कि उसके द्वारा वहुत-से 
दुष्टात्मा ग़रीबों के घर फूँंक डालते हैं ? जल्लाद की तलबार, 
डाक्टर का नश्तर और मिस्त्री का हथौड़ा, सभी एक लोहे के 
चने होते हैं । इसलिए क्या कोई लोहे को बुरा कह सकता है ? 
यदि जकलाद अपनी तलवार से दुसरे की गरदन काटता है 
तो उसमें लोहू का क्‍या दोप ? इसके अतिरिक्त विज्ञान तो 
पूंजीवाद की घुराइयाँ दर करने के लिए अनेक उपायो--जैसे 
योग या लाभ-वित्रण आदि--का अचलंब ले रहा है, 
जिससे आशा की जाती हैँ कि धीरेघीरे ये ब॒राइयाँ जाती 
रहेंगी । विज्ञान यह सिद्ध करना चाहता है. कि वेक्षानिक पू जी- 


प्रधातन शिल्पबाद ओर मनुष्यों के पाशबिक अत्याचार में 
कार वास्तावक आनवाय संबन्ध नहीं है | 


विज्ञान ८५ 


बज जीजल सीट: 





- 





निजी जज 
> आह शहा 5 


संप्रतिं हमंको यह देखना है कि विज्ञान ने सनुष्य के 
आध्यात्मिक सार्य में कोई रुकावट तो नहीं डाली है, और वह 
यदि सहायक हुआ है, तो कहां तक १ सबसे पहले विज्ञान ने 
नुष्य को 'सत्य के लिए सत्य की खोज? करना सिखा दिया है। 
विज्ञान ने हमको यह पाठ पढ़ा दिया है कि एक ही नियम इस 
अनंत त्रह्मांड में व्याप्त है। विज्ञान ने मनुष्य को उस ईश्वर के 
देन और अलुभव करने की शक्ति दी है, जिसकी इच्छा और 
” ब्रह्मांड की घटनाओं में सबंशा एकता है। विज्ञान फे कारण 
हमारे अंतःकरण से उस इश्वर की प्रतिष्ठा हटती जाती है, 
जो मनमाने खेल-तसाशे किया करता था, जो सांसारिक 
प्राशियों की तरह राम-हंप या हर्ष-शोक के मंकट में फँसा रहा 
करता था। विज्ञान ने मनुष्य के सामने ब्रह्मांड की अनंतता 
खोल कर रख दी है। इस असन्‍्त हृह्मांड में डढसकी और उसके 
भोपड़े की कया स्थिति है, इस पर विचार करते ही उसका 
अज्ञाल-जनित मिथ्या गये चकनाचुर हो जाता है।साथ ही 
चिज्ञान ने यह वतलाकर मलुष्य के सच्चे आत्मविश्वास और 
आत्मसम्मान की नींव डाल दी है कि मनुष्य किस अवस्था से 
उन्नत होकर किस अवस्था में पहुँच गया हे ।बह पशु-कोटि से 
उठकर मल्ुण्य-फोटि में किस प्रकार पहुँचा हे । विज्ञान ने अनेक 
प्रकार के दुःखों का विश्लेषण* किया है। उससे मनुष्य को 
विज्ञानातीत धार्मिक व्याख्याओं की अपेक्षा आशाचादी बनने में 
अधिक सहायता मिलती है। किसी वेज्ञासिक इश्वरवादी को 
बसी घवराहूट कदापि नहीं हो सकती, जेंसी कृपर-सरीखे 
धसंनिछ्ठ विद्वान्‌ को स्वेच्छाचारी इखर से हुआ करती थी | 
सिद्धांत के अतिरिक्त व्यवहार सें भी विज्ञान सार्वमौमिक 
फायों के संचालन में सहायता कर रहा हे। विज्ञान ने उन 
सकड़ों अभागे निस्सहाय प्राणियों का लीवन साथक वसा दिया 


न्भिम लेखलतिका 


न्जजिजज जज जज जज ज्जजजजज जज: 


है, जो १थवी पर भाररूप समझे जाते थे। पहले हम अंधे 
लूले, लँगड़े आदि को भोजन-वस्त्र देकर ही संतुष्ट हो जाते थे | 
इतनी ही हमारी साम»्य थी | किन्तु आज वज्ञानिक 
आविष्कारों के द्वारा हम उनको शिक्षा दे सकते हैं, जिससे वे 
केवल रुपया ही नहीं कमा सकते, वरन्‌ हमारे समाज के उत्साही 
ओर उपयोगी अंग बन जाते हैं | 
यातायात*, पत्र-व्यवहार या समाचार-वितरण के उन्नत 
साधनों का भी भौतिक सुविधा के अतिरिक्त एक आध्यात्मिक 
पंहुंलू है । संसार-भर के मनुष्य परस्पर भाई-भाई हैं, यह उच्च 
सिद्धांत अभी तक सिद्धांत मात्र था; किन्तु विज्ञान को इतने से 
संतोप नहीं हो सकता। वह इन साधनों के द्वारा यह दिखलाना 
चाहता है कि वास्तव में संसार एक बड़ा भारी कुटु व है । 
यह स्वेमान्य है कि संसार में जो कुछ उुन्दर और श्रेयस्कर* 
दिखाई दे रहा है, वह सब मनुष्य की आत्मा से ही प्रकट हुआ 
है । मनुप्य ने ही सभ्यता के प्रत्येक अंग--शासक और शासित 
संदिर ओर मसजिद, शिल्प और कला, पूंजी ओर मशीन 
सभा और संगठन आदि--का निर्माण किया है। मलुप्यों ने ही 
भाषाएँ बनाई हूँ | मनुष्यों ही ने पुराणों की रचना की है। 
मनुष्यों ने ही धर्म चलाये हैं। मृनुप्यों ने ही स्वग ओर नरक की 
खष्टि की हैं। कुरान, चाइवल ओर गीता भी उन्हीं की उपज है | 
ब्रग्मा, विष्ण से लेकर भत-प्रेत तक सभी उसकी आत्मा से 
प्रकट हुए तो सच है कि इखर ने मनुप्य को बनाया 
हैं; फिन्तु आजकल बहुतन्से मनुप्य यह भी कहने लगे है कि 
नहीं, मनुप्य ने शवर को बनाया है | कुछ भी हो, मनुप्य के 
लिए सबसे अधिक गौरव की थात यह है| कि उसने अपने 
आपकी जंगली पशुओं की श्रेणी से उठाकर मन॒प्य चना लिया 
१] सकती वर्षा नक्त तो उस यही संदेद रहा होगा कि वह कभी 





विज्ञान घ्द्छ 


“अशरुफुल मखलूकात* हो सकेगा, या नहीं। किन्तु उसने 
धीरे-धीरे विजय पाई, संसार में अपने अनुकूल आसन ग्रहण 
किया, और वह ईश्वर की र्ष्टि का उत्तराधिकारी बन गया। 
उसने इतने से ही बस नहीं की, किन्तु साहित्य, विज्ञान, 
शिल्प और कल्ला में भी आश्चर्यजनक उन्नति की | यदि वह 
इस समय अपने साहस ओर विचार के लिए गये करता है, 
तो उसकी साधारण परम्परा को देखते हुए कोई उसे उद्दंड 
नहीं कह सकता | वास्तव सें हीगल का यह कथन स्वेथा 
सत्य है कि सविष्य में ऐसा समय कभी नहीं आधचेगा, जब 
मनुष्य का यह उचित्त गये सिथ्या अहंकार गिना जा सके। 

किन्तु क्या कभी ग्रह संभव है कि वह प्राणी, जिसका 
विकास ऐसी नम्नर स्थिति से हुआ हो, जिसकी प्रगति कभी 
निम्नगामिनी* न हुई हो, वरन्‌ वर्तमान शताछ्दी के प्रारंभ-काल 
तक बराबर उन्नति के पथ पर अग्रसर होती रही हो, ज्षणिक 
पराजय से एकदम हताश होकर एकाएक अनन्त के गर्भ में 
विस्मृत हो जाय ? हमारी वर्तेसान कठिनाइयों और बाधाओं 
का हेतु हमको उत्तरोत्तर परिपक्त अवस्था में पहुँचाने के अति- 
रिक्त भला ओर क्‍या हो सकता है ९ भूतकाल में क्‍या हमारे 
मांगे में बाघाएँ नहीं उपस्थित हुईं थीं, क्‍या उन पर हमारी 
विजय नहीं हुई है, और कया इन पर हमारी विजय न होगी 
यह सिद्ध हो चुका है कि संसार में जितनी वस्तुएँ हैं, उस सब 
में हमारी आत्मा सबसे अधिक दुर्देमनीय और अजेय है | 
यदि किसी को यह छृढ़ धृढ़ विश्वास है कि हसारा वर्तमान इतिहास 
केवल भूमिका सात्र है, भविष्य इससे कहीं अधिक जाज्वल्य- 
सान* होगा, तो क्या वह कोरा आशावादी कहा जा सकता है ९ 
एक दिन था, जब मनुष्य वन्दर के समान था, और एक दिन 
वह आवेगा, जब मनुष्य देवताओं की कोटि में पहँँच ज्ञायगा | 


६० लेखलतिका 





दी है। आज भी बहुत-से नवयुवक्रों के सामने अपने जीवन का 
धंधा निश्चित करते समय यह प्रश्न उपस्थित होता है कि कहाँ 
में सबसे अधिक भलाई कर सकूगा, चाहे मुझे वहाँ सबसे 
अधिक रुपया न मिले ९ ख्त्रियों में, जिनके हाथ में आज शक्ति 
आ रही है, प्रेम का अनुभव करने की शक्ति पुरुषों की अपेक्ता 
अधिक होती है | अत्तएव उनकी संसार की अवस्था सुधारने 
के लिए उद्योगशील होना चाहिए। आजकल मनुष्य अपना 
पेट नहीं भरना चाहते, बल्कि अपना घर भरना चाहते हैं । 
इसी लालच और तृष्णा के कारण सैंकड़ों बुराइयाँ संसार 
में फेल रही हैं, ग्वाथें ओर मिथ्या अहंकार की बेहद वृद्धि हो 
रही है। स्त्रियों को ऐसे संकट के समय प्रेम ओर सेवा का आदर्श 
स्थापित करना चाहिए | इस वेज्ञानिक युग में ऐसा आविष्कार 
होना चाहिए, जिससे मलुष्य को अपनी प्रेम करने की शक्ति 
का यथार्थे अनुमान हो जाय | सभ्यता और शिक्षा का सबसे 
प्रथम कर्तग्य यह है कि मनुष्य की प्रेम-शक्ति संसार के सबसे 
अरुछे और सबसे ऊँचे पदार्थ में लगे, और उसको प्रेम की 
स्फूर्ति का अनुभव होने लगे | ऐसी अवस्था में आज जो हमारे 
नेता बने हुए हैं, वे नेता न रह जायँगे। प्रेम ही सदाचार की 
पराकाष्ठा* है। युद्ध की समाप्ति के लिए प्रेम ही सबसे अधिक 
उपयोगी है | आधुनिक घुराइयाँ दूर करने के लिए आजकल 
जो अनेक उपाय किये जा रहे हैं, प्रेम की स्थापना होने से 
उनकी यथाथे जाँच हो जायगी । जो देखने ही के नहीं, वरन्‌ 
सचमुच मनुष्य हैं, उनके अ्न्तःकरण में यह शक्ति अवश्यमेव 
किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहती है। यदि उसको व्यक्त 
करने के लिए कोई सीधा सार्गे निकल आवे, तो फिर हमको किसी 
सुधार की आवश्यकता न रहेगी। इसी सिद्धांत के कारण आधघु- 


निक अर्थ-शास्त्र और समाज-शास्त्र में बड़ा परिवर्तन हो रहा है। 


विज्ञान ६९ 


+4 सीसी 2 स> 2 जतज >> न्‍ ली अपन स्‍ पीजी मी जि जीन्‍ीजीजी॑ीजीड जी जीसी 4 जीजीजीजडीघडीज जी +ैौी जी ड जजृ डी ध 5 


गत शताब्दी के अंग्रेज़ी साहित्य के इतिहास में कारलाइल 
ओर र॒स्किन के नाम खूब असिद्ध हैं। उन्होंने आधुनिक व्यापार- 
पद्धति और संपत्तिशाख पर जो विचार प्रकट किये हैं, उनसे 
मनुष्यों की विचार-धारा ही वदल गई है। यह सच है कि पहले 
अपनी विलज्षणता के कारण वे लोगों को भ्राह्य प्रतीत नहीं हुए, 
परन्तु अपनी असाधारणता से ही उन्होंने लोगों के चित्त को 
आकुष्ट कर लिया, ओर अब सभी मननशील लोग यह समझ 
गये हैं कि उनके विचारों में सत्य का सूक्ष्म तत्व निहित है। 
सम्पत्ति-शासत्र विज्ञान है---कम-से-कम उसका आदशश ऐसा है 
कि वह विज्ञान के अन्तगेत हो सकता है। रिकार्डो और जेम्स 
मिल संपत्तिशाद्न के आचाये हैं | उन्होंने उसकी जैसी विवेचना 
की है, उससे यही मालूम होता है. कि संपत्तिशास्र का उद्देश्य 
उन सिद्धांतों ओर नियमों का क्रमवद्ध वर्णन करना है, जिनके 
आधार पर आधुनिक व्यापार-पद्धति स्थित है; अथांत्‌ अर्थ की 
प्राप्ति के लिए भिन्न-भिन्न व्यवसायशील जातियाँ जिन नियसों . 
से मर्यादित* रहकर व्यावसायिक समर्क्षेत्र* में अवृतीणे 
होती हैं, उनका स्पष्टीकरण ही संपत्ति-शासत्र है। वह व्यवसाय 
के दाँव-पेचों का बरणन करता है, उनकी घार्मिकता अथवा 
_ अधार्मिकता का निर्णय नहीं करता। इस शास्त्र के सिद्धान्तों 
का थोड़ा-बहुत ज्ञान सभी को है। मनुष्यों की सभो इच्छाएँ 
पार्थिवश्री के केंद्रीभूत होती हैं | मलुष्य को तभी सन्‍्तोष होता 
हे, जब कम परिश्रम से अधिक लाभ होता है। वह यही 
चाहता है कि सबसे सस्ता खरीदे, और सबसे महँगा बेचे | 
भिन्न-भिन्न वस्तुओं की जैसी माँग ओर पूर्ति होती है, तदनुकूल 
उनका मूल्य सिधारित होता है । संपत्ति-शासत्र की दृष्टि में 
सरुष्य एक खरीदने और वेचनेवाली मशीन है, जो इसी तरह 
की अन्य मशीनों से लड़ती-कगड़ती रहती है। संपत्ति-शास्र का 





धछ लेखलतिका 








अच्छा हो यदि श्री रामचन्द्र उस आज्ञा का उल्लंघन कर दें ५ 
और अपने आप राज्य का कार्य सँभाल लें । 
परन्तु श्री रामचन्द्रजी अपनो स्वाभाविक गम्भीर मुद्रा में 
स्थिर थे । उनकी मुख-श्री में कोई कुम्हलाहूट नहीं आईं । उन्होंने 
माता केकेयो को हलकी-सी मुसकान से केवल इतना ही कहना 
पर्याप्# समझा-- मुझे पिता जी की ओर आपकी आश्षा शिरो- 
धाये है। में जीते-जी पिताजी के वचन को कभी भ्ूठा न होने 
दूँगा | उनको सुझ पर पूरे अधिकार है। मैं अपने सुख-स्वार्थ 
की लालसा से कभी भी उनके इस अधिकार का तिरस्कार न 
' करूँगा, न होने दूगा। मैं पिठृ-चरणों में समर्पित हो चुका 
हूँ। वे जहाँ चाहेंगे वहाँ रहूँगा और जो चाहेंगे, बह करूँगा । 
बस, मुझे अब जाने की अनुज्ञा दीजिए ।? ह 
इतना कहने के पश्चात्‌ पिता तथा केकेयी के चरणों में 
मस्तक क्रुकाकर श्री रामचन्द्र बाहर निकल गये । 
माता कौशल्या ने प्रभात में श्री रामचन्द्र से यह समाचार 
सुना तो बौखला गई । उसने माता, के अधिकार को पिता के 
अधिकार से गुरुतर बताते हुए स्नेहमयी प्रेरणा करनी चाही 
कि श्रीरामचन्द्र व को जाने का विचार ,न.करें | लक्ष्मण ने _ 
पिता की सोहभरी अवस्था तथा अपनी अग्रः्बाहता का संकेत 
करते हुए श्रीरामचन्द्र को उत्तेजित करके राज्य सँमालने के 
लिए तैयार करना चाहा । सीताजी ने उनके संग बन जाने का 
हद संकल्प प्रकट कंरते हुए, सानो, उन्हें वन जाने से रोकना 
चाहा | सन्त्रिमण्डल तथा अ्रजामण्डल् ने उनके श्रति अपनी 
पूर्ण भक्ति प्रकट करते हुए और महाराज दशरथ की इस आज्ञा 
की निन्‍्दा करते हुए, सानो, उनके हाथ में राज-मुकुट सौंप देना 
चाहा। स्वयं भरत ने उनके पीछे अयोध्या में पहुँच कर यह घटना 
सुनी, तो अपनी साता की दुरिच्छा का अनादर करते हुए 


विजया की प्रथम प्रतिष्ठा ६४ 





दौड़े-दौड़े जाकर उन्होंने राज-सिंहासन पर, मानो, उन्हें बिठाना 
चाहा ही नहीं, वरन्‌ बिठा भी दिया, क्योंकि थे स्वयं उस पर 
कभी न बेठने की धारणा पक्की कर ही चुके थे। अन्त में यदि 
श्रीरामचन्द्र महाराज दशरथ की आज्ञा का उल्लंघन करना 
चाहते, तो थे एक प्रकार से पिताजी की अप्रकट हादिक 
अभिलापा को ही पूरी करते । 
परन्तु नहीं, उनको तो वन जाने और चौदह बरसों तक 
उधर से न लौटने की धारणा बन चुकी थी। वे जानते थे कि 
महाराज दशरथ ने महारानी कैकेयी को विज्लास-भवन में नहीं 
वबरन्‌ समर-भूमि में, ओर, उसके हाव-भाव पर भुग्व होकर 
नहीं, वरन्‌ उसकी अवला-दुलेभ वीरता से प्रसन्न होकर ही 
दो बर प्रदान किये थे । यह एक प्रकार से पति-पत्नी के बीच 
में नहीं, बरन्‌ सेनापति और उसके किसी योद्धा के वीच में 
हुई-हुई प्रतिज्ञा थी । इसका पालन केवल गृह-सुख की दृष्टि से 
ही नहीं, वरन्‌ राज-व्यवस्था की हृष्टि से भी आवश्यक था | 
इसका पालन उस राज-सत्ता का हृद आश्रासन-रूप आधार 
था, जिसकी वृद्धि के लिए ही आदशे-राजीं “प्रेज़ों-रझ्जनाय* 
सिंहासन पर आरूढ़ होता है । 


श्रीरामचन्द्र ऐसी प्रतिज्ञा को कुठलाकर राजा नहीं होना 
चाहते थे । वे अपना राजनीतिक श्रीगणेश स्वार्थ-मूलक 
असत्य व्यवहार द्वारा नहीं करना चाहते थे। कोई बात नहीं 
वे राजा न बनें । कोई बात नहीं, वे बन में ही समाप्त हो जावे | 
परन्तु यह नहीं होगा कि वे अपने व्यक्तिगत ऐश्वर्य-भोग की 
लालसा से अपने इष्ट मित्रों तथा पारिवारिक जनों के स्नेह- 
पाश में वेंघकर अपने रघुवंशी पूत्रजों के सत्य-प्रतिष्ठित सिंहा 
सत पर असत्य-पोपषक होकर चेटठें। पिताजी नहीं बचेंगे; मावाजी 
को बुढ़ाप में घोर दुःख रहेगा; भाई ओर पत्नी को मेरे लिए 


६६ लेखलतिका 





& 5८ 


न जाने क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ेंगे,और स्वयं मुझ पर न जाने 
कया बीतेगी--यह सब छुछ था, और बे इस काले बादल को 
अपने सामने स्पष्ट देख रहे थे । परन्तु क्षण-क्षण में उनकी 
भ्रव-सम अन्‍्तरात्मा का विद्यत्‌ प्रकाश उस काले बादल को 
भी जाज्वल्यमान कर रहा था | राज्य श्रीरामचन्द्र के लिए नहीं 
था। चे राज्य के लिए थे | प्रजा के सेवक, पालक और शिक्षक 
बनकर राज-मयादारूपी घर्म के संस्थापन तथा राजमयांदा- 
भंगरूपी अधमे के नाश के लिए ही उनका अवतार हुआ था । 

प्रतिवषे ही विजया अर्थात्‌ विजयदशमी आती है और 
श्रीरामचन्द्र दवरा किये गये अधसे-नाश की बाता को हमारे 
स्वृति-फलक पर नये सिरे से अक्लित करती हुईं चत्नी जाती 
है। परन्तु यह उससे भी कहीं अधिक ध्यान देने और स्मरण 
रखनेवाली वार्ता है कि अयोध्या-विजय की आधार-शिज्ला उस 
समय रखी गई थी जब श्रीरामचन्द्र आत्म-विजयी होकर 
बनवास को निकल पढ़े थे | आत्म-भूमि में धर्म-संस्थापत करना 
ही अधमे-नाश के लिए योग्यता पेदा करना है। सच्ची आत्म- 
बिजय हो इस घर्म-संस्थापन का द्वार है | 

जो सनुष्य अपने कतेव्यों की अधिक सीमांसा* करते हैं. 
ओर अपने अधिकारों की कम रट लगाते हैं, वे अपने जीवन 
में अवश्य ही कुछ ठोस कारये कर जाते हैं। अस्येक सच्चे राष्ट्र 
सेवक की ऐसी ही मानसिक धारणा होती है और होनी 
भी चाहिए | 





दीनों पर प्रेम ६७ 


जीजअजीजिज जि लि जज कट जैज ० जन" ज ४४ + ८ नव जऑजडडिजजनजजओओ्ज ललित ०5 


दीनों पर प्रेम. | 
(श्रीवियोगी हरि) 


हम नाम के ही आस्तिक' हैं | हर बात में ईश्वर का 
तिरस्कार करके ही हमने “आस्तिकः की ऊँची उपाधि पाई है | 
ईश्वर का एक नास “दीनवन्धु” है।यदि हम वास्तव में 
आस्तिक हैं, इश्वरभक्त हैं, तो हमारा यह पहला घर्मे है कि 
दीनों को प्रेम से गले लगायें, उनकी सहायता करें, उनकी सेवा 
करें, उनकी शुश्रपा करें, तभी ना दीनबन्धु इंश्वर हम पर प्रसन्न 
होगा ? पर ऐसा हम कब करते हैं;? हम तो दीन-दुव लो को 
ठुकराकर ही आस्तिक या दीनबन्धु. भगवान्‌ के भक्त बने 
बेठे हैं। दीनवन्घधु की ओट में हम दीनों का खासा शिकार 
खेल रहे हैं। केसे अद्वितीय” आस्तिक हैं हम ! त-जाने कया 
समझकर हम अपने कल्पित इश्वर का नाम दीनबन्धु रखे हुए हैं 
क्यों इस रद्दी नाम से उस लक्ष्मी-कान्त का स्मरण करते हैं ९-- 

दीननि देखि घिनात जे, नहि दीननि सों कास | 
कहा जानि के लेत हैं, दीनबन्धु कौ नाम ॥ 

यह हमने सुना अवश्य है, कि त्रिलोकेश्वर श्रीकृष्ण की 
मित्रता और प्रीति सुदामा नाम के एक दीन-दुबल ब्राह्मण से 
थी | यह भी सुना है, कि भगवान्‌ यद्धुराज ने महाराज दुर्योधन 
का अतुल आतिथ्य* अस्वीकार कर बड़े प्रेम से गरीब विद्ुर के 
यहाँ साग-भाजी का भोग लगाया था । पर यह वातें चित्त पर 
कुछ बेठती. नहीं हैं। रहा हो कभी ईश्वर का दीनवन्धु नाम 
पुरानी सनातत्ती बात है. कौन काटे, पर हमारा भगवान्‌ दीनों 
का भगवान्‌ नहीं है ।हरे ! हरे ! वह उन घिनोनी छुटियों में 
रहने जायगा ९ वह र॒त्नलटित स्वण-सिंहासन पर विराजने 
वाला ईश्वर उन भुक्खड़ कंगालों के फटे-कटे कम्वलों पर बेठने 





१०० लेखल तिका 


जज जज जज 





जज 


दीम-बन्धु का निवास-स्थान दीन-हृदय है। दीन-हृदय ही 
मन्दिर है, दीन-हृदय ही मस्जिद है, दीन-हृक्य ही गिरजा है। 
दीन-दुबेल का दिल दुखाना भगवान्‌ का मन्दिर ढहाना हे । 
दीनों को सताना सबसे भारी धर्मविद्रोह है।दीन की आह 
समरत धम्मकामों को भस्मसात्‌* कर देने वाली है | सनन्‍्तब॒र 
मलुकदास ने कहा है:-- 
“दुखिया जनि* कोइ दूखिये, दुखिये अति दुख होय । 
दुखिया रोइ थुकारि है, सब ग़ुढ़ साटी होय॥7 
दीनों को सताकर, उन्तकी आह से कोन मूर्ख अपने स्वर्गीय 
जीवन को नारकीय बनाना चाहेगा ९ कौन इश्वर-विद्रोंह' करने 
का दुस्साहस करेगा ? गरीब की आह भला कभी निष्फल 
जा सकती है--- 
तुलसी! हाय गरीब की, कबहुँ न निष्फत्न जाथ । 
मरे बेल की चाम सों, लोह भस्म हो जाय ॥ 
ओर की बात हम नहीं जानते, पर जिसके हृदय में थोड़ा- 
सा भी प्रेम है, वह दीन-दुवलों को कभी सता ही नहीं सकता । 
प्रेमी निदेयी कैसे हो सकता है ? उसका उदार हृदय तो दया 
का आधार होता है। दीन को वह अपनी पग्रेममयी दया का 
सबसे बड़ा और पवित्र पात्र समझता है । दीन के सकरुण 
नेत्रों में उसे अपने प्रेमदेव की सनमोहिनी मूर्ति का दशेन 
अनायास आआप्त हो जाता है।दीन की ममभेदिनी* आह में 
उस पाग्नल को अपने ग्रियतम का मधुर आहान सुनाई देता 
है.। इधर बह अपने दिल का द्रवाज़ा दीन-हीनों के लिए दिन- 
रात खोले खड़ा रहता है, और उधर परमात्मा का हृदय-द्वार 
उस दीन प्रेमी का स्वागत करने को उत्सुक रहा करता है। 
प्रेमी का हृदय दीनों का भवन है। दीनों का हृदय दीनबन्घु 





मनुष्य ओर समाज १०१ 


“ भगवान्‌ का मन्दिर है और भगवान्‌ का हृदय प्रेसी का वबास- 
स्थान है । प्रेमी के हृदय में दरिद्रनारायण ही एकमात्र प्रेम- 
पात्र है। दरिद्र-सेवा ही सच्ची ईश्वर-लेवा है । दीन-दयालु ही 
आस्तिक है, ज्ञानी है, मक्त है और प्रेमी है । दीन-ढुखियों के 
दर्द का मर्मी ही महात्मा है। ग़रीबों की पीर जाननेहारा ही 
सच्चा पीर है । कबीर ने कहा है :-- 

'कबिरा' सोई पीर है, जो जाने पर-पीरँ । 

जो पर-पीर न जानई, सो काफ़िर बे-पीर ॥ 





नसलेलनभन टन धरमनम८ान&«्न 


प्रौर 
मनुष्य और समाज 
( श्री रघुनन्दन ) 

मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। यह समाज 
में रह कर ही प्रसन्न रहता है । इसकी मानसिक तथा शारीरिक 
शक्तियों का यथेष्ट विकास भी समाज में रह कर ही हो सकता 
है । प्रकृति की ओर से ही मनुष्य में समाज में रहने की प्रवत्न 
चाह विद्यमान है | समाज के बिना इसका जीवन दूभर हो जाता 
है। समाज से अलग कर देना? या “बिरादरी से निकाल 
देना?ः--मलुष्य के लिए सबसे कड़ी सजा समभी जाती है। केद, 
जेल और एकान्त कारावास आदि कठोर दण्ड मनुष्य को 

समाज से प्रृथक्‌ कर देने के ही नास हैं । | 
> न केवल सहज-प्वृत्ति* के कारण, अपितु आवश्यकता के 
“अनुरोध से भी मनुष्य को समाज में ही रहना पढ़ंता है। 
संसार के किसी भी अन्य प्राणी को अपनी स्थिति, रक्षा और 


चृद्धि के लिए समाज की इतनी अपेक्षा नहीं, जितनी मनुष्य - 


को है। प्रकृति ने पशु-पत्षियों को, यहां तंक -कि कीट-पतंगों 
तक को भी, अपने जीवन की रज्ञा के साथनों से सुसलित* 





नल 


श्०ए्‌ लेखलतिका 


गज की की जन फेस 


करके संसार; में-भेजा है। किसी को सींग, किसी को तेज़ दाँत, 
किसी को -डंक और किसी को तीच्ुण नख प्रकृति की ओर से 
ही मिले हुए हैं जिनसे वे अपने शत्रुओं से अपना बचाव स्वयं 
कर सकते हैं । अपनी रक्षा के लिए वे किसी के मुहृताज* नहीं | 
अपने रहन-सहन, खान-पान और वेष-भूषा के लिए भी उन्हें 
किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं। उन्हें रहने के लिए न घरों की 
ज़रूरत है, न पहनने के लिए कपड़ों की, न खाने के लिए दूसरों 
के बनाये हुए भोजन॑ की और न बीमारी में डाक्टर की | 
उनकी आवश्यकताएँ उनके अपने अधीन हैं। 

पर, मनुष्य, जो अपने आपको संसार के सब जीवों से 
श्रेष्ठ मानता है, इस अंशे में, निःसन्देह, अधूरा है । इसे प्रकृति 
ने सींग आदि के समान अपनी रक्षा.-का कोई साधन नहीं 
दिया। ना ही इसे ऐसा सुदृढ़” ओर बलिए बनाया है कि यह 
बिना किसी दूसरे की सहायता के, जीवित रह सके। इसे 
अपने पालन-पोषण के लिए, खान-पान: के लिए, रहन-सहन 
के लिए, वेष-पहिरावे के लिए तथा ज्ञान-विज्ञान के लिए सदा 
अपने साथियों की आवश्यकता रहती है। मनुष्य को अपने 
हर कास के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है । जहाँ गो 
ओर बकरी का बच्चा पेदा होते ही चलने-फिरने लगता है, 
बन्द्र का बच्चा जन्म से ही तैरना जानता है, वहाँ मनुण्य का 
बच्चा पैदा होते ही दूसरों का मुहताज होता है । चलना-फिरना 
और तैरना तो दूर रहा, इसे तो बैठनां और खाना तक भी 
नहीं आता । यदि साता अपनी अगाघ* समतासयी सेवा- 
शुश्रषा से उसका पालन न करे, तो .शायद उसका ,संसार -में 
जीवित रहना भी असंभव हो जाय । मनुष्य के बच्चे को: 
जितनी दूसरों की सहायता की आवश्यकता.' है, .उतती और 
फिसी जन्‍्तु के बच्चे को नहीं । 





मनुष्य और समाज १०३ 


बीज >> जी स्‍तर सत सी पलटी जी ली + ली चीज न अल अजीज लव न्‍ी ४ न्‍ ली डील टी व २3 3ल जलती टली न्‍ी डे 


न केवल बचपन में, अपितु बड़ा होकर भी मनुष्य दूसरों 
पर आश्रित रहता है| दूसरों की सहायता के विना वह एक 
पग॒ भी नहीं चल सकता | एक लड़का जो 'घर से स्कूल तक 
पैदल जाता है, वहः भी दूसरों की सहायता से ही ऐसा कर 
पाता है । अपने असंख्य साथियों के अनन्त परिश्रम का लोभ 
उठाकर ही वह पेदल चलता है। जिस सड़क पर से वह पेदल 
चल कर जाता है, उसके बनाने में, न जाने, कितने ही मनुष्यों 
ने मिलकर परिश्रम किया है।जिन हथियारों से वह बन पाई 
है, उनके बनाने में और उनके लिए कानों में से लोहा निकालने 
के लिए, असंख्य व्यक्तियों का परिश्रम और दिमाग लगा 
होगा । इन सब व्यक्तियों की सहायता लेकर ही एक बच्चा घर 
से सकृूल तक चल पाता है| इसी प्रकार जिन कपड़ों को हम 
पहनते हैं, उनके बनाने में भी असंख्य मनुष्यों का परिश्रम 
छिपा हुआ है । कपास को पेदा करना, उससे कपड़ा बनाना, 
फिर उसे सीना आदि सब छुछ हमारे लिए दूसरे करते हैं। 
एक कमीज्ञ पहनने सें हम अवश्य दूसरों की सहायता प्राप्त 
करते हैं। इस लिए यह सोचना बिलकुल सिथ्या भ्रम* और 
निरा घसंड है कि मनुष्य अपने साथियों की सहायता के बिना 
जी सकता है । 

: थदि मनुष्य यह चाहे कि सें अपना हर काम स्वयं कर लू 
तो, प्रथम तो, ऐसा करना उसके लिए असम्भव है, कारण कि 
उसकी योग्यता और शक्ति परिच्छिन्न* है। दूसरे ऐसा करने 
से उसकी प्रवृत्ति और ज्ञान का क्षेत्र बहुत ही संकुचित* हो 
जायगा। वह पशुओं के समान अपनी जीवन सम्बन्धी आब- 
श्यकताओं--खाना-पीना, सोचा और घूम आवा--ही पूर्ति के 
अतिरिक्त और छुछ न कर सकेगा । यदि घोबी हमारे कपड़े 
साफ़ न करे, चदि चमार हमारा जूता न बनाये, यदि घर में 





१०४ लेखलतिका 





माता हमारी रोटी न पकाये, यदि नोकर हमारे बरतन साफ़ न" 
करे, और यदि ये सभी काम हमें स्वयं करने पड़ें, तो भ्रत्येक 
बालक सोच सकता है कि उसकी . पढ़ाई के लिए कितना .समय 
मिल सकता है । इस प्रकार प्रत्येक बालक की .पढ़ाई में और 
फलत:ः उसके द्वारा उन्नति और महत्ता" प्राप्त करने में उन सब 
धोबी, चमार, पाचक और दूसरे असंख्य मनुष्यों की सेवा का 
पर्याप्त भाग है। उन सबके परिश्रेंस तथा सहयोग का फल 
डठा कर ही एक बालक पढ़ाई कर सकता है । इससे यह स्पष्ट 
है कि.मनुष्य का यह अभिमान भिथ्या है कि मैं अकेला और 
निरपेक्ष* होकर रह सकता हूँ | मनुष्य तो छोटे-छोटे कामों में-- 
ओर आत्मरक्षा तथा बृद्धि आदि बड़े-बड़े कामों में भी--सदा 
दूसरों की सहायता पर आश्रित है । इतर" प्राणियों से मलुष्य 
इस अंश में, निम्चय ही, कुछ हीन है । 
अपनी इस हीनवा की पूर्ति मनुष्य सामाजिक जीवन से 

करता है। सामाजिक जीवन पशुओं में भी है सही, पर उनमें 
वह इतना साप्ेज्ञ नहीं, जितना मनुष्यों में है। सामाजिक जीवन 
से जहाँ मनुष्य की उपयुक्त कमी की पूर्ति होती है, वहाँ इसके 
जीवन की सारी सरसता, सारे सुख-आनन्द और. माघुयें का 
कारण भी सामाजिक जीवन ही है। समाज से ही इसे जीवन 
मिलता है, समाज से ही बुद्धि एवं शक्ति मिलती है, समाज के 
द्वारा ही इसकी रक्षा होती है और समाज ही. इसकी वृद्धि 
ओर समुत्नति का कारण है | संक्षेप में अकेला व्यक्ति. इस 
अनन्त संसार में तिनके के समान अकिद्ित्कर* है और समाज 
के संपके* में आकर ही वह सब कुछ है। एक शब्द में सनुप्य 
के लिए सब कुछ उसका समाज हे।. + '.. - ह 
” यह बांत जहाँ सदा और सबेत्र सत्य है, वहाँ आज के 
मनुष्य के लिए तो यह अत्यन्त अनिवाय हो गई है | आज 





जी जजॉजिलज अजीज ली 


मनुष्य और समाज १०४ 





ल्िििजजिज जज जल जज जज जल जज जज जज जज जज: 





बाजी 


का मनुष्य तो चिल्कुल ही अपने समाज पर आश्रित है | बह 
एक कल के पुरज्षे के समान है जिसकी उपादेयता”.उस कल 
में जुड़े रहने से ही है। आज के मनुष्य के अधिकार, उसके 
समाजञ्ञ के अधिकारों में हैं । आज के मनुष्य की मुक्ति उसके 
समाज की मुक्ति में है । संगमाज से बाहर निकल कर उसका 
कोई मूल्य नहीं--बह्‌ स्वथा नगण्य” है । 

साथ ही, यह बात भी ध्यान में रखने योग्य हे कि 
समाज की दृष्टि से सनुष्य या व्यक्ति कोई उपेक्षणीय* वस्तु 
नहीं है । आखिर समाज व्यक्तियों के मेल से ही बनता है 
ओर समाज का निर्माण भी व्यक्ति ने अपने लाभ के लिए ही 
किया है। चूं कि सनुष्य अकेला कुछ नहीं कर सकता, इसलिए 
'डसने अपने लाभ के लिए समाज का संगठन किया है। अतः 
व्यक्ति की अवहेलना* करके समाज न उन्नति कर सकता है, 
ओर न दी स्थायी रह सकता है । 


* समाज एक शरीर के समान है ओर भिन्न-भिन्न व्यक्ति उस 
समाज-शरीर' के प्रथक-प्रथक अड्भ०प्रत्यद्ञा है. या समाजरूपी 
मशीन के अलग-अलग पुरजे हैं। यदि मशीन के पुरज्े निकम्मे 
लोहे के बने हों, तो क्या वह सशीन स्थायी हो सकती हे ९ 
शरीर के अइ्ड-प्रत्यड्ञों की दुबलता या वलिएता पर ही शरीर 
का दुबेल या बलिए होना निभर है। कच्ची इंटों फी-बनी हुई 
दीवार भी कच्ची ही कही जाती है। मोतियों की कीमत से ही 
साला की कीसत आकी जाती है, । निकमस्मे व्यक्तियों से बना 
हुआ समाज भी अवश्य-निरकंस्मा गिना जाता है | 

न केवल यह, अपितु मशीन में यदि कुछ पुरजे- अच्छे 
येढ़िया लोहे के हों और छुछ घटिया निकम्मे लोहे के, तो भी, 
निकम्मे पुरज्षों के शीघ्र घिस जाने के कारण वह सारी मशीन 
ही शीघ्र निकम्सी हो जायगी। ऋुछ पुरज्ञों का बहुत बढ़िया 


् 


श्ण्य लेखलतिका 


->-ल- 


समता और समानता के अधिकार प्रदान करे | कतिपथ सत्ता- 
धारी व्यक्तियों के हाथों निवेलों और छोटों पर अत्याचार न 
होने दे । इसी परस्पर-भावना में संसार की सच्ची शान्ति का 
मूलमंत्र निहित* है । 














सचय्‌ 


( अचछु० श्री पं० जनादेन मा ) 
“कतेव्य: सम्बयो नित्यं कर्तव्यों नातिसख्बयः ।?? 

यदि मनुष्य सारी उम्र परिश्रम करने में समर्थ होता, तो 
हमें अपव्यय* आदि हानिकारक विषयाँ के विरुद्ध कुछ कहने 
की ज़रूरत न थी और तब आमद-ख़्चे, बराबर करने पर भी 
दुःख से समय विताने का.प्रसज्गे न आता । क्योंकि रोज-रोज 
की आय से रोज़-रोज़ का अभाव दूर होता जाता । किन्तु सारी 
उम्र कोई काम नहीं कर सकता। युवावस्था की शक्ति आधी 
उम्र बीतने पर नहीं रहती और अधेवयस्क की शक्ति बुढ़ापे में 
नहीं रहती । मतलब यह कि बाल्यावस्था में मनुष्य जैसे 
जीबिका प्राप्त करने में असमर्थ होते हें, चृद्धावस्था में भी वैसे 
ही असमथे हो जाते हैं | कितने ही तो बुढ़ापे के पहले ही रोग- 
शोक के द्वारा स्वास्थ्य खो बेठते हैं, और कोई काम करने 
योग्य नहीं रहते | तब उनकी यह पहली शक्ति, श्रमसहिष्णुता"ँ 
ओर उद्योगपरता* एक भी काम नहीं आती | उस समय उन्हें 
था तो अपने को दूसरे की शक्ति और कमाई पर निर्भर रहना 
पड़ता है, या अपनी युवावस्था के सम््वित धन पर । मनुष्य 
यदि जड्डली जानवरों की तरह अपने जीवन को व्यतीत कर 
सकते और फल मूल किया जानवरों के मांस से ही अपना 





न 


सम्य १०६ 


हू ह अजीज अजीज जी जी जी अलीजी > +ा 7 ८ >>2+++“->ललतलल+लतल+ललडर- जीजा ली ली ली +वडजी अजीज जी जजीलजी जा 


पेट भर लेते तो संचय* की कुछ अधिक आवश्यकता न थी | 
किन्तु ईश्वर की नीति और ही तरह की है। ईश्वर ने मनुष्यों 
को अभाव-ज्ञान, आकांक्षा, आशा, विश्वास, वासना और 
अनुभव-शक्ति देकर अन्यान्य प्राणियों से प्रथकू कर रखा 
है। क्रमशः उन्नति करना ही मनुष्यों के जीवन का मूल-मन्त्र 
है । मनुष्यों को यदि इश्वर यह ज्ञान न देते तो दिन-दिन जो 
नया आविष्कार होता है, कल्ला-कौशल की जो वृद्धि होती है 
यह किसी के देखने में न आती | मनुष्य जब विल्कुल जद्न्‍भन्ली 
की तरह असभ्य अवस्था में रह कर नग्न पशुओं की भाँति 
जीवन बिताते थे, शिकार के द्वारा जो कुल मिल जाता था उसी 
से अपनी छ्ुधा* का निवारण करते थे, तब भविष्य के लिए 
उन्हें कोई चिन्ता न थी । किन्तु जब उन्होंने देखा कि शिकार 
रोज़-रोज़ नहीं मिलता, किसी-किसी दिन उपवास” भी करना 
पड़ता है, तब उन्होंने एक दिन की आहाये सामग्री से कुछ 
कुछ बचा कर दूसरे दिन के लिए रखना सीखा। आखिर जब 
प्रतिदिन पशुओं को मारने से वन्य पशुओं का हास होने लगा 
तब, जड़ली पशु न मिलने के कारण, कभी-कभी कई दिनों 
तक भूखे रह कर समय बिताने की नाबत आईं। उस समय 
उन्होंने अपने जीवन-निवाह के लिए नवीन सा का आश्रय 
लिया । तब वे कुछ धान जमा कर उसे वोने, खेती करने ओर 
उसके लिए उपयुक्त हथियारों के बनाने में लगे। धीरे-धीरे 
उन्हें जाड़े, गरमी और वर्षा का भी वोध होने लगा और वे 
देह की रक्षा का उपाय हढ़ने लगे। उन्हें बाघ, सिंह, साँप 
आदि भचकछूर जीवों से अपनी रक्षा करने की बात भी समझी | 
सुख-स्वच्छन्द. से रहना पसन्द' आया। भोजन, -वस्र ओर 
घर विशेष प्रयोजनीय जान पड़ने लगे। वे खोजने लगे कि 
आराम केसे मिलेगा | किन्तु जब उन्होंने देखा कि एक ही 


११० लेखलतिका 


व्यक्ति से खाद्य-बस्तुओं का संग्रह करना, रसोई बनाना, परो- 
सना, बाल-वच्चों की हिफ़ाज़त,* खेती करना, पशुओं का पालन, 
गाय दुहना, कपड़ा बुनता, घर बनाना, ग्रहस्थी के लिए आव- 
श्यक वस्तुओं का संग्रह करना और ओऔज़ार आदि बनाना 
जितने काम हैं, सभी सम्पन्न नहीं हो सकते और इन कामों सें 
कोई ऐसा भी नहीं जो छोड़ दिया जाय, तब उनके हृदय में 
स्वार्थ-त्याग का भाव जागृत हुआ । तब वे परस्पर एक-दूसरे 
की सहायता करने लगे | अपने आवश्यक कामों को सभी ने 
आपस में बाँट लिया। सभी अपने अपने वल और बुद्धि के 
अनुसार काम्र करने ल्गे।कोई लोहा ढुंढ़ कर लाने लगा। 
कोई उसे आग में गला कर और ठोक-पीट कर खुरपी, कुदाल 
ओर हँखुआ तैयार करने लगा कोई जमीन खोद कर खेत 
दुरुस्त करने लगा। इसी प्रकार कोई बोने, कोई उसकी हिफ़ाजत 
करने, कोई काटने और कोई उसे तैयार करके सुरक्षित स्थान 
में रखने लगा । धीरे-घीरे व्यवसाय चढ़ चला | आवश्यकता- 
जुसार लोग एक चीज़ के बदले में दूसरी चीज़ लेने-देने लगे । 
इस प्रकार क्रमशः कृषि, शिल्प और बनज-व्यापार आदि की 
सृष्टि होकर व्यक्तितत और जातिगत घन की उत्पत्ति हुई। 
जो मनुष्य असभ्य होकर, जड्ञली जानवरों की तरह जड्गल में 
रह कर, जीवन व्यतीत करते थे वे क्रम-क्रम से अपनी उस 
पाशव अवस्था.को अतिक्रम* कर शिक्षित, शिष्ठ और वास्तविक 
मनुप्य हो चले । इस तरह कितनी ही शवाच्दियाँ बीतने पर 
अय मनुष्य नीति, धमम, ज्ञान, विज्ञान आदि अनेक गुशों के - 
सहारे सम्यता के ऊँचे शिखर पर आ पहुँचे हैं | आजकल 
की जो मनुष्यों की वृद्धिह्ठात अवस्था है उसकी तुलना अथम 
काल की वाल्य अवस्था से किसी प्रकार नहीं हो सकती । यदि 
फोई पूछे कि अवस्था में इस प्रकार परिवर्तन होने का कारण 


2. 


सम्बय १११ 


बज लडलनलजजनक + तन न न+-लल जीन ली अजीज जल जी जी _ पीली बी जन 4 अजीज जी ७ -न्‍ जीत ल जल 5 





तीज 


क्या है ? तो हम यही उत्तर देंगे कि एक-सात्र स्वार्थ-त्याग 
ओर स्वार्थे-त्याग-जनित समच्वय | आज की समस्त आहार- 
सामग्री से यदि कुछ न बचाया जाय तो कल के लिए कुछ 
नहीं रह सकता, यह स्वयंसिद्ध है । कल के लिए यदि तुम कुछ 
रखना चाहो तो आज तुम्हें कुछ ज़रूर त्यागना होगा। मान 
लो, आज मेरे हाथ दस रुपये आ गये हें; इन रुपयों को खचे 
करके में अच्छे-अच्छे फल-मृुल और भमिठाइयों से अपनी 
रसना को ठ्प्त कर सकता हूँ; किराये की गाड़ी या मोटरकार 
पर चढ़ कर इधर-उघर हवाखोरी कर सकता हूँ; सुगन्धित 
तेल और इत्र के द्वारा अपने सारे शरीर को सुधासित कर 
सकता हूँ, अथवा दस-पाँच मित्रों को भिमन्त्रित* कर मिन्र- 
सम्मिलन का सुख प्राप्त कर सकता हूँ, किन्तु कल्ल एक रुपया 
भी कहीं से. मिलने की सम्भावना नहीं है तो मुझे इसका आज 
निश्चय कर लेना चाहिए कि इन रुपयों को किस काम में किस 
परिमाण से खचे करना होगा | कल मुझे कुछ आमदनी हो या 
न हो पर भूख लगे ही गी ओर भोजन भी करना ही पड़ेगा। 
अतणव या तो आहाय्य वस्तुओं का कुछ अंश या दस रुपयों 
में से कुछ रुपये मुझे बचा कर ज़रूर रखने चाहिएँ | इन 
रुपयों से आज सें जितना सुख उठाना चाहता हूँ उसके कितसे 
ही अंशों से मुझे वद्ित होना पड़ेगा । बहुत बढ़िया आहार 
करने से शुज्ञर न होगी | टहलने के लिए किराये की गाड़ी न 
लेकर पैदल ही घूसना-फिरना होगा। भोग-विलास की वस्तुओं 
से परहेज़े रखना होगा | यदि में इतना स्वाथे-त्याग कर सक्कृ 

तो इन दस रुपयों में से तीन-चार रुपया ज़रूर ही बचा सह गा 
ओर वही कठिन समय में काम आवेंगे। यह वात छुछ एक 
ही दिन के लिए नहीं कही गई है, बल्कि उम्र भर इस वात का 
ध्यान रखना चाहिए। भविष्य के लिए, वक़्त-वे-वक्ष्त के लिए - 


श्शश्‌ लेखलतिका 


और कार्य करने में असमर्थ होने पर जीवन-निर्वाह के लिए, 
वर्तेमान-कालिक आय में से कुछ बचा रखना मनुष्य-सात्र का 
क॒र्तन्य है । तुम अपने लिए जितना स्वार्थ-स्याग करना चाहते 
ही उससे कुछ अधिक स्वार्थ-त्याग करके सब्म्बय की सात्रा' 
बढ़ाओ जिसमें तुम्हारे 'परोक्ष' में तुम्हारे प्रिय परिवार पर 
दुःख का पहाड़ न हूट पड़े । 

विचार-शक्ति और ज्ञान-प्राप्ति के साथ ही साथ सम्वय- 
शील होने की शिक्षा भी प्राप्त करनी चाहिए । सम्वय न करना 
असभ्यता का चिह्न है। असम्यगण स्वभाव से ही असमख्वय- 
शील होते हैं, क्योंकि उन्हें भविष्य की कुछ फ़िक्र नहीं रहती । 
कुछ असच्वयी लोगों को यह कहते सुना है कि “आज खाय 
ओर कल को मकक्‍्खे, ताको गोरख, सज्ञ न रक्‍खे।” पर वे 
यह नहीं सोचते कि यह किसकी कहीं हुईं बात है । गोरखनाथ 
योगिराज थे, विरक्त थे, उनको यह कहना शोभा देता था, 
किन्तु हम बाल-बच्चेवाले गृहस्थ बैसी बात कह कर क्‍यों 
असख्यशील बनें ९ जो समद्वय नहीं करते उन्हें कभी-कभी 
चंड़ा ही कष्ट सहना पड़ता है। ऐसे कितने ही असच्वयी व्यक्ति 
देखें गये हैं जो जवानी में खूब रुपया कमाते हैं पर कुछ. सद्चय 
न करने के कारण बुढ़ापे में अकमेश्य और असहाय होकर 
कुत्ते की मौत्त मरते हैं | अतएव जो शिक्षित हैं, और जिन्हें 
सभ्य कहलाने का गये है वे सम्बयशील होने का भी अवश्य 
ध्यान रखें । असख्वयी लोगों की गणना सभ्य समाज में नहीं 
हो सकती । स्ष्टि के आरम्भ में मनुष्य कुछ सद्बय करना 
नहीं जानते थे। वे उस समय ऐसे असम्य थे कि खेती तक 
करने का उन्हें ज्ञान न था। ज्यॉ-ज्यों उन्हें अभाव होने लगा 
त्थॉ-त्यों उनकी आँखें खुलने लगीं और वे सम्बयशील होने 
लगे। यह सभ्यता कई युगों के सख्चयय का परिणाम है। यदि 


न्जीिजिजी अजीज तल की सा 








सद्बय श्१३्‌ 


>लल>नलचलज>न- >जन जलन - «४ अं अनड> 33 ->ल>+ -2+ 


मनुष्यों को सम्बय का ज्ञान न होता तो इतने प्राचीन काल से 
जो उत्तरोत्तर सभ्यता और कल्ला-कौशल का परिष्कार होता 
आया हे वह कुछ न होता । बिना समद्बय के कभी उन्नति नहीं 
हो सकती | अतएवं यदि तुम इसी उम्र सें रोज़-रोज़ कुछ 
स्वार्थल्याग करना सीखोगे तो अपने जीवन में तुम्हें कभी 
अभाव न होगा--कभी किसी से कुछ मॉाँगने का अवसर प्राप्त 
न होगा | ऋणी होकर चिन्ता के मारे जवानी ही में वृद्ध की 
तरह जीणे-शीण न होओगे । वरन्‌ तुम्हारी सारी उम्र बढ़ 
आराम से कटेगी । जब तुम दूसरों को सुख पहुँचाने के लिए 
स्वार्थत्याग करना सीखोगे तब स्वयं सम्बयशील बनोगे । 
क्योंकि सख्बरय का प्रथम साधन स्वाथेत्याग ही है। जो लोग 
अभी तक कुछ समय नहीं कर सके हैं वे यदि अब से भी 
कुछ सत्य करने का अभ्यास करें तो थोड़े दिनों में कुछ धन 
जमा हो जाने पर सम्बय की ओर उनकी श्रवृत्ति अपने-आप 
बढ़ेगी । पहले अपनी अवस्था के अनुसार जरूरी कामों में 
खच करके जो कुछ बचे उसका समच्य करना वबुद्धिमानों का काम 
है। जो लोग अपनी अवस्था पर ध्यान नहीं रखते, और यह 
नहीं समझते कि कौन खर्च आवश्यक है और कौन अनाव- 
श्यक*, उनसे जहाँ तक होगा क़ज़े ही करेंगे, पर अपनी आय में 
से छुछ बचा न सकेगे। सम्बय न करना जैसा अज्ुचित या अघमे 
है बेसा ही अपनी आत्मा को तथा अपने परिवार को विशेष 
कष्ट देकर अतिसश्चय करना भी अकतेन्य और अधघरमे है । 
समाज जो आजकल इतनी बड़ी दुदेशा में पढ़ा हुआ हे, 
उसका कारण धन का अभाव नहीं; उसका कारण तो धन का 
अपव्यय-सात्र है । धन का उपाजेन करना उतना कठिन नहीं' 
है जितना कठिन उसका समद्बय करना है। इसलिए पहले यह 
सीखो कि घन का सब्बय किस तरह करना चाहिए, धन 


५१७ लेखलतिका 


ि्जिज्जिज जज ली जी सी जज जज 





हल 





सम्बय करने का कया उपाय है? धनवत्ता उपाजस के ऊपर 
निर्भर नहीं है । कोई कितना ही धन प्राप्त करे उससे उसकी 
धनिकता व्यक्त नहीं होती। घनिकता खंचे और सदच्व्य के 
द्वारा ही जानी जाती है | खचे करके जो कुछ सद्भय किया 
ज्ञावा है यथार्थ में वही धन है । अपने और अपने पोष्य-वर्गे 
के आवश्यक ख्े के लिए जिवसे घन का प्रयोजन है उतने से 
अधिक जपाजेन करके जो लोग कुछ सद्य करते हैं, वे नि:संदेह: 
समाज की उन्नति के हेतु-स्वरूप है | सत्जय की मात्रा अत्यल्प 
ही क्‍यों न हो, किन्तु उनका स्वाधीन-चेता और आत्मनिर्मर 
बनाने के हेतु वही यथेष्ट है। पहले की अपेक्षा इन दिलों क्रेय 
वस्तुओं का मूल्य चहुत बढ़ गया है। यह सच है कि जो चीज 
पहले एक रुपये की मिलती थी बह अब दो रुपये देने से भी 
नहीं मिलती | और आमदनी में ताहुश वृद्धि हुई नहीं है। 
चीज़ महंगी होने से रुपये का ख़चे वढ़ गया है. सही, किन्तु 
जिनकी जो आय है. उसमें से यदि नित्य प्रयोजनीय चस्तुएँ 
ही खरीदी जाये, ओर फ़िजल कामों में एक पेसा भी खर्च न 
किया जाय तो प्रत्येक गृहस्थ छुछ-न-कुछ सम्बय जरूर कर 
सकता है । जो लोग सद्बय नहीं कर सकते उन्‍हें समभमना, 
चाहिए कि ऐसा कोई कारण जरूर है जिससे प्रयोजन के 
अतिरिक्त भी ख्च हो ज्ञाता' है। खोज करने से पता लग 
सकता है कि विज्ञास-प्रियता की, या अपनी अवस्था से 
बढ़कर आराम की चीज़ें लेने था भोजनादि में निय्माधिक 
खर्च होने अथवा नामबरी के लिए अधिक खर्च करने के सबब 
कुछ बचने नहीं पाता। किंवा, इस तरह का कोई ओर ही 
कारण संचय में व्याधघात* पहुँचा रहा हैं । इन असंचयशील 

अपव्ययी लोगों की संझ्या बढ़ने से समाज दिन-दिन दुर्बल 
ओर दरिद्र होता जाता है। यह सभी लोग चाहते हैं. कि 


विश्ञाम श्श्श 


हमारी उन्नति हो ओर हम आराम से रहें किंतु इसके लिए 
उन्नति करने का ज्ञान होना चाहिए | जो लोग अपनी अवस्था 
को उन्नत कर उसका उचित उपयोग करते हैं वे केवल अपना ही 
नहीं प्रत्युत सारे समाज का सिर उन्नत करते हैं।अतएव 
हर एक आदमी को मिहनती, अजनेशील,* संचयी और 
कतेब्यनिप्र* होना चाहिए | 


अअन्‍न्‍ध्ककन+कजलश रकम, >ज+>नममन 


विश्राम ५ 


( श्री आनन्दकुमार ) 


स्वास्थ्य के लिए आहार, व्यायाम आदि के समान विश्राम 
की आवश्यकता होदी है क्‍योंकि उसी के द्वारा शरीर की खोई 
हुई शक्ति पुनः वापस मिलती है और शरीर-यंत्र ज़जर नहीं 
होने पाता | सानसिक और शारीरिक परिश्रम में मांस-पेशियों 
तथा चाड़ियों पर जो कार्य-भार पड़ता है उसको हल्का करने 
का साधन विश्राम ही है । विश्वास से स्नायु-मण्डल सशक्त होता 
है, शरीर, मन दोनों स्वस्थ होकर जीवन-संघर्ष के लिए पुनः 
समथ हो जाते हैं और धातु-तन्तुओं की ज्षति-पूर्ति* होती है। 
इसलिए परिश्रम के बाद . विश्राम करना भी आवश्यक है और 
विश्राम ऐसा करता चाहिए जिससे तन-मन दोनों को पूर्ण 
शान्ति सिले क्‍योंकि यही उसकी उपयोगिता है | 

मानसिक विश्राम तो चहुत-कुछ विपय-परिवर्तेत और 
खी-बच्चों तथा मित्रों के साथ हास्य-विनोद करने से दो जाता 
है। हँसने से सी सन का विश्राम होता है क्‍योंकि हँसी से रक्त 
का प्रसार बढ़ता है, रक्त की गति तीत्र होती है और मुख्यतः 
मस्तिष्क का अवरुद्ध* रक्त ठीक से प्रवाहित द्वोवा ह। उससे 


जल -नकरीजनीजनमा जीबी लीड अल जी जय 


११६ लेखलतिका 





फेफड़े खुलवे है और एक-एक नस से दूषित वायु बाहर निर्क्ल 
आती है। इससे मन को शान्ति होती है। बहुत-सी चिन्ताएँ 
हँसी की हवा में उड़ जाती हैं। किसी भी प्रकार के मनोर॑जन 
से मन की विश्राम मिल जाता है। 

पूर्ण बिश्ञाम का प्रधान साधन निद्रा है। स्वाभाविक मान- 
सिक तथा शारीरिक शान्ति पूर्ण मात्रा में उसीसे मिलती है। 
इसलिए उचित मात्रा में प्रमाढ निद्रा शरीर के लिए. सबसे 
प्रमुख 'ढॉनिक/* होती है। निद्रा के सम्बन्ध में विशेष रूप से 
कुछु जान लेना आवश्यक है । 

सिश्चित ससय पर स्वासाविक निद्रा ही स्वास्थ्यन्प्नद 
होती है.। उसको प्राप्त करने के लिए सुंदर पलंग आर चिछोने 
की डतली आवश्यकता नहीं होती, जितनी स्वाभाविक आहार 
ओर परिश्रस की । पांचन-क्रिया ठीक रखने से और दिन में 
कुछ शारीरिक परिश्रम करने से राव में अच्छी नींद अत्ती हे । 

यींद एक शापरीरिक क्रिया नहीं, मुख्यतः मानसिक 
क्रिया है । मस्तिष्क को हलका करने से ही नींद आती है। सन 
में चिन्ता रहने से चह दूर मभागती 'है। इसलिए लेटने पर 
किसी ऐसे कार्य की चिन्ता न करनी चाहिए, जिसके सुलमासे 
म॑ मन को विचार करना पड़े | किसी पुराने विषय को सोचिए-“ 
ऐसे विषय को सोचिए, जिसमें आपको सफलता मिल छुकी 
हो। किसी मधुर-स्टृति* में मन को लगाइये | उससे यदद्‌ होगा 
दि मनको चिन्तन ते करना पड़ेगा, बह सुलमी-सुलराई बातें 
छा रस केया और जानी-बूमी गलियों ही में घृमेगा | उस पर 
नये विचारों का दवाव न पढ़ेगा और वह रसन्मग्न होकर से 
जञायगा | मनोवैज्ञानिकों ने निद्रा का यही प्रेष्ट उपाय बताया है 
दूसरा उपाय है सोने के पहले कोई मनोरंजक उपन्यास 


कहानी था काज्य पढ़ना अथवा स्वजनों से ओ्रेसालाप करना 





हे 


विश्राम ११७ 


ली डी जडीड 


न्ल्लििखि जल ली नी जज जी जज जीजीजी जज 5: 


इससे मन किसी गंभीर चिन्ता में न फँसेगा। आयुर्वेद के 
प्राचीन परिडतों का कहना है कि इन्द्रियों से मन को हटा लेने 
से ही नींद आती है। को " 

वैज्ञानिकों ने अनिद्रा के कारण और उनके व्रिंचरण"' 
के कुछ अच्छे उपाय बताये हैं। अनिद्रा एक भयंकर रोग है । 
यदि इसका शीघ्रातिशीघत्र निवारण” न किया जाय तो शरीर 
ओर मस्तिष्क दोनों अस्वस्थ हो जाते हैं तथा वाद में यह किसी 
भी उपचार से ठीक नहीं हो सकता। आत्मघातियों में अनिद्रा- 
पीड़ित व्यक्तियों की संख्या काफ़ी दोती है। यह रोग प्रायः 
बुद्धि-सम्बन्धी काम करने वालों को तथा व्यवसायियों* को ही 
होता है । 

अधिक सानसिक परिश्रम और चिन्ता से ही अनिद्रा रोग 
होता है । इसका रहस्य यह है । साधारण निद्रा की 
अवस्था में मस्तिष्क के रक्त का अधिक भाग वहाँ से मिकल 
आता है और रक्त-वाहिनी नसों का संफोचन होता है | परन्तु 
जाग्ृत-अवस्था में और मुख्यतः: विचार करते समय मस्तिष्क 
की नसों में रक्त प्रचुर मात्रा में रहता हे, इसलिए उनका फेलाव 
होता है । दोनों अवस्थाओं के ये कार्य प्राकृतिक हैं| मस्तिष्क से 
जब रक्त निकल जाता हैं और नसें संकुचित होती हैं. तभी नींद 
आती है| अधिक चिन्ता, रात्रि-जागरण और अनवरत 
परिश्रम से रक्त मस्तिष्क में निरन्तर भरा रहता है और 
परिणाम यह होता है कि नसें फैल कर ढीली हो जाती हैं तथा 
उनका स्वाभाविक संकोचन नहीं हो पाता। ऐसी दशा में वे 
रक्त को मस्तिष्क से बाहर निकालने में असमथ हो 
जाती हैं और रक्त की उष्णता के कारण नींद नहीं आती । यदि 
शीघ्र सावधानी न की जाय तो स्नायु-मएडल अशक्त बना रहता 
हे और आये उसको ठीक नहीं किया ज्ञा सकता | मूर्खो ओर ._ 





दस 





है 


श्श्द लेखलतिका 








तप >> 3 4. 


दरिद्रों को यह रोग नहीं होता क्योंकि वे बुद्धि पर ज़ोर डालने 
वाला कोई कार्य नहीं करते । मूल जब चाहे तब सो लेता है 
क्योंकि विचार न करने के कारण उसका मस्तिष्क रक्त से सदेध 
रिक्त रहंता है । उसको सोने की ही बीमारी हो जाती है क्योंकि 
मस्तिष्क की नसें संकुचित ही रहती हैं । 

अनिद्रा में अधिक-से-अधिक विश्राम लेना ही हितकर होता 
है । निश्चिन्तता से नसें पुनः स्वाभाविक कारये करने लगती हैं । 
समुद्र की हवा इस रोग में जादू का-सा काम करती है । दिन 
में सोना, स्तच्छृतम वायु का सेवन, घर से बाहर रहना, 
व्यायाम करना ये सब इसमें चहुत लाभ करते हैं ।लेटने के 
पूवे कोई गरम पेय, मुख्यत्तः दूध, पीने से गरमी पाकर मस्तिष्क 
का रक्त वहाँ से नीचे उतर आता है | सोने के पूषें और जब 
ज्गे तब गरम दूध पीना बहुत गुण करता है | गरम दूध पीकर 
थोड़ी देर गरम पानी में पेर रखने से मस्तिष्क का रक्त-प्रसार 
कम हो जाता है और नींद आ जाती है। 

जिस तरह भी दो सके प्राकृतिक और पर्याप्त विश्राम लेना 
स्वास्थ्य के लिए परम आवश्यक है | अच्छी नींद के बाद थोड़े 
समय में भी दूना काम होता है | नींद न आने से दूने समय में 
भी आधा काम होता है | 





सास और ननद ११६ 


लीजजज््ििज जज जलजज जी जी जा जा जज जज जल जज जी जब जलती जिज जि जल जिन जज जी लॉ जीली जी ली नल जज ड़ ज ध ह 


सास और ननद 


( श्रीमती राजकुमारी बिन्दल ) 


भारतवर्ष में, विशेषकर हिन्दू समाज में, अन्य देशों की 
अपेक्षा शादी का बंधन ज्यादा ृढ़ और पवित्र समझा जाता 
है | हिन्दुओ- में विवाह सखी ओर पुरुष दोनों को पाणिग्रहण 
संस्कार के ज्षण से मृत्यु तक पारस्परिक बंधन में अविच्छेद 
रूप से आवद्ध कर देता है। हिन्दू नारी के लिए पति तथा 
उसके गृह-संबंधी पूरे जीवन-काल के लिए अपने वन जाते हैं । 
तथा उनकी तन-मन-धन से सेवा करना उसका मुख्य कर्तव्य 
हो जाता है । 

विवाह के पश्चात्‌ अन्य देशों में नव-दम्पति अधिकतर 
अपने परिवार से प्रथक्‌ होकर ही जीवन व्यतीत करते हैं। 
लेकिन हमारे देश में संयुक्त परिवार की परिपाटी#* परम्परा से 
चली आ रही है | विवाह के बाद पति तो नारी का निकटतम 
स्नेही होता ही है, इसके अतिरिक्त, जैसा कि पहले कहा जा 
चुका है, पति के. माता-पिता, भाई-बहिनों तथा अन्य संबन्धियों 
के संपर्क में भी वह निरन्तर रहती है और उनसे भी उसका 
रक्त का-सा ही घनिष्ठ संवनन्‍्ध माना जाता है । 


सास और ननद के झगड़े ओर उनके प्रतिवन्धों के बारे में 
बहुत कुछ कहा-सुना जाता है। नारी स्वातंत्य के इस युय में 
नारी के ऊपर जबरन जल्ञादे गए पत्तिकृत बन्धनों को ढीलां 
करने की बहुत कुछ बातें होती हैं | सास और ननद द्वारा 
उपस्थित किये गए बन्धन कुछ कम त्रासदायक नहीं होते | बंधन 
आवश्यक तो होते ही हैं परन्तु उत्तको पारस्परिक्त तो होना 
ही चाहिए, और साथ-साथ उन्हें खुविधापूरें भी होना चाहिए । 


१२० लेखलतिका 
प्राचीन काल अथबा चेदिक काल में सास-बहू का संबंध 
ठीक माता और पुत्री के संबंध के समान ही होता था | वधू 
सास को माता के समान ही आदरणीय और अपना शुभ- 
चिंतक सममकर उसके आदर्शों पर चलना ही अपना कतेव्य 
सममती थी | इसके अतिरिक्त सास भी वधू को अपनी पुत्री 
से अधिक समझकर उससे प्रेमपूर्ण व्यवहार करती थी; उसको 
धर्म-उपदेश देती थी तथा बड़ों की सेवा करने का महत्व तथा 
रीति बताकर उसको कभी भी सन्‍्मागे से विचलित न होने 
देती थी।सास कौोशल्या जी के धर्मे-डपदेशों के कारण ही 
राम-पत्नी श्री सीताजी अनेक कठिन अचसर पड़ने पर भी 
पतिब्रत धर्म के पालन करने में अपना नाम संसार में अमर 
कर गई | सास द्वारा दिये गए सदपदेशों के अनेक उदाहरण 
हमारे प्राचीन साहित्य में पाये जाते हैं| चक्र-व्यूह-रचना के 
समय उसके ज्ञाता अजन के बहां उपस्थित न होने के कारण 
अजन-पुत्र अभिमन्यु, जो १६ वर्ष का निरा बालक था, लड़ाई 
में जाने के लिए प्रस्तुत हुआ | उसकी नव-वध्‌ उत्तरा पति को 
युद्ध में जाते देख पत्तिप्रेम से व्याकुल होकर उसको युद्ध में जाने 
से विचलित करने लगी । उस समय उसकी सास सुभद्रा के 
धर्मपदेशों से प्रभावित होकर द्वी उत्तरा ने अभिमन्यु को बीर- 
पत्नी के अनुरूप उत्साह से सुसल्लित कर रणभूमि में भेजा 
था| रामायण ओर महाभारत में महाकार्य के काल के इसी 

प्रकार के अनेक रदाहरण मिलते है । 
ध्यकाल में भारतवर्ष का राजनैतिक व सामाजिक पतन और 

यबनों का प्रवेश होने के कारग परदे-जेंसी बहुत-सी कुप्रथाएँ 

चलित हो गई | इसका मल कार्ग तो हिन्द अबलाशों 
की यबनों के अत्याचारों से संरक्षित रखना दी था। परन्तु 
परदे के कारगा भारतीय नारी घर की चहार-दीवबारी में बन्द 


सास और ननद १२१ 


हहजजीडजीजज लजीललीजजीलजी नल ऑल जी जज _ै ऊऊीैीज ४ ४ल बल जी 3 





अजीज जल जी जज जी जल नी पीजी जा + 


हो गई और उसकी स्वतंत्रता और साथ-साथ उसके सभी 
अन्य गुणों का हास* होता चला गया। भारत की नारी जो 
साहस, शिक्षा तथा गुणों की भंडार थी, वही नारी कायरता, 
अशिक्षा इत्यादि के गते में गिरती चली गई । 
पुत्र-बधू जिसे पुत्री के समान सममका जाता था, उसी को 
सास अब अपनी निरी दासी तथा पेरों की जूती समझने लगी। 
धर्म-डपदेशों तथा उसके हित की बातों की अपेक्षा उस पर 
गाली-गलौच तथा कट्ठ-बाक्यों की बौछार करना ही वह अपना 
करततेज्य समझने लगी । घर में पुत्र-बधू के प्रवेश करते ही सास 
ओर ननद को गृह के सब कार्यों से छुटकारा मिल गया; बस 
केबल बहू को आज्ञा देना और उसके काम में नुकताचीनी 
करना ही वे अपना अधिकार समभने लगीं। सास तथा बहुओं 
में बेमनस्य तथा ईष्या-द्वेष बढ़ने ल्गा। दहेज की प्रथा भी 
इसके अनेक कारणों में मुख्य -थी। यदि बहू सास की इच्छा 
के अनुसार दहेज न लाई, तो उसको नाना प्रकार से सताया 
जाने लगा | यदि वह कोई वस्तु किसी कारण से पिता के घर 
से न ल्ञाई तो उसको उससे वंचित रकक्‍खा जाने लगा, चाहे वह 
वस्तु कितनी ही आवश्यक क्‍यों न हो। लड़की का पिता चाहे 
अपना सवेस्व॒ ही क्यों न दे दे, लेकिन फिर भी दहेज में नुकता- 
चीनी करता अब अनिवाय-सा* हो गया है। वहुओं पर भी 
इसका प्रभाव अच्छा नहीं पड़ता | वे भी सास को आदरणीय 
न समककर उलटी-सीधी सुनाने सें नहीं चूकतीं। यदि वहू 
अमीर घराने की होती है तो वह भी घर के प्रत्येक मनुप्य से 
खुशासद कराना चाहती है। यदि पति कमाऊ होता हैं तो बहुएँ 
भी सब को अपना दास वनाकर रखना चाहती हैं । वे ननद- 
देवरों के साथ अवसर मिलने पर बुरा व्यवहार करती हैं | इस 
का उन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे भी अपनी भाभी के साथ 


श्श्र्‌ लेखलतिका 


अपनी माता की तरह ईष्या-हेप का-सा व्यवहार करने लगते हें। 
वे अपनी भाभी के पीछे खुफ़िया पुलिस की तरह लगे रहते हें 
आर हर तरह की डउलटी-सीघी सूचना माता को देते रहते हैं 
ओर इस ग्रकार से वह अपने जीवन में शिक्षा, खेल, कूद, 
सभ्यता आदि की अपेक्षा, इेष्या, हेप, लड़ाई इत्यादि के दूषित 
वातावरण में रहने के कारण अपने भावी जीवन को उद्नति- 
शील बनाने में असफल हो जाते हैं | घर में चौबीसों घंटो कलह 
मची रहती है ।सास, जो पुत्र-जन्म से ही बहू के आने की आशा 
लगाये रहती है, तथा वधू जो सुसराल में चहुत-से अरमान लेकर 
श्राती है, दोनों ही इस कलह के कारण अपनी इच्छा को पूर्ण 
करने में असम हो जाती हैं । 
यद्यपि इस कलह के वहत-से कारण होते हैं, लेकिन विशेष 
कारण उचित शिक्षा का अभाव ही है। ग्रह में प्रायः सास 
अशिक्षित तथा पुराने ढर्रे की होती है। बधुएँ भी अध-शिक्षित 
या तथाकथित नई रोशनी की होती हैं । आधुनिक वातावरण में 
रहने के कारण उनके अंदर नये भाव होते है, जो प्राचीन रूढ़ि- 
बाद के चिरुद्ध होते हैं। विशेषकर धार्मिक सिद्धान्त, परदा-प्रथा 
रूंदियाद तथा छुआदूत इत्यादि विपयों में बधुओं के विचार 
अपनी सास से भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए वह अपने 
ससुर, जेठ आदि को अपना आदरणीय समम कर ओर उनमें 
पुरी मबांदा रखते हुए अवसर पड़ने पर उनसे बोलने में ज़रा 
भी दाप नहीं समझती; लेकिन सास इसको बड़ा भारी अनर्थ 
समझ कर बहू को लज्ञाहीन, बेदया आदि अपशब्दों से प्रताड़ित 
करने में जरा भी संकोच नहीं करती । इसी प्रकार थम के नाम 
प्रचलित आईंबरों तथा समाज की उन्नति में बाधक 'और 
नारी-दित में द्वानिकारक बालों में क्कीर की फ्कीर बनने से 
77 इसफार ऋर देसी #। इस पर सास अन्य बद्ठओं के 


सास और ननद १२३ 


उद्गाहरण देकर उन्हें नाता प्रकार से लज्जित करती है। ये ही 
जरा-जरा-सी बातें कलह का कारण बन जाती हैं । 
आज प्रत्येक घर में सास-बहू और ननद-माभी के कलह 
की समस्या बहुत जटिल द्वोती जा रही है। जिस घर में सास- 
बहू प्रेमपू्वेक रहती हों, उसे तो स्वर्ग के समान सुखी और 
समृद्धि-पूर्यं/ समझना चाहिए। घरेलू समस्याओं में सास-बहू 
तथा ननद-भोजाई के कलह की समस्या ही सबसे बढ़कर होती 
है । यहाँ इसी समस्या पर विचार करना अभीष्ट* है। 
ताली कभी एक हाथ से नहीं चजती”, यह्‌ कथन पूर्णतया 
सत्य है। झगड़ा दोनों ही तरफ़ से होता है। एक ही को दोपी 
ठहूरा कर सारा दोष उसी पर लगाना वुद्धिमानी नहीं है । 
सास-बहू के संवन्ध में यह स्चेथा अभीष्र है कि सास को बहू 
अपनी माता से भी अधिक पूज्य और आदरणीय समझे। 
अपने बड़ों की सेवा करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना 
हमारा कतेज्य है। प्रत्येक वधू को अपने विचारों के साथ 
अपनी अलुभवीं सास के रूढ़िगत पुरूता भावों और विचारों 
का भी ध्यान रखना ही चाहिए। उनके साथ नम्रतापूर्वक 
व्यवहार करना चाहिए। उनकी कसी निंदा न करनी चाहिए | 
' उनको अपने विचारों के अतुसार चलाने के लिए उनसे नम्नता 
तथा सोठी वाणी के साथ ऐसे ढंग से व्यवहार करना चाहिए 
जो सास को अप्रिय न लगे और विशेष असमंजस प्रतीत न 
हो । बाणी तो ऐसी वोलनी चाहिए मानो शबंत घोल रखा हो | 
वशीकरण इक मंत्र हें परिहर वचत कठोर!। जिस प्रकार 
मीठी वाणी बोलनेवाला व्यवसायी और सेवक कृतकाये हो 
जाता है इसी म्कार सीठी वाणी वोलनेवाली बहू सब की प्रिय 
हो जाती है. तथा कटठ-से-ऋटु संबन्धी को भी अपना कर लेती 
 हैं। अपनी सीठी वाणी से वह सास की अनिच्छा होते हुए भी 








“ लेखक-परिचय 


>> की 3 32293 240 >> >> आल >> लीक औद 2 25 की लत मन कल कक है. 


लेखक-परिचय 

» श्री प० बालकृष्ण भट्ट (१८४४-१९१४) 

पं० बालकफ़ृष्ण भट्ट का जन्म प्रयाग में सन्‌ १८४४ में हुआ और 
झत्यु १६१४ में । आपकी माता बड़ी बिदुपी थी, इससे श्रापकी 
शिक्षा का प्रारम्भ घर पर ही संस्कृत से हुआ । कुछ दिन श्राप सिशन 
स्कृज्ञ में भी पढ़े, पर ईसाई देडमास्टर से धरसम्बन्धी बातों पर कुछ 
अनबन हो जाने से वह स्कूल थ्रापको छोड़ना पढ़ा। छुछ दिन आपने 
जमुना स्कूल में नौकरी की पर वहाँ भी धार्मिक सतभेद के कारण 
झधिक समय तक न ठहर सके । कुछ समय व्यापार में भी लगाया 
पर थनन्‍त को साहित्य-सेंत्रा दी श्रापकी प्रकृति के अनुकूल पढ़ी । 
६८७७ में प्रयाग की 'हिन्दी-प्रवद्धिनी सभा? ने 'हिन्दी-प्रदीप! नामक 
पत्र निकाला और भद्दध जी उसके प्रथम सम्पादक बने । वहीं से आ्रापका 
साहित्यिक जोचन प्रारम्भ हुआ। पीछे आप “कायस्थ संसक्ृत पाठशाला 
कालेज? में संस्कृत के अध्यापक नियुक्त हुए 

आप तीस-वत्तीस वर्ष तक लगातार प्रदीप” में लिखते रहे। 
आपकी शेली विशेष रुचिकर है। उसमें कहावतों और मुद्दाविरों का 
सुन्दर प्रयोग हुआ है। अंग्रेज़ो और उदू' के शब्द भी कहीं-कहीं 
बरते गये हें। पुराने निवन्धकारों ओर गद्य-लेखकों सें आपको प्रतिष्ठित 
स्थान उपलब्ध है। भारतेन्दु दरिश्वन्द्र जी कहा करते थे कि “बस, 
हमारे वाद भद्दय जी ही हैं?। श्री पं० रामचन्द्र शुरू जी के अनुसार 
हिन्दी-गद्य में भट्ट जी का वही स्थान है जो श्रंग्रेजी-गद्य में एडीरून 
या स्टील का है। 

अनेक निबन्धों के अतिरिक्त ग्रापके निश्नलिझख्ित अन्य प्रकाशित हो 
घुके दू---विकट खेल”, 'वाल-विवाह! (नाटक), सो चजान एक सुजान 
नूतन प्रद्मचारी?, 'शिदादान', दुमयन्ती-स्व॒यंचर', 'मइ-निबन्धावल्धी! 
साहित्य-सुमन'” झादि-पआादि । 


न्‍सऋ+०५७०७ ० माकक. 


१३० लेखलतिका 


न्ज्जीजजिन + जज ऑलजजडजि जज ै +++_ | ज >> ज॑++ + ७ + जज ऊना ॑+ 


श्री मोहनदास कर्मचन्द गाँधी (१८६९-१९४८) 

स्वनामघन्य श्री सोहनदास कर्मचन्दु गाँधी का जन्म २ अक्तूबर, 
सन्‌ १८६६ में काठियावाह के पोरबन्दर ( प्राचीन नास सुदामापुरी ) 
में एक प्रतिष्ठित वैश्य घराने में हुआ। श्रापके पिता श्री कर्मचन्द 
तथा पितामह श्री उत्तमचन्द्र गाँधी वहाँ के दीवान थे। श्रापकी 
माता अस्यन्त घार्मिक चूक्ति की थीं | कहते हैँ कि घ्त, उपवास, 
अद्धिसा तथा सत्य की दृढ़ निष्ठा के पुनीत भाव आपको माता के 
दुग्ध से हीं प्राप्त हुए थे । 

आपकी प्रारस्मिक शिक्ठछा पोरबन्दर में हुई । पीछे राजकोट में 
आकर श्रापने सिदल की शिक्षा पाई | १७ वर्ष की आयु में आपने 
मेंद्रिक किया और , तभी आपका विवाह भी हो गया। $८ वर्ष की 
आयु में श्रापके पिता जी का देहान्त द्वों गया। सन्‌ १८८८ से श्राप 
पेरिस्टरी के लिए कन्दन गये शओ्रौर १८६५ में ब्ेरिस्टर बनकर 
बंबई दाइकोर्ट में प्रेज्टिस करने लगे पीछे सन्‌ १८६३ में एफ 
मुकदमे के सम्यन्ध में श्राप दक्षिण अफ्रीका गये। बहाँ भारतीयों की 

दशा देग्यकर श्राप बहुत खिनन हुए औ्रौर उसी की प्रतिक्रिया के रूप 

में देश-सेया की घोर प्रवृत्त हुए । इस दिशा में प्रापने जो-जो दुष्कर 
कार्य किये श्रौर शिस प्रकार कठिन तपस्या, छझ सस्यनिष्ठा श्रौर शान्त 
सरयाग्रट कि द्वारा प्पने का उदार किया, वह सर्वत्रिेदित है। 
हुसी के पलस्थरूप श्राप संद्ारमा गाँघी, राष्ट्रपिता” अबचा वापू! 
के मास से विध्यान हुए । 

सादिस्‍्य के क्षेत्र मे--प्रिशेषतया दिन्दी के प्रयार लथ सुधार के 
कगय में--भी ख्ापकी देन अमुस्य है। आप एक कुशख लेगक तथा 
मिर्भीझ बच्तछा थे । दिन्‍्द्री में आपने कई पत्र चताये। हनके अरिरिशः 
अप चबारोग-दिग्दर्गगा, च्रास्मश्या' ध्रादि शनेछ अन्य भी 
प्रशाशित हो पुझे ६ 


|] 


झग्ल मे घडढा भाजविशाय दी गोली से अधदिंता को कयगार, 





लेखक-परिचय १३१ 


५८ 


की जज ली जी निजी जज डील जीज जी जज 











आमजन 


भारत का बापू, भर संसार का महापुरुष, ३० जनवरी सन्‌ १६४८ को 
सायंकाल ६-४० पर राम-रास का उच्चारण करता हुआ घमरत्व 
को प्राप्त हुआ । 


श्री पं० महावीरप्रसाद डिवेदी (१८७१-१९३९) 

हिन्दी के महान्‌ आचाय पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी जी का जन्म 
रायबरेली जिला के दोलतपुर नामक आम में सन्‌ १८७१ (चैशाख 
शुक्क ४ सं० १६२७) में हुआ और खझत्यु १६४३६ (पौंप कृष्ण ३० 
सं० १६६९) सें । श्रापकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं के देहाती स्कूल में 
हुई । बाद सें श्राप रायबरेली के हाई-स्कूल में पढ़ते रहे। उद्‌', फ़ारसी 
भौर प्ंग्रेज़ी आपने इसी स्कूल में पढ़ी थी । उन दिनों स्कूलों में संस्कृत 
की पढ़ाई का कोई प्रबन्ध न होता था । आपकी संस्कृत की शिक्षा का 
प्रवन्ध आपके चाचा पं० दुर्गाध्सादु ने किया था। पीछे आप अपने 
पिता के साथ बंबई चले गए और सराठी, तथा शुज्राती भाषाओं का 
अध्ययन आपने वहीं पर किया । इसके बाद श्राप जो. अआाईं. पी. 
रेलवे में नॉकर दोकर तार-यावू बने | कुछ ही दिनों बाद उन्नति करके 
श्राप तार के इन्स्पेक्टर बन कर मसांसी श्रामाण और क्रमशः हैढ- 
वेक्िआरफ़-इन्स्पेक्टर और फिर डिस्ट्रिक्ट-सुपरिण्टेए्डेण्ट के चीफ़ छा 
बने । बाद में कुछ अश्रनवन के कारण आपने नौकरी छोड कर साहिस्य- 
सेवा का चत लिया । 

सन्‌ १६०३ में आप 'सरस्वती' के सम्पादक नियुक्त हुए श्ौर 
क्गसग बीस दर्ष तक इसी पद पर आज रहे । हस काछ में भाप 
ने जहां हिन्दी-गय की काया पलट की, वहां दौसियों नये-नये ज्लेखकों 
झोर कवियों को भी प्रोत्साहित करके जनता के सामने पेश किया। राष्ट्रीय 
कवि श्री डा. सेथिलीशरण गुप्त प्ौर श्री अयोध्यासिह ऊी उपाध्याय 
आपके ही संपर्क की कृतियां हैं। साहित्व-छेन्र में द्विनेदी ली के चार 
महान्‌ कार्य गिने जाते हँ--(१) सापा ठघा गद्यशेक्षी का 


१३२ लेखलतिका 


शीर संशोधन, (२) नये-नये जिपयों पर हिन्दी में नियन्ध लिखकर 
साहित्य को पुष्टि, (३) श्राज्नोचना का परिष्कार और (४) हिन्दी कविता 
में खदीयोली का समावेश श्रीौर समथेन करके हिन्दी-पथ्च का नूतन 
संस्कार । 

गयलेखक के साथन्साथ आप सुलमे हुए कब्रि और प्रोढ़ समा- 
लोचक भी थे । भाषा के सम्बन्ध में द्विवेदी जी का यह सिद्धान्त था 

हिन्दी में उदू , फ्रारसी, मराठों आदि सभी भापाशों के शब्द 
ले लेने घादिएं । केवल संस्कृत से काम ने चलेगा । “यदि तुम सत्र 
पराये शब्दों को मिकाल दोगे तो द्विन्दी में 'कफ़न! तक का टोटा है 
जायगा श्र हिन्दी कदापि समृद्धिशालिनी न बन सकेगी! 

आपने विविध विपयों पर क्षाभग चालीस पुस्तक लिखी 
आप हिन्दी के दतहास में शसप्रददक! साने जाते 





लेखक-परिचय १३३ 


हु शील्ड अलनन जलडजऔटिजओज लज जज >++- ग्ु हलजजलडनजनीजज जन जज 


महाराज के प्राइवेट दुफ़्तर में काय करते रहे । परन्तु यहां से भी 
शीघ्र ही लौट आये | १६१० में आपने चनारस में हिन्दी-साहिध्य- 
सम्मेलन” के प्रथम अधिवेशन की आ्रायोजना की । १६१३ में आप 
कालीचरण हाई स्कूल, लखनऊ के /हैडमास्टर बने । १६२१ में आप 
फिर हिन्दू यूनिवर्सिदी, बनारस में हिन्दी-विभाग के श्रध्यक्ष बनकर 
लॉट आये और १६३१ तक वहीं कार्य करते रहे । 

सरकार की-ओर से आपको पहले 'रायसाहव” और फिर 'राय- 
बहादुर! की पदवो मिली । हिन्दू यूनिवर्सिटी ने आपको डी. लिदू की 
ऑनरेरी डिग्री प्रदान की और अखिल भारतीय हिन्दी-साहित्य 
सम्मेद़्न की शोर से आपको 'साहित्यवाचस्पति! की गौरवमयी 
उपाधि से सम्मानित किया गया। रे 

डा. श्यामसुन्द्रदास का नाम काशी-नागरी-श्रचारिणी-सभा के 
जन्मदाताओओं सें गिना जाता है। कद्दते हें कि जब आप श€्वीं ध्रणो में 
पढ़ा करते थे, तभी आपने अपने अन्य साथी छात्रों के साथ मिलकर--- 
जिनमें €वीं श्रेणी के छात्र भी सम्मिलित थे--इस सभा की स्थापना 
की थी और £) मासिक चंदा लिखवाकर स्वयं इस सभा के सदस्य 
बने थे। इस सभा ने हिन्दी और नागरी के उत्थान में जो महान 
कार्य किया है, उसमें आपका यथेण्ट सहयोग हे । प्राचीन इस्तलिखित 
पुस्तकों की खोज की आयोजना, तथा उनकी ८-& चर्प तक की पूरी 
रिपोर्स का सम्पादन तथा प्रकाशन और “हिन्दी-शब्द-सागर”ः का 
सम्पादन ये आपके दो यड़े महान्‌ कार्य हैं जिन्होंने हिन्दी-साहित्य 
के छिपे अन्थ-भण्डार को प्रकाश में लाकर साहित्यिकों श्लोर लेखकों 
के लिए प्रास्नाणिक सामग्री प्रस्तुत करके मातृभाषा की पध्रसीम सेदा 
की है। आपको सभा का “बोद्धिक केन्द्र' कहा जाता दें । 

आपने गम्भीर और शास्त्रीय विषयों पर अनेक प्रन्थ छिखे है 
जो ऊंची कछाओं के द्वात्नों तथा गवेपणा में लगे हुए विद्वानों के किए 

कप हे 2 28 2 | 

यहुत उपयोगी दे। झापकी सापा की विशेषता सह है कि 


श्श्ध लेखलतिका 
श्री ६० चन्द्रधर गुलेरी (१८८३-१९२१) 
शुक्षेरी जी का जन्म अयपुर सें एक विख्यात परणिडत घराने में 
जून सन्‌ १८८३ ( २९ आपाढ़ सं० १६४० ) को हुआ और परलोक- 
बाख १६२१ में | आप पंजाब के मूल-निवासी थे। आपके पिता 
प॑, शिवराम जी पंजाब के कड़ा जिले के गुलेर नामक एक छोरे से 
रजवाड़े से जयपुर में झा बसे थे । आपके सहोदर श्री पं० जगद्धर जी गुलेरी 
लायलपुर पद्मोकत्चर कालेज में अध्यापक थे और अभो दण्ल में ही 
( पंजाब-विभाजन के बाद ) सर्विस से रिटायर हुए हैं । 
गुलेरी जी जहाँ संस्कृत के प्रगाढ़ विद्वान थे, वहाँ अंग्रेज़ी को अष्य 
शिक्षा से भी संपन्न थे। आप १८६३ में महाराजा कालेज जअग्रपुर में 
भरती हुए | १६०३ में आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से सर्वत्रथम रहकर 
थी, ४. पास किया । तदुपरान्त आप मेयो कालेज, अजमेर में अध्यापक 
नियुक्त हुए। वहाँ से आप हिन्दू यूनिवर्सिटी बनारस में ओरियंटल 
कालेज के पिंसिएल यनकर काशी चले गये और अन्त तक वहीं सहे । 
गुलेरी जी जैसे धुरंधर विद्वान थे, वेसे ही सरल और बिनोद- 
शीत ये । आपकी लेखभ-शेली अद्भुत थी | उसमें पाणिडिव्यपूर्ण विवेचन, 
सूचम सूऋ, अर्थरार्सित्त ब्यंग्य तथा एक प्रकार का शिष्ट परिद्दास पाया 
जाता है । आपकी घछुठ्कियों और व्यंगपुर्या बक्तता का आनन्द 
बहुछ्ष और बहुश्नुत लोगों को ही मिलन सक्रता है। 

, जयपुर में आपने 'नलागरी सबन! की स्थापना की थी। कई वर्षो तक 
आप 'समालोचक' के संपादक रहे । 'तासरी भचारिणी पतन्निका का सी 
आपने रई च्े सम्पादन किया। भाषाविज्ञान, प्राचोन लेख और 
सिक्कों तथा गवेषणा के सम्बन्ध में ऋापने अनेक लेख लिखे हैं । आपकी 
रचताओं का पुक संग्रद 'शुत्तेरी अन्धा (प्रथम खण्ढ) के नाम से प्रकाशित 


हो चुका है | आपकी ऐक्र अ्रमर कद्दानी 'डखने कहा, थएः बहुत दी 
सबप्रिय हुई है । 


विजन 5 


न हो आज जी का कल रु च मआ 8 


लेखक-परिचय ११७ 
श्री ५० रामचन्द्र शुक्न (१८८४-१९४१) 
शुक्ल जी का जन्म जिला बस्ती के अगौना आम में सन्‌ १८८४७ 
( भ्राश्विन पूर्णिमा सं, १६४१ ) में हुआ और गोलोकवास २. फ़र्वरी 
१६४३ को । आ्रापकी प्रारम्भिक शिक्षा देहात सें ही हुई। १६०६ में 
आपने प्रयाग से वकालत की परीक्षा दी, पर सफल न हुए । झुछ दिन 
आप मिर्जापुर के एक स्कूल से ड्राइंग मास्टर भो रहे | १६०८ में आप 
काशी-भागरी-प्रचारिणी-सभा द्वारा शायोजित 'हिन्दी-शब्द-सागर' के 
सहायक सम्पादक चनकर बनारस चले गये | कोश की समाप्ति पर 
आप हिन्दू यूनिवर्सिटी, बनारस में हिन्दी के अध्यापक नियुक्त हुए 
ओर १६३७ में आप वहीं के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बनाये गये। 
अन्त तक आप वहीं रहे । 
आप हिन्दी के अच्छे निवन्‍्ध-लेखक और सार्मिक समालोचक थे । 
आपके लेखों में सूच्स विवेचन, गम्भीर चिन्तन, विस्तृत अध्ययन तथा 
तुलनात्मक समीमांसन दृष्टिगोचर होते हैँ | भाषा की प्राक्ललता तथा 
शेली की सजीवता श्रापकी खास चिशेपवाएं हैं । हिन्दी साहित्य को 
सम्पन्न, प्रौढ़ तधा व्यापक बनाने में आपने विशेष कार्य किया है । 
आपने प्रायः साहित्यिक आलोचना, इतिहास तथा मनोविकारों के 
सम्बन्ध सें ही लिखा दै। श्रापकी सूर, तुलसी, जायसी, भारतेन्दु 
झादि की सार्मिक श्राल्लोचनाओं ने हिन्दी के आ्रलोचना-चेन्र में वज्ञानिक 
विवेचचन-पद्धुति का समावेश करके एक नये ही युग का सृत्रपात किया है । 
इसके साथ ही झाप अच्छे कवि भी थे। फुटकर कविताओं के 
अतिरिक्त आपने बुद्ध-चरितः नामक एक ऐतिहासिक महाकाब्य भी. 
लिखा है जो 'लाइट आर एशिया! पर आधारित है । . 
'हिन्दी-शब्द-सागर, तथा र-६ वर्ष तक 'नागरी प्रचारिशी पत्रिका! 
के सम्पादन के अतिरिक्त आपके प्रसिद्ध ग्रन्थ ये हें---चारण-विनोद! 
(६६०६), 'राधाहृप्णदास का जीवनचरित्र' (६६१३), 'आदर्शनीवन! 
(६६६४), छुद्द-चरिता (६६४२९), तुलसी-अग्रन्यायक्ञी! (६६२३), 


१४० लेखलतिका 


+>+नल्- >+न- ब्लड >> बी डॉ चजण ५» अं अऑजाजज जज लजजी € * >> २० ० +- 





बट >ट3ती+ल++ल- 


लाहौर सें आपने 'जात-पात-तोड़क मणडल्ल” की स्थापना की और 
१६२२ में क्रान्ति! (डद) और युगान्‍्तर (हिन्दी) का सम्पादन 
किया । हिन्दी साहित्य सम्मेलन के विगत अ्बोहर के अधिवेशन में 
आप साहित्य परिपद्‌? के प्रधान थे । आप एकनिष्ठ साहित्यसेबी 
हैं। अब तक आपकी ४० से ऊपर पुस्तकें और २९० से अ्रधिक लेख 
प्रकाशित हो खुके हैं। हिन्दी और उदू' दोनों पर आपको समान 
अधिकार प्राप्त है। आप जिस भी विषय पर लिखते हैं, उसमें आपकी 
लेखनी पूर्ण अबाघ गति का परिचय देती है। समाजसुधार, जातपात 
का डच्छेद, इतिहास, यात्रा, नारी-शिक्षा, शिशु-पालन, जीवन-चरित, 
संतति-निग्रह, रति-शाखर आदि अनेक विषय आपकी साहित्य-क्रीड़ा के 
सेत्र हैं । अलबेखनी का भारत”! पर आपको १६१७ तथा १६२६ में 
१२००) और 'इत्सिंय की भारत यात्रा! पर १६२६ में ६००) के 
पुरस्कार पंजाब सरकार की ओर से मिल चखुके हैं। “चालक! पर आपको 
एक स्वर्णपदक भी मिला था । 





श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति (जन्म १८८९) 

आपका जन्म सन्‌ १८६ सें हुआ | आप पंजाब के सुप्रसिद्ध नेता 
ओर शुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक श्री स्वामी श्रद्याननद (पूर्वनास 
महात्मा सुन्शीराम) जी के सुपुत्न हं। आपकी शिक्षा गुरुकुल कांगढ़ी 
में ही हुई, जहां के आप सर्वप्रथम स्नातक हैं। 

आप देशसेवक और राजनेतिक कार्यकर्ता हैं। कई वार जेलयात्रा 
भी कर छुके हैं। कई कांग्रेस कमेटियों के प्रधान तथा मंत्री रह घुके 
हैं। दल्तितोद्धार तथा समाजसुधार के कार्यों में भी आप पूरा सहयोग 
देते हैं । 

साथ ही आप सुयोग्य लेखक तथा प्रसिद्ध पन्चकार हैं। 'सदम॑- 
प्रचारक , 'सत्यवादी', विजय?, अरजन!ः आदि कई पन्नों के सम्पादक 
रह छुके हैं। आजकल आप देइली से 'अर्जनः का सम्पादन कर रहे 


लेखक-परिचय १४१ 


डजीजी-ी-न्‍ी जी जजीजीन क्‍जीजीलड- + 3४ न्च्ल्न्खचख्ख्च्ष्ख्ल््लिजी लि आलजजज बज अजीज डी ++ जीजा >> 


हैं। आपके निम्नलिखित ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हें---'संस्क्ृत साहित्य 
का ऐतिहासिक पअनुशीलन?, “महावीर गरी वाल्डी?, “पं० जवाहरलाल 
नेहरूए, अपराधी कौन ९”, 'झुग़ल साम्राज्य का क्षय शेर उसके कारण, 
'जमींदार!, 'डपनिपदों की भूमिका?, 'राष्ट्रों की उन्नति?, प्रिंस विस्माक!, 
जीवन-संग्राम', 'सरला की भावी?, “आत्मबलिदान!, 'शाहआलम 
की आँखें', 'जीचन की मांकियाँ (३ भाग)”, “महपिं दयानन्द', 
'स्वतंत्र भारत की रूपरेखा! । 
श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (जन्म्त १८९४) 

आपका जन्म रायपुर (मध्यप्रदेश) की खरागढ़ रियासत्त में सन्‌ 
१८६४ में हुआ । आप उत्कृष्ट कोटि के निवन्ध-लेखक और साहित्य- 
समालोचक हैं। श्री पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी के बाद श्राप ७-८ 
वर्ष तक सरस्वती” का सम्पादन करते रहे हर ॥ थश्राज्षकल शाप प्रयाग 
की छाया! के सम्पादक और खैरागढ़ हाई स्कूल में अध्यापक हैं । 

आपके निश्नलिखित्त ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हें--अक्षलि! 
'पश्चपात्र!, हिन्दी साहित्य विसमश”, “विश्वसाहित्य', 'तीथ्ररेणु', 'मकर- 
विन्दु!, प्रबन्ध पारिजात!, 'रलमला?, कुछ, आदि-आदि | 

श्री आचार्य विश्ववन्धु (जन्म १८९६) 

आपका जन्म पश्चिसी पंजाय के सेरा नामक स्थान में सन्‌ १८६६ 
में हुआ | आपकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय “कृपाराम एंग्लो संस्कृत 
हाई स्कूल? सें और उच्च शिक्षा लाहोर के ढी. ए. थी. कालेज में हुई। 
आप प्रारम्भ से ही अदभुत प्रतिभाशाली थे। आपका सारा-का-सारा 
विद्यार्थी जीवन इस बात का साझी है । १६११ में मिदिल में सर्वप्रथम 
रदे भर छात्रवृत्ति ली। १६१३ में एंट्रेंस प्रथम कहा सें पास की 
ओर यूनिवर्सिटी का वज़ीक़्ा लिया। १६१४, में पुफ्र, ए. भी प्रथम 
कहा में की और सरकारी उनज्ञीफ्रा लिया। १६१७ में आपने दो 


० 


च्क 


- १४४ लेखलतिका 


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१, श्रेणियों) के छात्रों का अ्ध्यापन; वरतंमान में यूनिवर्सिटी के प्रकाशन- 
विभाग में सस्पादक | 

कृतियां-गुप्तवंश का इतिहास,” 'सूक्ति-स्तवक,' भस्तावश्रदीपिका, 
पंजाब में हिन्दी की प्रगति! (नागरी प्रचारिणी सभा द्वारो अकाशित2 
अर्लकारप्रवेशिका'. दश्यकुसुमाकर,' “नागरिक शिक्षा! आदि-थादि 
लगभग १६ पुस्तकें । 'गुप्तबंश के इतिहास! पर १६8३३ में पंजाब 
सरकार से ४००) और “नागरिक शिक्षा! पर व४२ में पजात्र 
विश्वविद्यालय द्वारा ००) के प्रथम पुरस्कार मिले थे | 

'भ्री आनन्द कुमार (जन्म १९१५) 

आप हिन्दी के सुविख्यात साहित्यिक श्री पं० रामनरेश्व त्रिपाढी के 
ज्येष्ठपुत्र हैं और स्वयं हिन्दी के उदीयमान लेखक हैं। आपका जस्स 
१६१४ में हुआ। आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से बी, ए. परीक्षा पास की 
है । आपके निश्नलिखित ग्रन्थ अकाशित हो खुके हैं “हिन्दी कविता का 
विकास, समाज और साहित्य', 'आत्मविकास', 'अंगराज महाकाव्य!। 
इनके अतिरिक्त एुक दर्जन के लगभय बालोपयोगी पुस्तकों के भी 
आप रचयिता हैं। आपके लेख गहरे अध्ययन और मौलिक सूक की 
सूचना देते हैं। भाषा शुद्ध और विषयानुकूल होती है ! 


+कल>न> 


श्रीमती राजकुमारी बिन्दुल (जन्म १९२६) 

श्रीसती विन्दुल का जन्म मेरठ शहर सें २६ भसई सन्‌ १६२६ को 
डुआ। आपके पिता श्री रघुनाथप्रसाद जी गाज़ियाबाद के मसिद्ध 
एडवोकेट हैं। आपने गाज़ियाबाद के कन्या बैंदिक हाई स्कूलः से 
सत्‌ १६४३ में ओेद्रिक परीक्षा पास की । अगले ही वर्ष सत्‌ १६४४ में 
आपका विवाह मेरठ के श्री असरनाथ जी विन्दुल एस, ए, से सम्पन्न 
हुआ | श्री अमरनाथ जी भी “साहित्यप्रेमी हैं और दिन्दी सें' एके 
पुस्तक भारत्वर्य में उद्यानकारी? लिख चुके हैं | 


लेखक-परिचय १४५ 


घ्ल्जीज अ>ज >-ललजिीजील लीड जा 5 ौ 8 लल- >> लचीला लाल जल जऔजिजीज- जी + बज जौ ० 


श्रीमती ब्रिन्दल के लेख मर्ांसी के स्वतंत्र? में प्रायः निकलते रहते 
हूं। 'महिला-समाज का उत्थान! ही प्रायः श्रापके सादित्य-चेत्र का 
प्रधान विषय हैं। आपके विचार सुलमे हुए और भापा सरल परन्तु 
प्रभावशाली है| आपके लेखों का एक संग्रद हमारी समस्प्राएं! नाम 
से 'द्विन्द किताब्स लिमिटिड, बंबई” द्वारा प्रकाशित हो चुका है। 
आपकी एक और पुस्तक 'नारी जोब्रेत चक्र! अभी हाल में ही 'सयूर 
प्रकाशन, मांसी! द्वारा प्रकाशित हुईं है । हे 

एक मध्यवर्गीय्र गृहस्थी का संचालन करते हुए और लगभग चार 
बच्चां की माता होते हुए भी श्रीमती बिन्दल का यह साहित्य-प्रम 
झोर समाज-सेवा की भावना चस्तुतः सराहनीय है और हमारी अनेक 
पढित बहनों के लिए--जो गृहस्थ में प्रवेश करते ही लिखना-पढ़ना 
सब भूल जाती हें--अनुकरणीय है । - 


श्श्र८ लेखलत्तिका 


+न्‍-- कल 








ली जीप जी 3० 


उल्लेखनीय-लिखते के योग्य ।_, अध्ययन-पढ़ाई, पढ़ना । 
मुआइना-निरीक्षण, परीक्षण ! | उपर्यक्त-ऊपर कही हुई । 
द्रजा-श्रेणी, छास । सुलभ-सुगम, आसानच । 
तैनात-नियुक्त, नियत, मुकरर ।. | समावेश-अ्रन्द्र श्राजाना, शामिल 
कायम-स्थिर । : होना। 
क्राजी-जज, भक्ते-बचुरे की आलो- |] ४७ 

| 


चना करने वाला (शब्दार्थ-कज्ञा नर 
मौत का हुक्म देने चाल) | 
सबवक-पाठ, शिक्षा । 
कॉवर-बहँगी, बांस का डंडा | 
जिसके दोनों सिरों पर छिकक्‍्के ' 
लटकाये हों--जेसी पानी भसतने 
_ बालों के पास होती है। 
धारणा-इृढ़ निश्चय । 
ऐतिहासिक-हदृतिहास का, सच्चा, 
असल । 


(२) हाई स्कूल में 


साहित्य की महत्ता 

 श्री-संपन्नता-समझद्धि । 
उत्कषांपकर्ष “उन्नति और अवनति। 
क्षमता-शक्ति 
निष्क्रिय-निकस्सा । 
विकार-म्रस्त-विकृत, जिसमें कोई 

विकार या दोष आर गया हो । 
विसजेन-छोडना, भगा देना । 
पोष की प्रभ्भुता'' 'य्ोरुप की १४वीं 
। धथा १६वीं शताब्दी की पुन्र्जा- 
गृति (रिनायसैंस) के फलस्वरूप, 


प 
पु 


छात्रवृत्तियां-बज़ीफ़ । लूथर, कालबिन आदि की रच- 
सौराष्ट्र-गुजरात-काठियावाड़ । नाओं ने पोष (चर्मंसुरु) के 


पात्र-अधिकारी, योग्य 
अनुशासन-निम्रह, डिसिप्लिन । 


'. महत्व को कम कर दिया था । 
' ऋास में प्रजा की सत्ता फ्राँस 
कसरत-ब्यायाम्त । | के प्रसिद्ध लेखक झूसों और 
अगभिवार्े-शआ्रवश्यक, लाज़मी । | डिडरट प्रति के भंथों ने १७६० 
सुलेख-सुन्दर लिखाबट । के लग-भग राज्यक्रांति पेदा की 
होड़-बाज़ी, स्पर्द्धा, संघ । थी और वर्धा प्रजातंत्र शासन की 
अवहेलना-अनादर, . उपेक्षा, । नींव डाली थी । 
लापरवाही । । पादाक्रानत इटली “'सेज़िनो और 


अथावली १४६ 


गेरिबाल्डी की रचनाओं ने पद- | ही मतलब पूरा करना। 

दलित इटली का पु]नरुत्थान | द्विविधा-मन का अस्थिर होना, 

किया था । करू या न करू! का निर्णय न 
अनेसर्गिक आच्छादन-अस्था- .. कर सकना, शह्का । 

भाविक परदा । कुटिलता-टेढ़ापन, दुष्टवा । 
अभिवृद्धि-उन्नति । कायरता-मानसिक सीरुता । 
कृतन्नता-किये हुए उपकार को न. सम्मान-चबड़ाई, इज्जत, आदर | 


जी जीज+जज 





मानने का पाप । ; सक-१ 600२ 
। आकाशर्ंगा 
या पा न प प् दि 
क्या जानवर भी सोचते हैं $ उद्धट बिद्वान-धुरन्धर . विद्वान, 
स्थिति-हालत, अवस्था । बड़ा पण्डित । 
आधात-प्रहार, श्राक्रमण । परिधि-सीमा, हद । 


स्वाभाविक-जन्मसिद्ध, कुदरती । विस्तीणे-विस्तारयुक्त, बड़ी । 
उपाजित-स्वर्थ सोच-सममभकर प्राप्त विस्मयकारी-श्रचरज उत्पन्न 
किया हुआ ।। करने वाला, विचित्र । 
ज्यामिति-ज्योमेंटरी । चीरायण-दुग्धमार्ग, मिल्‍की वे । 
स्वतत:संभूत-अपने आप. पेंदा इंशान से नैंऋ त्य-पर्वोत्तर दिशा 
हुई । से दक्षिण-पश्चिस की और । 
ल्ानगद-ज्ञान सं स्थित । अपरिमित-नि:सीम, विशाल । 
लुब्घक-लुभावबाला, (सेडिया, 


नल नअनओन आनओ 


कतव्य आर सत्यता शिकारी) । 
बअसत्यपरता-कूडइ ब्रोलने की कऋलपनातीत-कल्पना से भी परे, 
झादत । '. अजुमान से भी न भ्राने वाला । 
चाटहुकारी-चापल्सी, सिध्या अपरिच्छिन्न-अपरिमित, श्रस्तीम | 
प्रशंसा । | पादोडस्च--मूतानि!-सारा 


यश: बज्ज्यस्द रहना, उलसना 


स्वाध-परता-च्वापं सिद्धि, 


ब्न्म्ब 
2 


झा। , मूत-वगन उसका पाद (जॉयथाई 
अपना . नागगेह | 


थ््ण 


श्श्र लेखलतिका 


जज 





हुक्म-उदूली-आज्ञाभद्भ, हुक्म न । है वह जिसकी कीर्ति हो । 
मानना । ५२०४7 का 
विज्ञन-'मारो, काटो! का शाही | भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के 
डुक्‍्म । | बनैले-बन में रहनेब्ाले, वन्य, 
क़हर-दारुण अत्याचार, क्रोध, | जंगली-। 
जुल्म । ' आक्रमण-प्रहार, हमला । 
नाजितल्न-अवतरण, ऊपर से आना। , खग-पतक्षी । । 
क्तुमकर्तेमन्‍्यथा वा कतु समर्थ: | जियोलोजिकल सर्वे आफ़ 
जो 'करने', “न करने! अथवा | इण्डिया-भारतीय भूगर्भविद्या- 
ओर तरह से करने! में समथ हो, | सम्बन्धी निरीक्षण विभाग । 
सर्वतंत्रस्वतंत्र', निरंकुश । | कन्द्रा-शुफा । 
हुक्मे-हाकिस, मर्गे-सफ्राजात- | ले-पालक-लेकर. पालन-पोषण 


आस क 








हाकिस का हक्‍्स अचानक मौत | करनेवाले (दुत्तकपुत्र के माता- 
है। राजा की आज्ञा अचानक | पिता)। 

रत्युतुल्य होती है । उद्धरणु-डउद्ठत सन्दर्भ, निकाला 
तत्जञ हुकूमत-राज्य-प्रणाल्ी । हुआ भाग | " 
प्रमाण-पुर:सर-प्रमाणों. और | अधिष्ठाता-अधिपति, मुख्य 

युक्तियों सहित । प्रबन्धक । 
आदिल्ल-न्‍्यायकारी,. अदल, | विवर-डेद, सूराख़, बिल । 

इन्साफ़ करने वाला । कपोल्लकल्पित-मनगढंत, झूठी । 
खम-ठेढ़ा 'करके, क्ुुकाकर, मोड़ स्य्क 

देकर । स्वाधीनता 
शशी-शुक्र-चन्द्रमा के समान | मंरु-स्थक्न-रेगिस्तान, मरुभूमि । 

सफ़ेद । घविवेकशील-विचारवानू,. भले- 
हिलाक-मर गया। घुरे की पहचान कर सकनेवाला । 


कीर्तियेस्य स जीवति-जिसका यश | पोरे-पोरे-अत्येक पोरी सें, रोम-रोम 
जीता है, वद्दी जीता है। जीता | में, सर्वन्न । 


अथादली 


श्श्रे 


लीडीजीजी जज जीफी जी २५७ जी क्‍ी जी सी जी जज जज जब्त जी 23 २ कज3त जी 3] 30४४3 लत 


देवी-आपत्तियॉ-प्रकृति की ओर 
से आनेवाली--अतिवृष्टि, अना- 
बृष्टि, भुकम्प आदि आपत्तियां । 

प्रतिबन्ध-हीन-बेरोक-टोक, 
निर्वन्ध । 

विप्नकारी-रुक्रावट डालनेवाला । 

उच्छ॑ंखलता-उद्दण्डता, 
शाही । 

मान-सदेन-घमण्ड तोढ़ना । 

क्रिया-प्रतिक्रिया-संघप, 
ओर विक्ृति, कर्म और उसका 
प्रतिरोध । 

निष्कर्ष-सार, परिणाम, नतीजा । 


ननननीनी पेनिजननाननन चिपनलक- 


विज्ञान 
अचलम्बन-अआ्राश्रय । 
रहस्यो द्घाटन-छिपे भेदों को 
खोलना। 
यात॒ना-घोर पीड़ा । 


संक्रामक-रोग-छतदार बीमारियां । 


विश्लेषणु-अलग-थलय करके 
देखना । 

यातायात-आने-जाने के साधन, 
रेल, मोटर, जद्दाज्ञ आदि । 

श्रेयस्कर-कल्याणकारी । 

अशरफुल मखलूकाच-सारी सृष्टि 
से श्रेष्ट, जगववन्ध | 


घक्का- | 








की 


निम्न-गामिनी-नीचे-अवनति-फी 
ओर जाने वाली । 

जाज्वल्यमान-चमकदार, प्रकाश- 
मान । | 

गुहाबासी-गुफ़ा-पहाड़ी कन्द्राश्रों 
में रहनेवाला । 

प्रादुभाव-जन्म, प्रारम्भ । 

वर्गीकरणु-मिन्न-मिन्न वर्गों में 
बांटना । 


कीत । पराकाष्ठा-श्रन्तिम सीमा, हद । 


सयादित-सीमित, 
अन्दर, परिच्छिन्न । 

समर-क्षेत्र-युद्ध-छेन्र । 

विचारस्रोत-विचार-प्रवाह, 
विचारों का बहाव । 


मर्यादा के 





आप 


विजया की प्रथम प्रतिष्ठा 
आवाहन-चघुलाना । 
अनिष्ट-अप्रिय, दानिकारक । 
पर्याप्त-काफ़ी । 
रखन-प्रसन्न करना 
मीमांसा-वरिवेच्चन, मनन । 


दीनों पर प्रेम 


' अद्वितीय-मिसके यराबर दूसरा 


न हो, धडुपन, लासानों ॥ 


मन 0 5०7 म इक - लेखलतिका 


आतिथ्य-अंतिथि सत्कार 

वूसन-फर्लों की वाह | 

दीदाए-दर्शन । 

सस्मसात-भस्मीखत+ ख़ाक 
मिलाना । 

झमति-मत 

सर्वभेदिनी-मर्मस्थलों को । 
बाली, भीर देनेवएली । 


इतर-दूसरे , अन्य 4 
अकफिख्ित्कर-र्ड भी न कर 
सकने योग्य, जिकम्मा । 
संपके-लगाव, सम्बन्ध । 
कल-मशीन । 
उपादेयता-अह्ण करने की 
योग्यता, उपयोगिता! १ 
न्गस्य-जिंसकी कोई गिनती नहीं । 
डपेज्षणीय-उपेत्षा शा निरादर के 
योग्य । ' 
अवहेलना-डपेक्षा: ज्िरादर १ 
अन्ततोगत्वा-आखिरकार । 
मनुष्य अरे समाज अवलम्बित-निर्भर । 
सहज -प्रवृत्ति-स्वाभाविक 
प्राकृतिक प्रवृत्ति, जो बिना सिखाये 
ही मलुप्यों ओर दूसरे पशुओं में 













७ 


के (दु४) 


समन; मममममभभ 


<> 


या | आधारनियम-वै नियम जिन पर 
नींव खड़ी हो, चुनयादी उसूल 


अदम्य-न दवीया जा सकने 
पाई जाती है। ह ! बालों | 
सुसज्जित-अच्छी तरह तेँथार ०१० परहित-साधन-दूसरे की भला 
मुद्ताज-आ तर, निर्भर । | करना, परोपकार । 
सुदृद-मजदत । ग ' क॒र्वब्यपरायणता-अपने कर्तैब्य- 
गाध-अपार, बरवे अधिक | | फ़रज्ञ-कों रा करने की आदत | 
मिथ्याश्रम-कहा व | अभिवधैन-इंढि, बदली, तरक्की । 
परिच्छिन्न-लीमित, वर्ड थोदी ।। सत्ताधारी-जिनके हा। में रुपये 
संकुचित-दंग, छोटा । की या राज्य की ताकत हो । 
महत्ता-बढ्ाई, बद्धप्पन । अवेध-नियमविरुद्ध , अनुचित । 


सिरपेक्ष-जिसे किसी दूसरे की । रूढ़ियों की ख़ट्ञला-पुरानी रस्मों 
अपेक्षा न दी । | की जंजीर या बेदी । 


अथोवली 


श्श्श्‌ 


.>>++न+ जज ली जी अऑजिजीजी जी ली जज जज जी उ जी तिल ही >> कली >>: 


मूलमंत्र-असली रहस्य । 
निहित-छिपा हुआ । 
सश्वय । 
अ्रपव्ययरफ़िजूलखर्ची । ; 
श्रमसहिष्णुता-परिश्रस को सहन 
करने की शाक्ति | 
उद्योगपरता-परिश्रम करने की 
झादत | 
संचय-धन को बचाकर जमा 
करना या जोढ़ना | 
छुघा-भूख । 
उपवास-फ़ाका, निरादार। 
हिफ़ाज़त-रक्षा करना । 
अतिक्रम-उल्लंघन, लांधना ।.' 
मिमन्न्रित-छुलाना या न्योता देना। । 
स्वार्थे-त्याग-स्वाथ या ख़दरारज़ी 
को छोड़ना । 
अनावश्यक-जिसकी 
आवश्यकता न हो | 
ताहश-उसी प्रकार की, 
द्विसाव से | 


कु्ड भी 


् । 
उसी ' 


ज्याघात-हानि, प्रहार, ज्द़म । 

अजेनशील-कमानेवाला । 

कतेज्यनिष्ट-अपने . क्त॑च्य 
पालन में दृट रहनेदाला । 





विधाम 
ज्षति-पूर्ति-द्ठानि था कमी को 
पूरा करना, कसर पूरी करंना । 
अचरुद्ध-रुका हआ । 


' टॉनिक-पोष्टिक था बलवर्द्धक 


श्रोपधि । 


; मधुर स्मृति-मीठी याद । किसी 


अच्छी घटना की स्ट्त्ति । 


; निवारण-दूर करना । 


व्यवसायी-ब्यवसाय या वशिज्ञ 
व्यापार करनेवाले, जिन्हें शारी- 
रिक श्रम नहीं करना पढ़ता । 


पु 
| पयाप्र-काफ़ी । 





सास आर ननद 


पराशणिमहणु-बवाह संस्कार, हाथ 
पकदना । 


आवनड छेय-अ्रद्टट । 

पारिपाटी - प्रथा, दरीका । 

छुप्रथधाए-चघुरा। रस्स | 
स-अ्रवनात, कमी । 

आनिवाय॑ं-सा-परम शावश्यक, न 
रुक सकनवयाला । 


' संभाद्धपूए-चुख-सम्पत्ति से भरा 


हुभा । 


' सभीए-अपेक्तित, मनचाहा | 
' सामंजस्य-समन्नध । 
' प्रसार-दिस्तार । 





श्ध्छ लेखलतिका 





आतिथ्य-अतिथि सत्कार । इत्तर-दूसरे, अन्य | 

चूसन-फरलों का बहा | अकिखित्कर-कुछ भी न कर 

दीदार-दर्शन । सकने योग्य, निकम्सा । 

भस्मसात्‌ू-भस्मीभूत, ख़ाक में | संपर्के-लगाव, सम्बन्ध । 
मिलाना | 2३ कल-संशीन । 

जनि-मत । ह उपादेयता-अहण करने की 


मर्मभेदिनी-मर्मस्थलों को तोड़ने | योग्यता, उपयोगिता। 


वाली, मार देनेवाली । नगर्य-जिसकी कोई गिनती नहीं । 
पर-पीर-दूसरे की पीड़ा । उपेक्षणीय-उपेक्षा या निरादर के 
बे-पीर-निगुरा, बिना पीर (गुरु) | क्लेग्य। ' ४ 

के (दुए) । अवहेलना-डपेक्षा, निरादर । 

का अन्ततोगत्वा-आम़िरकार । 
मलुष्य अर समाज अवलम्बित-निर्भर । 

सहज-प्रवृत्ति-स्वाभाविक या | 

प्राकृतिक प्रचृत्ति, जो बिना सिखाये 

ही मलुप्यों और दूसरे पशुओं में 

पाई जाती है । 
सुसजित-श्रच्छी तरह तैयार । 
मुहताज-अआश्षित, निसेर । 
सुदरृढ़-मज़दूत । 
अयगाध-अपार, बहुत अधिक । 


०. 


आधारनियमस-बे नियम जिन पर 
नींव खड़ी हो, छुनयादी उसूल | 
अदम्य-न दवाया जा सकने 
| वाला | 
। परहित-साधन-दूसरे का भल्रा 
॥ करना, परोपकार । ५ 
! कृतेज्यपरायणता-अपने कर्तवब्य- 
डा |! फ़रज़-को पूरा करने की आदत 
सभ्याज्षम-कूढा वहस । | अभिवधेन-बूद्धि, बढ़ती, तरक्की । 
परिच्छिन्न-सीमित, बहुत थोड़ी ।। सत्ताधारी-जिनके हाथ में रुपये 
संकुचित-तंग, छोटा ै । कहो या राज्य की ताकत हो । 
महत्ता-बड़ाई, वद्प्पन । ] अवेध--नियमविरुद्ध, अनुचित । 
निरपेक्ष-जिसे किसी दूसरे की | रूढ़ियों की शद्भला-पुरानी रस्मों 
थपेत्ता न हो । | की जंजीर या चेही | 


अथ।बतली श्श्ड 


अलजक आन 2<० 55०५० ०० २२२४:४८४ ४०३०० बिक 4025 66202 7 मील की कनकत 
सूलमत्र-असली रहस्य । विश्रा 
निहित-छिपा हुआ । ज्ञति-पूर्ति-दानि या कमी को 





पुरा करना, कसर परी करना । 
अवरुद्ध-रुका हुआ | 
टॉनिक-पौष्ठिक या बलचर्द्धक 


सथ्य 
अपवउयय>फ्िजूलख्ी । 
श्रमसहिष्णुता-परिश्रम को सहन | श्रोपधि । 
करने की शक्ति । | मधुर स्थृत्ति-मीठी याद । किसी 
उद्योगपरता-परिश्रम करने की | श्रसद्छी घरना की स्टृत्ति। 
| 
| 





आदत | निवार ण-दूर करना | 
संचय-धन को बचाकर जमा | व्यवसायो-ब्यवसाय या पणिज 
करना या जोड़ना । व्यापार करनेवाले जिन्हें शारी- 
ज्ुधा- रिके श्रम नहीं करन 
भूख । थ है। करना पढ़ता । 


उपचास-फ्राका, निराहार। पयाप्र-काफ़ी । 
हिफ़ाजत-रक्षा करना | ला 
अतिक्रम-उल्लंघन, लांघना | सास आर ननद्‌ 


रवाथ-त्याग-स्वार्ध या ख़दरगार्ज़ी आवच्छेच: “अहूट। 


को छोड़ना । परिपाटी-अथा, तरीका । 
अनावश्यक-जिसकी कुछ भी उ>अधथाएं-बुरी रस्में | 


| 
| 
| 
। 
0 
निर्मान्त्रत-चुलाना या न्योता देना। | पाशिग्रहण-विवाह सरकार, हाथ 

। 

। 


आवश्यकता न हो हैसि-अवर्नाति कमी | 
वाहश-उसी प्रकार कम उसी | अनिवाय-सा-परम आवश्यक, न 
हिसाब से । | रैक सकतेवाला | 
स्याधात-हानि, प्रहार ज़ख़म। । 'मेंद्धिपूणु “जेस-सम्पत्ति से भरा 
अजनशील-कमानेवाला | का भीए-अ्रपेक्षित 

८ ! अभीए्ट-अपेज्षित, भनचाहा | 
फेतेव्यतिए्ट- अपने फेतेंच्य के! सामंजस्य-समन्द्रय | 

जन में यह रहनेदाला । ! प्रसार-विस्तार ।